{"_id":"6949a44eaa7774996605f5cf","slug":"procedural-lapses-in-the-overall-development-plan-of-the-high-court-complex-will-derail-the-entire-exercise-high-court-chandigarh-news-c-16-pkl1066-904029-2025-12-23","type":"story","status":"publish","title_hn":"हाईकोर्ट परिसर की समग्र विकास योजना में प्रक्रियात्मक चूक से पूरी कवायद पटरी से उतर जाएगी: हाईकोर्ट","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
हाईकोर्ट परिसर की समग्र विकास योजना में प्रक्रियात्मक चूक से पूरी कवायद पटरी से उतर जाएगी: हाईकोर्ट
विज्ञापन
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट परिसर की समग्र विकास योजना के लिए कंसल्टेंट की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर टिप्पणी करते हुए अदालत ने कहा कि किसी भी प्रकार की प्रक्रियात्मक चूक पूरी कवायद को पटरी से उतार सकती है इसलिए अत्यधिक सावधानी आवश्यक है।
सोमवार को सुनवाई के दौरान प्रशासन ने हाईकोर्ट के समक्ष दो अहम बिंदु रखे जिनमें पहला प्रक्रियात्मक और दूसरा वित्तीय बताया गया जो समय-सीमा को प्रभावित कर सकते हैं। यूटी प्रशासन ने बताया कि इस परियोजना से जुड़े दस्तावेज जमा करने की अंतिम तिथि 31 दिसंबर से बढ़ाकर 21 जनवरी 2026 कर दी गई है। इससे अतिरिक्त समय तो मिला है लेकिन उन्होंने आगाह किया कि प्रस्तावित कंसल्टेंसी शुल्क 50 लाख रुपये से अधिक हो सकता है जिससे जनरल फाइनेंशियल रूल्स 2017 के तहत टेंडर प्रक्रिया अनिवार्य हो जाएगी।
अमित झांजी ने कोर्ट को बताया कि कंसल्टेंसी शुल्क की वास्तविक राशि तब तक तय नहीं की जा सकती, जब तक हाईकोर्ट या उसकी समिति की ओर से कार्य का दायरा अंतिम रूप से निर्धारित नहीं किया जाता। उन्होंने स्पष्ट किया कि नियमों के अनुसार यदि शुल्क 50 लाख रुपये तक रहता है तो सिंगल-सोर्स सेलेक्शन के जरिए कंसल्टेंट की नियुक्ति संभव है लेकिन यदि राशि इससे अधिक हुई तो यूटी प्रशासन को टेंडर प्रक्रिया अपनानी ही पड़ेगी।
विज्ञापन
प्रशासन ने कहा कि अब 21 जनवरी तक समय उपलब्ध है, इसलिए समानांतर रूप से टेंडर प्रक्रिया शुरू कर देना उचित होगा। उन्होंने कहा कि 10–15 दिनों के भीतर अभिरुचि पत्र आमंत्रित किए जा सकते हैं। भारत सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सत्य पाल जैन ने भी इस चरण पर किसी भी गलती के प्रति आगाह किया। उन्होंने कहा कि यदि नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं रही तो बाद में आपत्तियां उठ सकती हैं और अनावश्यक देरी होगी। उन्होंने याद दिलाया कि पूर्व की सुनवाइयों में भी टेंडर मार्ग अपनाने का सुझाव दिया गया था। बार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता रूपिंदर खोसला ने भी हाईकोर्ट के सतर्क रुख का समर्थन करते हुए कहा कि पिछले एक वर्ष में पहले ही काफी समय नष्ट हो चुका है और सीमित टेंडर प्रक्रिया अपनाने से भविष्य में किसी भी कानूनी चुनौती से बचाव होगा। प्रशासन ने कहा कि कोर्ट की ओर से कार्य का दायरा तय करने के दो दिनों के भीतर टेंडर जारी कर आवेदन के लिए 10 दिन का समय दिया जाएगा। इसके बाद दो दिनों में तकनीकी और वित्तीय मूल्यांकन पूरा कर, 21 जनवरी से पहले अनुबंध को अंतिम रूप दिया जा सकता है। हाईकोर्ट ने कहा कि हम ऐसी प्रक्रिया को पटरी से उतरने नहीं देना चाहते जो अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। उद्देश्य तेजी लाना है लेकिन बिना कोई गलती किए।
विज्ञापन
सोमवार को सुनवाई के दौरान प्रशासन ने हाईकोर्ट के समक्ष दो अहम बिंदु रखे जिनमें पहला प्रक्रियात्मक और दूसरा वित्तीय बताया गया जो समय-सीमा को प्रभावित कर सकते हैं। यूटी प्रशासन ने बताया कि इस परियोजना से जुड़े दस्तावेज जमा करने की अंतिम तिथि 31 दिसंबर से बढ़ाकर 21 जनवरी 2026 कर दी गई है। इससे अतिरिक्त समय तो मिला है लेकिन उन्होंने आगाह किया कि प्रस्तावित कंसल्टेंसी शुल्क 50 लाख रुपये से अधिक हो सकता है जिससे जनरल फाइनेंशियल रूल्स 2017 के तहत टेंडर प्रक्रिया अनिवार्य हो जाएगी।
विज्ञापन
अमित झांजी ने कोर्ट को बताया कि कंसल्टेंसी शुल्क की वास्तविक राशि तब तक तय नहीं की जा सकती, जब तक हाईकोर्ट या उसकी समिति की ओर से कार्य का दायरा अंतिम रूप से निर्धारित नहीं किया जाता। उन्होंने स्पष्ट किया कि नियमों के अनुसार यदि शुल्क 50 लाख रुपये तक रहता है तो सिंगल-सोर्स सेलेक्शन के जरिए कंसल्टेंट की नियुक्ति संभव है लेकिन यदि राशि इससे अधिक हुई तो यूटी प्रशासन को टेंडर प्रक्रिया अपनानी ही पड़ेगी।
विज्ञापन
प्रशासन ने कहा कि अब 21 जनवरी तक समय उपलब्ध है, इसलिए समानांतर रूप से टेंडर प्रक्रिया शुरू कर देना उचित होगा। उन्होंने कहा कि 10–15 दिनों के भीतर अभिरुचि पत्र आमंत्रित किए जा सकते हैं। भारत सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सत्य पाल जैन ने भी इस चरण पर किसी भी गलती के प्रति आगाह किया। उन्होंने कहा कि यदि नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं रही तो बाद में आपत्तियां उठ सकती हैं और अनावश्यक देरी होगी। उन्होंने याद दिलाया कि पूर्व की सुनवाइयों में भी टेंडर मार्ग अपनाने का सुझाव दिया गया था। बार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता रूपिंदर खोसला ने भी हाईकोर्ट के सतर्क रुख का समर्थन करते हुए कहा कि पिछले एक वर्ष में पहले ही काफी समय नष्ट हो चुका है और सीमित टेंडर प्रक्रिया अपनाने से भविष्य में किसी भी कानूनी चुनौती से बचाव होगा। प्रशासन ने कहा कि कोर्ट की ओर से कार्य का दायरा तय करने के दो दिनों के भीतर टेंडर जारी कर आवेदन के लिए 10 दिन का समय दिया जाएगा। इसके बाद दो दिनों में तकनीकी और वित्तीय मूल्यांकन पूरा कर, 21 जनवरी से पहले अनुबंध को अंतिम रूप दिया जा सकता है। हाईकोर्ट ने कहा कि हम ऐसी प्रक्रिया को पटरी से उतरने नहीं देना चाहते जो अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। उद्देश्य तेजी लाना है लेकिन बिना कोई गलती किए।