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पंजाब में सरकारी खरीद एजेंसियों ने रोका मजदूरों का मेहनताना
ब्यूरो/अमर उजाला/चंडीगढ़
Updated Wed, 06 Jul 2016 08:29 PM IST
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कोर्ट
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पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने पंजाब सरकार को अनाज की ढुलाई के एवज में सरकारी खरीद एजेंसियों पर बकाया मजदूरों के 6447072 रुपये की राशि तीन महीने में अदा करने के आदेश जारी किए हैं। जस्टिस आरके जैन की अदालत ने इस मामले में 12 विभिन्न याचिकाओं का एक साथ निपटारा करते हुए यह फैसला सुनाया।
याचिकाकर्ता पंजाब प्रदेश पल्लेदार मजदूर यूनियन संगरूर शाखा की ओर से याचिका में कहा गया कि पंजाब सरकार हर साल मंडियों में अनाज की ढुलाई और लदान के लिए एक साल की अवधि का टेंडर जारी करती है।
वर्ष 2015-16 के लिए सरकार ने राज्य की खरीद एजेंसियों मार्कफेड, पनग्रेन, पंजाब स्टेट वेयरहाउसिंग कारपोरेशन, पनसप और एफसीआई के लिए पांच बार टेंडर जारी किए, लेकिन प्रदेश में मजदूर यूनियनों द्वारा इनका बायकाट कर दिए जाने के कारण राज्य की मंडियों में फसल लेकर पहुंचे किसानों ने उठान नहीं होने के चलते सड़कों पर धरना-प्रदर्शन शुरू कर दिया था।
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26 अप्रैल, 2015 तक संगरूर जिले के अमरगढ़ केंद्र के अलावा सरकार को कहीं से भी टेंडर पर रिस्पांस नहीं मिला तो सरकार ने यह टेंडर जोगिंदर पाल एंड कंपनी के नाम एएसओआर (अनुसूचित दरों से अधिक) से 31 फीसदी ज्यादा दर पर दे दिया, लेकिन मजदूरों के हड़ताल पर चले जाने के कारण कंपनी काम नहीं कर सकी और उसे 9 लाख रुपये की पेनाल्टी भुगतनी पड़ी।
याचिका में आगे कहा गया कि संगरूर की अनाज मंडी में गेहूं का अंबार लगने पर याचिकाकर्ता यूनियन ने सर्वसम्मति से फैसला लेकर 26 अप्रैल, 2016 को उक्त सरकारी एजेंसियों के साथ एएसओआर से 132 फीसदी अधिक रेट पर काम करने के एक समझौता पत्र पर हस्ताक्षर कर लिए। इस समझौता पत्र पर एफसीआई ने हस्ताक्षर नहीं किए थे।
अनाज की ढुलाई और लदान का काम समाप्त होने के बाद याचिकाकर्ता यूनियन ने उक्त खरीद एजेंसियों से अपना तय मेहनताना मांगा जोकि एएसओआर से 132 फीसदी अधिक की दर से 64,47,072 रुपये बन गया था। एफसीआई ने यह कहते हुए भुगतान करने से इंकार कर दिया कि यह बहुत महंगा है। हालांकि एफसीआई ने यूनियन को भेजे अपने पत्र में माना कि अनाज ढुलाई व लदान का पूरा काम किया गया है।
फिर भी एफसीआई ने एएसओआर से 132 फीसदी अधिक की दर के हिसाब से केवल 70 फीसदी राशि का ही भुगतान किया और 30 फीसदी राशि देने से इंकार कर दिया। एफसीआई के अलावा बाकी सरकारी खरीद एजेंसियों ने भी जब भुगतान से इंकार कर दिया तो याचिकाकर्ता यूनियन ने 3 अगस्त, 2015 को उन्हें कानूनी नोटिस भेजा, लेकिन एजेंसियों ने जब इसका भी जवाब नहीं दिया तो यूनियन को हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
हाईकोर्ट की ओर से प्रतिवादी खरीद एजेंसियों को जब नोटिस भेजा गया तो उन्होंने अदालत में आकर कहा कि एएसओआर से 132 फीसदी अधिक मेहनताना बहुत ज्यादा है। हालांकि, एजेंसियों ने यह भी माना कि इसी दर पर उन्होंने यूनियन के साथ समझौते पर हस्ताक्षर भी किए थे।
जस्टिस आरके जैन ने अपने फैसले में कहा कि यह पाया गया है कि एफसीआई को छोड़कर बाकी प्रतिवादियों ने मजदूर यूनियन के साथ उस समय समझौता किया, जब मंडियों में 60 फीसदी गेहूं पहुंच चुका था और किसान मुश्किल का सामना कर रहे थे।
मजदूर यूनियन ने जिस रेट पर अनाज की ढुलाई और उठान का काम किया, उसे सभी एजेंसियों ने माना था। याचिकाकर्ता को बकाया 30 फीसदी राशि लेने का हक है क्योंकि मजदूरों ने ऐसे समय में काम किया जब देरी होने पर करोड़ों रुपये का अनाज खराब हो सकता था। ऐसे में प्रतिवादी अगले तीन महीने में याचिकाकर्ता यूनियन को समझौते के अनुसार तय की गई सारी राशि का भुगतान करें।
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याचिकाकर्ता पंजाब प्रदेश पल्लेदार मजदूर यूनियन संगरूर शाखा की ओर से याचिका में कहा गया कि पंजाब सरकार हर साल मंडियों में अनाज की ढुलाई और लदान के लिए एक साल की अवधि का टेंडर जारी करती है।
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वर्ष 2015-16 के लिए सरकार ने राज्य की खरीद एजेंसियों मार्कफेड, पनग्रेन, पंजाब स्टेट वेयरहाउसिंग कारपोरेशन, पनसप और एफसीआई के लिए पांच बार टेंडर जारी किए, लेकिन प्रदेश में मजदूर यूनियनों द्वारा इनका बायकाट कर दिए जाने के कारण राज्य की मंडियों में फसल लेकर पहुंचे किसानों ने उठान नहीं होने के चलते सड़कों पर धरना-प्रदर्शन शुरू कर दिया था।
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26 अप्रैल, 2015 तक संगरूर जिले के अमरगढ़ केंद्र के अलावा सरकार को कहीं से भी टेंडर पर रिस्पांस नहीं मिला तो सरकार ने यह टेंडर जोगिंदर पाल एंड कंपनी के नाम एएसओआर (अनुसूचित दरों से अधिक) से 31 फीसदी ज्यादा दर पर दे दिया, लेकिन मजदूरों के हड़ताल पर चले जाने के कारण कंपनी काम नहीं कर सकी और उसे 9 लाख रुपये की पेनाल्टी भुगतनी पड़ी।
याचिका में आगे कहा गया कि संगरूर की अनाज मंडी में गेहूं का अंबार लगने पर याचिकाकर्ता यूनियन ने सर्वसम्मति से फैसला लेकर 26 अप्रैल, 2016 को उक्त सरकारी एजेंसियों के साथ एएसओआर से 132 फीसदी अधिक रेट पर काम करने के एक समझौता पत्र पर हस्ताक्षर कर लिए। इस समझौता पत्र पर एफसीआई ने हस्ताक्षर नहीं किए थे।
अनाज की ढुलाई और लदान का काम समाप्त होने के बाद याचिकाकर्ता यूनियन ने उक्त खरीद एजेंसियों से अपना तय मेहनताना मांगा जोकि एएसओआर से 132 फीसदी अधिक की दर से 64,47,072 रुपये बन गया था। एफसीआई ने यह कहते हुए भुगतान करने से इंकार कर दिया कि यह बहुत महंगा है। हालांकि एफसीआई ने यूनियन को भेजे अपने पत्र में माना कि अनाज ढुलाई व लदान का पूरा काम किया गया है।
फिर भी एफसीआई ने एएसओआर से 132 फीसदी अधिक की दर के हिसाब से केवल 70 फीसदी राशि का ही भुगतान किया और 30 फीसदी राशि देने से इंकार कर दिया। एफसीआई के अलावा बाकी सरकारी खरीद एजेंसियों ने भी जब भुगतान से इंकार कर दिया तो याचिकाकर्ता यूनियन ने 3 अगस्त, 2015 को उन्हें कानूनी नोटिस भेजा, लेकिन एजेंसियों ने जब इसका भी जवाब नहीं दिया तो यूनियन को हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
हाईकोर्ट की ओर से प्रतिवादी खरीद एजेंसियों को जब नोटिस भेजा गया तो उन्होंने अदालत में आकर कहा कि एएसओआर से 132 फीसदी अधिक मेहनताना बहुत ज्यादा है। हालांकि, एजेंसियों ने यह भी माना कि इसी दर पर उन्होंने यूनियन के साथ समझौते पर हस्ताक्षर भी किए थे।
जस्टिस आरके जैन ने अपने फैसले में कहा कि यह पाया गया है कि एफसीआई को छोड़कर बाकी प्रतिवादियों ने मजदूर यूनियन के साथ उस समय समझौता किया, जब मंडियों में 60 फीसदी गेहूं पहुंच चुका था और किसान मुश्किल का सामना कर रहे थे।
मजदूर यूनियन ने जिस रेट पर अनाज की ढुलाई और उठान का काम किया, उसे सभी एजेंसियों ने माना था। याचिकाकर्ता को बकाया 30 फीसदी राशि लेने का हक है क्योंकि मजदूरों ने ऐसे समय में काम किया जब देरी होने पर करोड़ों रुपये का अनाज खराब हो सकता था। ऐसे में प्रतिवादी अगले तीन महीने में याचिकाकर्ता यूनियन को समझौते के अनुसार तय की गई सारी राशि का भुगतान करें।