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बदल रही पुश्तैनी सियासत: पंजाब में इस बार जट सिख के सामने दलित सिख और हिंदू वोट बैंक का गठजोड़

Thu, 16 Dec 2021 11:56 AM IST
निवेदिता वर्मा अभिषेक वाजपेयी, अमर उजाला, चंडीगढ़
अभिषेक वाजपेयी, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: निवेदिता वर्मा Updated Thu, 16 Dec 2021 11:56 AM IST
सार

कांग्रेस ने अन्य दलों से पहले बाजी मारते हुए अनुसूचित जाति से ताल्लुक रखने वाले चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बना सूबे की 32 प्रतिशत आबादी को साधने की कोशिश की है।

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Punjab Assembly elections 2022 will be different from Many previous elections
पंजाब विधानसभा चुनाव। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पंजाब में इस बार विधानसभा चुनाव पिछले कई चुनाव से अलग होंगे। पहले जो होता रहा है, वह इस चुनाव में नहीं होगा। इसका असर अब सियासी गुणा गणित में भी दिखने लगा है। बदलाव की शुरुआत जट सिख वोट बैंक से हो गई है। हमेशा से चुनाव की धुरी रहने वाले जट सिख वोट को सियासी दल साधते नजर आते थे, लेकिन इस बार सियासी दल पुश्तैनी सियासत को छोड़ दलित और हिंदू वोट बैंक को साधने में लगे हुए हैं।

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कभी संयुक्त पंजाब का हिस्सा रहे हरियाणा में भाजपा ने गैर जाट राजनीति का गणित लगाकर सफलता हासिल की है। भाजपा की इस गैर जाट राजनीति को पंजाब के सियासी दल भी पूरी तरह से समझ गए हैं। भाजपा के इस गणित को भांप कर सबसे पहले कांग्रेस और बाद में शिरोमणि अकाली दल और अब आम आदमी पार्टी ने भी पंजाब में अपनी रणनीति में परिवर्तन की घोषणाएं करनी शुरू कर दी हैं।
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सूबे के संपन्न जट सिख वोट बैंक के सामने दलित सिख और हिंदू वोट बैंक के गठजोड़ ने पंजाब की पुश्तैनी सियासत का मिजाज और चेहरा पूरी तरह से बदल दिया है। पंजाब में बदली हुई राजनीति की आहट कितनी मजबूत है, इसका अंदाजा समीकरणों को समझकर लगाया जा सकता है। कांग्रेस ने अन्य दलों से पहले बाजी मारते हुए अनुसूचित जाति से ताल्लुक रखने वाले चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बना सूबे की 32 प्रतिशत आबादी को साधने की कोशिश की है। भाजपा ने भी यही संकेत आने वाले चुनाव के लिए लगभग दे दिए हैं, बस घोषणा ही बाकी है। शिअद ने एक उपमुख्यमंत्री बसपा कोटे को देकर सियासी निशाना साधा है। आप और अन्य दल भी इसी राह पर चल रहे हैं।

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अभी तक जट सिख ही बने मुख्यमंत्री

अब तक पंजाब की सियासत 20 फीसदी वाले जट सिखों के इर्द-गिर्द ही सिमटी रही है। यहां तक कि सभी मुख्यमंत्री जट सिख समुदाय से ही बनते रहे है। आबादी में 32 फीसदी हिस्सेदारी के बाद भी दलित मुख्यमंत्री की चर्चा अब से पहले कभी नहीं हुई। ये भी दीगर बात है कि 117 सदस्यों वाली पंजाब विधानसभा में 34 सीटें आरक्षित हैं। हालांकि मतदाता के तौर पर दलित समुदाय का असर पंजाब विधानसभा की करीब 50 सीटों पर है।

धार्मिक डेरे भी बनेंगे बदलाव वाहक

पंजाब के धार्मिक डेरों के साथ ही ये सिख पंथक संस्थाएं भी इस चुनाव में बदलाव की वाहक होंगी। इसमें सर्वाधिक भूमिका सिखों के राष्ट्रवादी धड़े नामधारी सिखों की हो सकती है। पंजाब की सिख आबादी में ये दूसरा सबसे बड़ा समुदाय है। इनके गुरु राम सिंह कूका ने अपने शिष्यों के साथ स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों से लोहा लिया था। वहीं कूका वीरों ने गोरक्षा के लिए आत्माहुति दी है। वर्तमान में इस परंपरा के वाहक नामधारियों के सर्वोच्च गुरु ठाकुर उदय सिंह हैं।

ऐसे समझिए जातीय समीकरण

पंजाब में सबसे अधिक हिंदू वोटरों की संख्या है। सूबे में हिंदू वोटर 38.49 वोट प्रतिशत के साथ सबसे अधिक हैं। इसके बाद 31.94 प्रतिशत के साथ अनुसूचित जाति वर्ग के वोटर दूसरे नंबर पर और जट सिख 19 वोट प्रतिशत के साथ तीसरे नंबर पर हैं। 10.57 प्रतिशत अन्य वर्ग हैं।

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