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नेशनल डॉग डे: पैसा बहाया, विशेषज्ञों को बुलाया पर चंडीगढ़ में लावारिस कुत्तों की समस्या अब भी बरकरार 

Thu, 26 Aug 2021 12:17 PM IST
निवेदिता वर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: निवेदिता वर्मा Updated Thu, 26 Aug 2021 12:17 PM IST
सार

सितंबर 2019 में निजी कंपनी से अनुबंध खत्म होने के बाद नगर निगम ने लावारिस कुत्तों की नसबंदी बंद कर दी थी। इस कारण कुत्तों की संख्या तेजी से बढ़ी। साथ ही कुत्तों के काटने की घटनाओं में भी इजाफा हुआ।

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Problem of Stray Dogs is not Resolved even after many efforts by Nagar Nigam in Chandigarh
चंडीगढ़ में कुत्तों की समस्या। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

चंडीगढ़ और ट्राइसिटी में लावारिस कुत्तों की समस्या किसी से छुपी नहीं है। न जाने कितने हादसे और कितनी ही मौतें इनके कारण हो चुकी हैं। इनसे निपटने के जितने प्रयास किए गए, सब विफल रहे। चंडीगढ़ में तो एक साल में नगर निगम ने एक करोड़ रुपये खर्च कर डाले मगर कुत्तों से पीछा नहीं छूटा। कई योजनाएं भी बनीं, लेकिन धरातल पर नहीं उतर सकीं। नतीजा, आज भी शहर की सड़कों पर लावारिस कुत्तों का आतंक है। नगर निगम ने एक साल में चार हजार कुत्तों की नसबंदी पर 40 लाख रुपये खर्च किए। इसके अलावा उन्हें पकड़ने और वापस वहीं छोड़ने पर 60 लाख रुपये खर्च हो चुके हैं।

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सितंबर 2019 में निजी कंपनी से अनुबंध खत्म होने के बाद नगर निगम ने लावारिस कुत्तों की नसबंदी बंद कर दी थी। इस कारण कुत्तों की संख्या तेजी से बढ़ी। साथ ही कुत्तों के काटने की घटनाओं में भी इजाफा हुआ। इसके बाद निगम ने पिछले साल अगस्त में फिर अनुबंध करके डॉ. अमनदीप को कुत्तों की नसबंदी का काम सौंपा। उनसे एक कुत्ते का लगभग एक हजार रुपये शुल्क तय हुआ। इस दौरान कुत्तों को पकड़ने वाली गाड़ी और उनके कर्मचारियों पर हर माह पांच लाख रुपये खर्च किए गए। 

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कुत्तों की संख्या से काफी धीमी गति से बढ़ी पंजीकरण की संख्या 

अधिकारियों के अनुसार, एक अप्रैल 2015 से लेकर अगस्त 2021 तक 17,445 लावारिस कुत्तों को नगर निगम की ओर से एंटी रैबीज के इंजेक्शन लगाए हैं। इस बीच लगभग छह माह तक कोरोना के कारण कोई इंजेक्शन नहीं लगाए गए। 2012 में हुए सर्वे के अनुसार, शहर में कुल 7900 लावारिस कुत्ते थे, जो अब 15 हजार से ज्यादा हो चुके हैं। वहीं 7100 पालतू कुत्तों का पंजीकरण कराया गया था, जो सिर्फ 9 हजार तक ही पहुंचा है। 

बढ़े हैं कुत्तों के काटने के केस
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार लॉकडाउन से पहले सेक्टर-19 और 38 की डिस्पेंसरी में प्रतिदिन जहां 15 से 20 केस कुत्तों के काटने के आते थे, वहीं अब यह आंकड़ा 50 तक पहुंच गया है। हालांकि हर साल की अपेक्षा इस साल गर्मियों में कुत्तों के काटने की घटनाएं कम हुई हैं।

लाख रुपये खर्च कर आयोजित हुआ राष्ट्रीय सेमिनार, परिणाम शून्य

पिछले साल प्रशासक वीपी सिंह बदनौर के कहने पर नगर निगम ने लावारिस कुत्तों की समस्या से निपटने को एक राष्ट्रीय स्तर का सेमिनार आयोजित किया था। इस दौरान विशेषज्ञों ने कहा था कि खतरनाक नस्ल के कुत्तों को पालने पर प्रतिबंध लगाया जाए, फीमेल डॉग की नसबंदी की जाए, नसबंदी का रिकॉर्ड रखा जाए ताकि दवा का असर खत्म होने के बाद उस कुत्ते की तत्काल वैक्सीनेशन की जा सके। कुत्तों के खरीदने व बेचने का रिकॉर्ड बने, जागरूकता शिविर लगाए जाएं और वैक्सीन लगाने वाली दुकानों का पंजीकरण हो। अब तक इनमें से एक भी सुझाव पर अमल नहीं हुआ और न ही कोई बैठक बुलाई गई।

न सेंटर बना और न पेट पार्क, सख्ती का भी असर नहीं
रायपुरकलां में बनने वाला एडवांस एनीमल बर्थ कंट्रोल सेंटर भी पिछले दो साल में पूरा नहीं हो सका है। प्रशासन ने गार्डन में कुत्तों के घुमाने और कुत्ते पालने वालों के खिलाफ कानून तो सख्त बना दिए, लेकिन उसका असर नहीं दिखता। लोग लगातार लावारिस कुत्तों को रोटी व अन्य खाने-पीने का सामान डालते हैं, लेकिन उनकी जिम्मेदारी लेने से पीछे भागते हैं। वहीं, पार्कों में कुत्तों को घुमाने पर जुर्माना 500 रुपये से बढ़ाकर पांच हजार रुपये कर दिया गया है। इसे लेकर कई बार विवाद हो चुके हैं। झगड़े इतने बढ़े कि पुलिस को जाकर मामला शांत कराना पड़ा। निगम ने कुत्तों को घुमाने के लिए सेक्टर-43 में डॉग पार्क बनाने की योजना बनाई थी, लेकिन वह भी सिर्फ कागजों में ही है।

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