पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट की टिप्पणी: न्यायालय में हुए समझौते की शर्त से पीछे नहीं हटा जा सकता
लुधियाना निवासी याची ने बताया कि उसके माता-पिता का विवाह 2006 में हुआ था और 2007 में याची का जन्म हुआ था। इसी बीच याची के मां-बाप ने सहमति से तलाक का फैसला लिया और 2011 में उन्हें तलाक मिल गया।
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2011 में आपसी सहमति से तलाक लेते हुए साढ़े 6 लाख रुपये संपूर्ण गुजारा भत्ता लेने के बाद अब दोबारा गुजारे भत्ते की मांग संबंधी याचिका को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने सिरे से खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक बार न्यायालय में समझौता हो जाए तो उसकी शर्त से पीछे नहीं हटा जा सकता।
लुधियाना निवासी याची ने बताया कि उसके माता-पिता का विवाह 2006 में हुआ था और 2007 में याची का जन्म हुआ था। इसी बीच याची के मां-बाप ने सहमति से तलाक का फैसला लिया और 2011 में उन्हें तलाक मिल गया। तलाक के दौरान याची की मां ने याची व अपने लिए एक मुश्त गुजारा भत्ता के रूप में साढ़े 6 लाख रुपये प्राप्त किए। नाबालिग बेटी ने मां के माध्यम से फैमिली कोर्ट में गुजारा भत्ता के लिए याचिका दाखिल की थी, जिसे खारिज कर दिया गया।
फैमिली कोर्ट के फैसले के खिलाफ पहुंचे थे हाईकोर्ट
इसके बाद फैमिली कोर्ट के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई। हाईकोर्ट ने तथ्यों को देखने के बाद कहा कि जब उस समय पैसा लिया गया था तो कोर्ट में कहा गया था कि इसके बाद कोई मांग नहीं की जाएगी। अब याचिकाकर्ता की मां न्यायालय में दी गई अंडरटेकिंग से पीछे हट रही है। याची के पूर्व पिता ने कहा कि उसने दूसरी शादी कर ली है और उसके दो बच्चे भी हैं। वह प्राइवेट नौकरी करता है और 15 हजार का वेतन पाता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि पिता ने अपनी अंडरटेकिंग पूरी की थी और पैसा दिया था जबकि मां अपनी बात से पीछे हट रही है। हाईकोर्ट ने कहा कि हालात को देखते हुए हम भारी जुर्माना लगाने से बच रहे हैं। याची की मां ने समझौता किया और इससे मिली राशि का इस्तेमाल कर लाभ उठाया। अब समझौते का लाभ उठाकर उससे पीछे हटने की अनुमति नहीं दी जा सकती।