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पंजाबः कैप्टन सरकार के पहले 'श्वेत पत्र' में निजी कंपनियों का जिक्र नहीं, क्या लिखा इसमें जानिए

Tue, 21 Jan 2020 12:37 PM IST
खुशबू गोयल हर्ष कुमार सलारिया, अमर उजाला, चंडीगढ़
हर्ष कुमार सलारिया, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: खुशबू गोयल Updated Tue, 21 Jan 2020 12:37 PM IST
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Punjab Government First White Paper Description
फाइल फोटो
पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह सरकार निजी थर्मल प्लांटों से हुए समझौते और उनसे सरकार को हो रहे भारी वित्तीय नुकसान का खुलासा करने के लिए व्हाइट पेपर लाने जा रही है। विधानसभा के आगामी मानसून सत्र में यह व्हाइट पेपर लाया जाएगा, लेकिन इस नए व्हाइट पेपर पर मौजूदा सरकार के ही घिरने का अंदेशा है।
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तीन साल पहले कैप्टन अमरिंदर सिंह के सत्ता संभालने पर जून, 2017 को भी सरकार जो व्हाइट पेपर लाई थी, उसमें बिजली घाटे का जिक्र करते हुए कहीं भी निजी कंपनियों से हुए समझौतों को जिम्मेदार नहीं ठहराया गया, बल्कि अकाली-भाजपा शासन द्वारा लागू की गई उदय योजना के तहत पीएसपीसीएल का घाटा खत्म करने के असफल प्रयासों का ही उल्लेख किया गया है। राज्य में मौजूदा सरकार के गठन के बाद से अब तक 12 बार बिजली के दाम बढ़ाए जा चुके हैं।
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हाल ही में प्रति यूनिट 30 पैसे की बढ़ोतरी के ऐलान को विपक्ष मुख्यत: आम आदमी पार्टी के हाथ बड़ा मुद्दा आ गया और निजी कंपनियों से हुए बिजली खरीद समझौतों पर आप ने विशेष सत्र में प्राइवेट मेंबर बिल लाने का भी एलान किया, लेकिन स्पीकर द्वारा विशेष सत्र में शासकीय कामकाज के अलावा अन्य कामकाज पर रोक लगाए जाने के चलते यह बिल सदन में नहीं आ सका।
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हालांकि सीएम ने विशेष सत्र के पहले ही दिन यह एलान कर दिया कि अकालियों द्वारा निजी कंपनियों से किए विवादित बिजली खरीद समझौतों पर उनकी सरकार विधानसभा के मानसून सत्र के दौरान श्वेत पत्र लाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि यह श्वेत पत्र पिछली अकाली-भाजपा सरकार द्वारा पावर प्लांट स्थापित करने संबंधी किए समझौतों से जुड़े सभी दस्तावेज़ों का खुलासा करेगा।

यह लिखा है 2017 के व्हाइट पेपर में

भारत सरकार के ऊर्जा मंत्रालय द्वारा 2015 में राज्य में बिजली वितरण कंपनी (डिस्काम) का कायाकल्प करने के लिए योजना अधिसूचित की गई। चार मार्च, 2016 को ऊर्जा मंत्रालय, पंजाब सरकार और पीएसपीसीएल के बीच एक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। इसमें कहा गया था कि 3 सितंबर, 2015 को पीएसपीसीएल के 20837.68 करोड़ के बकाया में से राज्य सरकार द्वारा अगले दो साल में कुल 75 फीसदी हिस्से का भार उठाया जाएगा। इसके तहत पहले साल 50 फीसदी (10418.84 करोड़) और दूसरे साल 25 फीसदी (5209.42 करोड़) सरकार अदा करेगी।

बाकी 25 फीसदी रकम पीएसपीसीएल द्वारा पूर्ण अथवा आंशिक गारंटीशुदा बांड जारी किए जाएंगे या बकाया राशि को बैंकों से कर्ज में तबदील कराया जाएगा, जिसके लिए ब्याज दर बाजार भाव से 0.1 फीसदी अधिक हो सकती है। राज्य सरकार ने अगले दो साल में पीएसपीसीएल के नाम पर बाजार से और कर्ज उठा लिया गया। सरकार की तरफ से 15628.26 करोड़ के पंजाब स्पेशल बांड जारी किए गए लेकिन किसी ने इनमें रुचि नहीं दिखाई। उधर, पीएसपीसीएल को एक वित्त वर्ष में राज्य सरकार के बकाया कर्ज पर सरकार को ब्याज देना तय हुआ।

जिसकी दर 2019-20 तक राज्य सरकार द्वारा जारी किए नान-एमएलआर बांड के बराबर रखी गई जबकि सरकार ने तय कर लिया कि वह ब्याज और मूल की अदायगी 2019-20 के बाद करेगी। यह भी तय हुआ कि पहले चार साल राज्य सरकार द्वारा जो ब्याज की अदायगी की जाएगी, उसे पीएसपीसीएल को दी जाने वाली सब्सिडी राशि में समायोजित कर दिया जाएगा। इसका नतीजा यह हुआ कि पीएसपीसीएल उभरने की बजाए घाटे में और गहरे तक धंसता चला गया। 2015-16 में जहां उसका घाटा 1695 करोड़ था, 2016-17 में वह बढ़कर 3196 करोड़ तक पहुंच गया।

क्या है निजी बिजली कंपनियों से समझौता

दरअसल, अकाली भाजपा सरकार ने राज्य में निजी थर्मल प्लांटों को बढ़ावा देने के लिए देश की बड़ी बिजली निर्माता कंपनियों से करार दिए। लेकिन इस करार में राज्य के अधिकारों को ताक पर रख दिया गया। समझौते के अनुसार, राज्य सरकार को हर साल निजी कंपनियों को बिजली निर्माण के लिए 1500 करोड़ रुपये और वाशिंग के एवज में 500 करोड़ यानी कुल 2000 करोड़ रुपये की राशि देनी ही होगी, भले ही वह इन निजी थर्मल प्लांटों से बिजली खरीदे या न खरीदे। इसके अलावा, निजी कंपनियों से बिजली खरीदने पर सरकार उन्हें प्रति यूनिट 4 रुपये से भी अधिक रकम देगी।

हालांकि एनटीपीसी से राज्य सरकार को उस समय भी 2.10 रुपये प्रति यूनिट में बिजली उपलब्ध थी। कांग्रेस का आरोप है कि समझौतों की एक बड़ी शर्त यह भी है कि राज्य सरकार निजी कंपनियों के किए समझौते किसी भी स्थिति में रद्द नहीं कर सकती। अब सीएम का कहना है कि उनकी सरकार ने निचली अदालत में इस मामले पर केस जीत लिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का फैसला उनके विरुद्ध चला गया। कैप्टन ने कहा कि जब वह विपक्ष में थे तो ख़ुद इंडिया बुल्ज़ प्लांट के खिलाफ धरने पर बैठे थे।

उस समय की अकाली सरकार ने इंडिया बुल्ज़ के साथ बिजली प्लांट लगाने के लिए एमओयू करने के लिए नेशनल थर्मल पावर कोर्पोरेशन (एनटीपीसी) का गिद्दड़बाहा पावर प्रोजेक्ट रद्द कर दिया था और बिजली प्लांट स्थापित करने के लिए वैश्विक टेंडर की तय प्रक्त्रिस्या का उल्लंघन कर गिद्दड़बाहा में किसानों से जबरन ज़मीन खाली करवाई थी।
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