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हाईकोर्ट का फैसला : भर्तियों में उत्तर पुस्तिका के पुनर्मूल्यांकन की मनाही हो, तो भी अदालत को सुनवाई का अधिकार
Sat, 10 Apr 2021 04:12 PM IST
निवेदिता वर्मा
विवेक शर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
विवेक शर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Sat, 10 Apr 2021 04:12 PM IST
सार
- पीसीएस की न्यायिक परीक्षा में उत्तर पुस्तिका के पुनर्मूल्यांकन की मांग को किया खारिज
- कोर्ट ने कहा, खामियां मौजूद तो हम मूक दर्शक नहीं बन सकते
- सब्जेक्टिव पेपर की उत्तर पुस्तिका के पुनर्मूल्यांकन में कोर्ट को नहीं बनना चाहिए सुपर एग्जामिनर
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पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट
- फोटो : फाइल फोटो
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विस्तार
भर्ती परीक्षा में यदि उत्तर पुस्तिका (आंसर-शीट) का पुनर्मूल्यांकन वर्जित हो तो भी अदालत ऐसे मामलों में सुनवाई का अधिकार रखती है। ऐसा सिर्फ ऑब्जेक्टिव पेपर के संदर्भ में किया जा सकता है, सब्जेक्टिव पेपर की उत्तर पुस्तिका को विशेषज्ञ कई पैमाने पर जांचते हैं और उसमें कोर्ट को सुपर एग्जामिनर नहीं बनना चाहिए। हाईकोर्ट ने यह अहम फैसला पीसीएस की न्यायिक परीक्षा में उत्तर पुस्तिका के पुनर्मूल्यांकन की मांग को खारिज करते हुए सुनाया है।
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निशांत दत्ता ने पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर बताया कि उसने पीसीएस न्यायिक पदों के लिए आयोजित भर्ती प्रक्रिया में भाग लिया था। दोनों लिखित परीक्षाएं पास होने के बावजूद उसे इंटरव्यू के लिए नहीं बुलाया गया। याची ने बताया कि उत्तर कुंजी के अनुसार उसे 4 प्रश्नों के सही उत्तर के अंक नहीं दिए गए। ऐसे में उसने पुनर्मूल्यांकन की मांग की थी। पंजाब सरकार की तरफ से हाईकोर्ट में दलील दी गई कि उसे इस याचिका पर सुनवाई करने का अधिकार नहीं है, क्योंकि विज्ञापन के अनुसार उत्तर पुस्तिका का पुनर्मूल्यांकन वर्जित था। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों को आधार बनाते हुए इस विषय पर स्थिति स्पष्ट की।
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जस्टिस जसवंत सिंह ने कहा कि जब बात सब्जेक्टिव पेपर की हो तो उस स्थिति में कोर्ट को सब कुछ विषय विशेषज्ञ पर छोड़ते हुए पुनर्मूल्यांकन की मांग पर हाथ खड़े कर लेने चाहिए। ऐसे मामलों में विशेषज्ञों से ऊपर जाकर अदालत को सुपर एग्जामिनर नहीं बनना चाहिए। इसके साथ ही जब बात नियुक्ति प्रक्रिया की हो तो कोर्ट को सहानुभूति दिखाने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे कोई और अपनी नौकरी गंवा बैठेगा।
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हालांकि जज ने यह स्पष्ट कर दिया कि जब मामला ऑब्जेक्टिव पेपर का हो तो कोर्ट को अपने हाथ खड़े करने की जरूरत नहीं है। दुर्लभतम मामलों में कोर्ट को अधिकार है कि भले ही पुनर्मूल्यांकन वर्जित हो तो भी अदालत इसके लिए आदेश जारी कर सकती है। अगर उत्तर कुंजी में खामी हो तो उस स्थिति में कोर्ट को मूक दर्शक नहीं बने रहना चाहिए। अगर परीक्षा विशेषज्ञों की निगरानी में हुई है तो भी कोर्ट इसको लेकर दाखिल याचिका पर सुनवाई कर सकता है।