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दायित्व निभाने से बचने को बेटी के डीएनए टेस्ट की मांग करना विकृत मानसिकता का नतीजा: हाईकोर्ट
Thu, 27 Jun 2019 09:31 AM IST
खुशबू गोयल
विवेक शर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
विवेक शर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: खुशबू गोयल
Updated Thu, 27 Jun 2019 09:31 AM IST
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फाइल फोटो
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अपने दायित्वों से बचने के लिए बेटी का डीएनए टेस्ट कराने की मांग करना विकृत मानसिकता का प्रमाण है, यह टिप्पणी पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट ने की। पत्नी के किसी और से संबंध साबित करने और बेटी को गुजारा भत्ता देने की जिम्मेदारी से बचने के लिए बेटी का डीएनए टेस्ट करवाने के लिए याचिका दायर की गई।
उस याचिका को पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि इस प्रकार की याचिका विकृत मानसिकता का नतीजा है। याचिका दाखिल करते हुए संगरूर निवासी याची ने कहा कि पत्नी से विवाद के चलते अदालत में केस चल रहा था। उसकी पत्नी के किसी दूसरे शख्स से संबंध हैं।
निचली अदालत में याची के आरोप साबित नहीं हो पाए थे। निचली अदालत ने याची को अपनी बेटी को 2 हजार रुपये प्रतिमाह गुजारा भत्ता देने के आदेश दिए थे। इसी आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में अपील की थी।
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उस याचिका को पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि इस प्रकार की याचिका विकृत मानसिकता का नतीजा है। याचिका दाखिल करते हुए संगरूर निवासी याची ने कहा कि पत्नी से विवाद के चलते अदालत में केस चल रहा था। उसकी पत्नी के किसी दूसरे शख्स से संबंध हैं।
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निचली अदालत में याची के आरोप साबित नहीं हो पाए थे। निचली अदालत ने याची को अपनी बेटी को 2 हजार रुपये प्रतिमाह गुजारा भत्ता देने के आदेश दिए थे। इसी आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में अपील की थी।
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याची ने हाईकोर्ट से मांग की थी कि उसकी बेटी का डीएनए टेस्ट करवाया जाए, क्योंकि वह उसकी बायोलॉजिकल बेटी नहीं है। इसलिए वह उसको गुजारा भत्ता देने को भी बाध्य नहीं है।
हाईकोर्ट ने याची की दलीलें सुनने के बाद कहा कि इस प्रकार की याचिका को स्वीकार किया गया तो वह न्याय की हत्या जैसा होगा। इसके साथ ही यदि बेटी का डीएनए टेस्ट करवाया गया तो यह उसको जीवन भर की मानसिक पीड़ा देने वाला होगा। ऐसे में विकृत मानसिकता के साथ दाखिल की गई इस याचिका को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
याची ने निचली अदालत के आदेश के बाद याचिका पर पुन: सुनवाई की अपील भी नहीं की, जिसका मतलब है कि उसने आदेश को स्वीकार कर लिया है। हाईकोर्ट ने याची पर कड़ी टिप्पणी करते हुए याचिका को सिरे से खारिज कर दिया।
हाईकोर्ट ने याची की दलीलें सुनने के बाद कहा कि इस प्रकार की याचिका को स्वीकार किया गया तो वह न्याय की हत्या जैसा होगा। इसके साथ ही यदि बेटी का डीएनए टेस्ट करवाया गया तो यह उसको जीवन भर की मानसिक पीड़ा देने वाला होगा। ऐसे में विकृत मानसिकता के साथ दाखिल की गई इस याचिका को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
याची ने निचली अदालत के आदेश के बाद याचिका पर पुन: सुनवाई की अपील भी नहीं की, जिसका मतलब है कि उसने आदेश को स्वीकार कर लिया है। हाईकोर्ट ने याची पर कड़ी टिप्पणी करते हुए याचिका को सिरे से खारिज कर दिया।