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Punjab: गवर्नर ने विस स्पेशल सत्र को फिर बताया अवैध, मान को पत्र लिख कहा-पद की गरिमा का ख्याल रखें
Mon, 24 Jul 2023 09:48 PM IST
निवेदिता वर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Mon, 24 Jul 2023 09:48 PM IST
सार
19 व 20 जून को पंजाब विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर राज्य सरकार ने, सिख गुरुद्वारा (संशोधन) बिल समेत चार अहम बिल पारित किए थे। इन चारों बिलों को मंजूरी के लिए राज्यपाल को भेजकर मुख्यमंत्री ने उनसे आग्रह किया था कि वह इन चारों बिलों को मंजूरी दे दें, लेकिन राज्यपाल ने इससे इनकार कर दिया था।
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सीएम भगवंत मान और गवर्नर बनवारी लाल पुरोहित।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
पंजाब के राज्यपाल बनवारी लाल पुरोहित ने प्रदेश सरकार की ओर से 19 व 20 जून को बुलाए गए विधानसभा के दो दिवसीय सत्र को एक बार फिर गैरकानूनी करार दिया है। सोमवार को उन्होंने मुख्यमंत्री भगवंत मान को जवाबी पत्र भेजकर उस कानूनी-राय का भी हवाला दिया, जिसके अनुसार विधानसभा का उक्त दो दिवसीय सत्र वैध नहीं था।
राज्यपाल ने अपने पत्र के साथ ही, ली गई कानूनी राय का विस्तृत ब्योरा भी मुख्यमंत्री को भेजा है। मुख्यमंत्री को भेजे पत्र में राज्यपाल ने लिखा कि उन्हें मीडिया से पता चला कि आपने टिप्पणी की है कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि राज्यपाल ने 19 और 20 जून को आयोजित सत्र के संबंध में कोई कानूनी राय नहीं ली। राज्यपाल ने लिखा- आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि मैंने एक वरिष्ठ सांविधानिक विशेषज्ञ से कानूनी राय ली थी, जिन्होंने कहा था कि बुलाया गया सत्र पूरी तरह से अवैध है। तो अब आपके कमेंट पर ज्यादा कुछ कहने की मुझे जरूरत नहीं है। सत्र के दौरान भी आपने राज्यपाल पर बेतुकी टिप्पणियां कीं जो लोगों को पसंद नहीं आईं क्योंकि मुख्यमंत्री पद की एक गरिमा होती है। राज्यपाल ने आगे कहा- आपको याद रखना चाहिए कि मुझे भारत के राष्ट्रपति ने राज्यपाल नियुक्त किया है और यह सुनिश्चित करना मेरी जिम्मेदारी है कि प्रशासन निष्पक्ष और ईमानदारी से चले।
यह भी पढ़ें: चंडीगढ़: इंडस्ट्रियल एरिया में गोदाम में लगी आग, दो लड़कियों की मौत, तीन घायल
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दो दिन के विशेष सत्र पर है रार
19 व 20 जून को पंजाब विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर राज्य सरकार ने, सिख गुरुद्वारा (संशोधन) बिल समेत चार अहम बिल पारित किए थे। इन चारों बिलों को मंजूरी के लिए राज्यपाल को भेजकर मुख्यमंत्री ने उनसे आग्रह किया था कि वह इन चारों बिलों को मंजूरी दे दें, लेकिन राज्यपाल ने इससे इनकार करते हुए कहा था कि वह अटॉर्नी जनरल समेत अन्य विधि विशेषज्ञों से सलाह ले रहे हैं कि इन बिलों पर अंतिम फैसला क्या लेना है?
इसके बाद गत 15 जुलाई को मुख्यमंत्री ने राज्यपाल को चिट्ठी लिखी कि चारों बिलों को तत्काल प्रभाव से अपनी सहमति देने का कष्ट करें। मुख्यमंत्री के पत्र का जवाब देते हुए राज्यपाल ने लिखा कि मेरे पास यह मानने के कई आधार हैं कि विधानसभा सत्र, जिसमें चार बिल पास किए गए, वह कानून और कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन था। इससे उन बिलों की वैधता और वैधानिकता पर संदेह पैदा होता है।’
मेरे पत्रों का तुरंत जवाब दें
राज्यपाल ने अपने पत्र में लिखा कि उन्हें भ्रष्टाचार के कई मामलों की शिकायतें मिली हैं। इसलिए अब तक भेजे पत्रों को जवाब दें अन्यथा इसे संविधान का उल्लंघन माना जाएगा। मुख्यमंत्री भगवंत मान को संबोधित पत्र में राज्यपाल ने आगे लिखा- आपने मेरे पत्रों का जवाब नहीं दिया और उल्टे उन्हें प्रेम पत्र करार दिया। संविधान के मुताबिक मुख्यमंत्री राज्यपाल द्वारा मांगी गई जानकारी देने के लिए बाध्य हैं। ऐसी जानकारी न देना संविधान के अनुच्छेद 167 का स्पष्ट उल्लंघन है।
कानूनी राय में बताया- सदन का कार्य समाप्त हो जाने पर स्वतः समाप्त हो जाती है बैठक
सदन की बैठक को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित करना माननीय अध्यक्ष के अधिकार में है, लेकिन एक बार जब बैठक का कामकाज समाप्त हो जाता है और कोई भी कामकाज नहीं बचता है, तो बैठक को कृत्रिम रूप से जीवित नहीं रखा जा सकता। एक बार जब सदन का कार्य, जैसा कि किए जाने वाले कार्य की सूची में निर्दिष्ट हो, समाप्त हो जाता है, तो बैठक भी उस समय स्वतः समाप्त हो जाती है, जब तक यह स्पष्ट न हो जाए कि कार्य सूची में निर्दिष्ट कार्य का कोई पहलू अधूरा रह गया है।
कामकाज समाप्त हो जाने के बाद बैठक को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित करना तो दूर की बात, अध्यक्ष के लिए बैठक स्थगित स्थगित करने की अनुमति देने का भी कोई कारण नहीं बचता। इसके अलावा, पंजाब विधानसभा के सचिव के 14 जून 2023 के पत्र से भी स्पष्ट है कि 19-20 जून को बुलाई बैठक का कार्य न तो बजट से संबंधित था बल्कि वास्तव में बजट सत्र से जुड़ा कोई अधूरा एजेंडा भी नहीं था, जिसके लिए सत्र बुलाने की आवश्यकता होती।
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राज्यपाल ने अपने पत्र के साथ ही, ली गई कानूनी राय का विस्तृत ब्योरा भी मुख्यमंत्री को भेजा है। मुख्यमंत्री को भेजे पत्र में राज्यपाल ने लिखा कि उन्हें मीडिया से पता चला कि आपने टिप्पणी की है कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि राज्यपाल ने 19 और 20 जून को आयोजित सत्र के संबंध में कोई कानूनी राय नहीं ली। राज्यपाल ने लिखा- आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि मैंने एक वरिष्ठ सांविधानिक विशेषज्ञ से कानूनी राय ली थी, जिन्होंने कहा था कि बुलाया गया सत्र पूरी तरह से अवैध है। तो अब आपके कमेंट पर ज्यादा कुछ कहने की मुझे जरूरत नहीं है। सत्र के दौरान भी आपने राज्यपाल पर बेतुकी टिप्पणियां कीं जो लोगों को पसंद नहीं आईं क्योंकि मुख्यमंत्री पद की एक गरिमा होती है। राज्यपाल ने आगे कहा- आपको याद रखना चाहिए कि मुझे भारत के राष्ट्रपति ने राज्यपाल नियुक्त किया है और यह सुनिश्चित करना मेरी जिम्मेदारी है कि प्रशासन निष्पक्ष और ईमानदारी से चले।
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दो दिन के विशेष सत्र पर है रार
19 व 20 जून को पंजाब विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर राज्य सरकार ने, सिख गुरुद्वारा (संशोधन) बिल समेत चार अहम बिल पारित किए थे। इन चारों बिलों को मंजूरी के लिए राज्यपाल को भेजकर मुख्यमंत्री ने उनसे आग्रह किया था कि वह इन चारों बिलों को मंजूरी दे दें, लेकिन राज्यपाल ने इससे इनकार करते हुए कहा था कि वह अटॉर्नी जनरल समेत अन्य विधि विशेषज्ञों से सलाह ले रहे हैं कि इन बिलों पर अंतिम फैसला क्या लेना है?
इसके बाद गत 15 जुलाई को मुख्यमंत्री ने राज्यपाल को चिट्ठी लिखी कि चारों बिलों को तत्काल प्रभाव से अपनी सहमति देने का कष्ट करें। मुख्यमंत्री के पत्र का जवाब देते हुए राज्यपाल ने लिखा कि मेरे पास यह मानने के कई आधार हैं कि विधानसभा सत्र, जिसमें चार बिल पास किए गए, वह कानून और कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन था। इससे उन बिलों की वैधता और वैधानिकता पर संदेह पैदा होता है।’
मेरे पत्रों का तुरंत जवाब दें
राज्यपाल ने अपने पत्र में लिखा कि उन्हें भ्रष्टाचार के कई मामलों की शिकायतें मिली हैं। इसलिए अब तक भेजे पत्रों को जवाब दें अन्यथा इसे संविधान का उल्लंघन माना जाएगा। मुख्यमंत्री भगवंत मान को संबोधित पत्र में राज्यपाल ने आगे लिखा- आपने मेरे पत्रों का जवाब नहीं दिया और उल्टे उन्हें प्रेम पत्र करार दिया। संविधान के मुताबिक मुख्यमंत्री राज्यपाल द्वारा मांगी गई जानकारी देने के लिए बाध्य हैं। ऐसी जानकारी न देना संविधान के अनुच्छेद 167 का स्पष्ट उल्लंघन है।
कानूनी राय में बताया- सदन का कार्य समाप्त हो जाने पर स्वतः समाप्त हो जाती है बैठक
सदन की बैठक को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित करना माननीय अध्यक्ष के अधिकार में है, लेकिन एक बार जब बैठक का कामकाज समाप्त हो जाता है और कोई भी कामकाज नहीं बचता है, तो बैठक को कृत्रिम रूप से जीवित नहीं रखा जा सकता। एक बार जब सदन का कार्य, जैसा कि किए जाने वाले कार्य की सूची में निर्दिष्ट हो, समाप्त हो जाता है, तो बैठक भी उस समय स्वतः समाप्त हो जाती है, जब तक यह स्पष्ट न हो जाए कि कार्य सूची में निर्दिष्ट कार्य का कोई पहलू अधूरा रह गया है।
कामकाज समाप्त हो जाने के बाद बैठक को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित करना तो दूर की बात, अध्यक्ष के लिए बैठक स्थगित स्थगित करने की अनुमति देने का भी कोई कारण नहीं बचता। इसके अलावा, पंजाब विधानसभा के सचिव के 14 जून 2023 के पत्र से भी स्पष्ट है कि 19-20 जून को बुलाई बैठक का कार्य न तो बजट से संबंधित था बल्कि वास्तव में बजट सत्र से जुड़ा कोई अधूरा एजेंडा भी नहीं था, जिसके लिए सत्र बुलाने की आवश्यकता होती।