कोरोना से नुकसान: निजी स्कूलों पर पड़ा ज्यादा प्रभाव, शिक्षकों का वेतन नहीं बढ़ा, स्कूल बस ड्राइवर-अटेंडेंट बेरोजगार
शिक्षकों के मुताबिक कोरोना और आर्थिक संकट के बहाने स्कूल स्टाफ की तनख्वाह में पिछले तीन साल से कोई बढ़ोतरी नहीं की गई है। जबकि स्कूल बच्चों से फीस भी ले रहे हैं। डेढ़ साल से ऑनलाइन शिक्षा के दौर में बच्चों की सुबह के साथ शाम में भी कक्षाएं लेते हैं। ऐसे में शिक्षकों पर काम का दबाव ज्यादा है। उसके बदले सैलरी कम मिल रही है।
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कोरोना से पूरी दुनिया प्रभावित हुई। हर क्षेत्र को बड़ा नुकसान हुआ। इसी में शिक्षा क्षेत्र भी शामिल है। सरकारी शिक्षा से अधिक निजी शिक्षा से जुड़े लोगों को नुकसान उठाना पड़ा। कोरोना ने निजी स्कूलों में काम कर रहे कर्मियों की कमर तोड़ दी। कोई बेरोजगार हुआ तो कोई कम वेतन में काम करने को मजबूर। कई कर्मचारी ऐसे हैं, जो उधार के पैसे से बच्चों को पाल रहे हैं। स्कूलों का तर्क है कि उनके पास फीस नहीं पहुंची। इसके कारण वेतन आदि में कटौती करनी पड़ी।
बसें कंडम हो गईं, दोबारा शुरू करने में लगेंगे लाखों रुपये
निजी स्कूल बस के ठेकेदार दलजीत सिंह ने बताया कि उनकी 45 से ज्यादा बसें डेढ़ साल से खड़ी हैं। बसों के टायर और बैटरी खत्म हो गई है। टैक्स और बीमा खत्म हो चुके हैं। स्थिति यह है कि यदि इन बसों को दोबारा से चलाना पड़ा तो अब लाखों रुपये खर्च करने पड़ेंगे। मेरे साथ 120 ड्राइवर और कंडक्टर काम करते थे, जो सब बेरोजगार हो गए थे। कोई मजदूरी कर रहा है तो कोई किसी दुकान में काम। सरकार से मदद की आस थी, लेकिन कोई बात नहीं बनी।
ठेकेदार लखबीर सिंह ने बताया कि बसों के चलने से ही कमाई होती थी। कुल नौ बसें थीं। 18 लोगों का स्टाफ था। लॉकडाउन लगते ही काम ठप हो गया। कमाई नहीं होने पर स्टाफ को निकालना पड़ा। अपने पास कुछ जमापूंजी थी, जिससे काम चलाया। जो बसें थीं, वह कंडम हो चुकी हैं।
स्कूल बस चालक हो गए बेरोजगार
स्कूल बंद होने से सबसे ज्यादा नुकसान बस चालकों को हुआ है। लॉकडाउन लगते ही बसों के पहिए थम गए और वह बेरोजगार हो गए। शिव का कहना है कि पांच से लगातार निजी शिक्षण संस्थान में बस ड्र्राइवर के तौर पर काम कर रहा था। लेकिन बसें नहीं चलने से आमदनी बंद हो गई। घर चलाना मुश्किल हो गया है। पहले भी ज्यादा तनख्वाह नहीं मिलती थी। इसलिए कोई जमापूंजी नहीं थी। हफ्ते में एक-दो बार किसी गाड़ी के साथ दिहाड़ी पर चले जाते हैं, उससे खर्च चल रहा है। चालक रणजोत सिंह ने बताया कि जब से स्कूल बंद हुए हैं तब से काम बंद है। मेरे भाई थे तो उनके साथ रहकर गुजारा चल गया। मैंने अपने कई साथियों को संघर्ष करते देखा है। उनकी आंखों में आंसू देखे हैं।
स्कूल बस अटेंडेंट भी बेरोजगार
बस अटेंडेंट रीता ने बताया कि स्कूल बंद होने से घर बैठने को मजबूर हो गई हूं। बच्चा छोटा है, इसलिए घर से बाहर जाकर काम नहीं कर सकती। मेरे पति घरों में पेंट करने का काम करते हैं। उनका भी काम नहीं चल रहा है। दैनिक मजदूरी के सभी काम लगभग बंद से हैं।
उषा ने बताया कि अटेंडेंट के तौर पर काम करने से घर में अतिरिक्त राशि आती थी। इससे खर्च आसानी से चल जाता था, लेकिन अब बहुत मुश्किलें आ रही हैं। महंगाई इतनी बढ़ गई है कि अकेले नौकरी कर घर चलाना हमारे जैसे लोगों के लिए काफी मुश्किल हो गया है।
अध्यापकों की नहीं बढ़ी सैलरी
नाम न छापने की शर्त पर निजी स्कूल शिक्षकों ने बताया कि स्कूलों में कोरोना महामारी और आर्थिक संकट का बहाना लगाकर स्कूल स्टाफ की तनख्वाह में पिछले तीन साल से कोई बढ़ोतरी नहीं की गई है। जबकि स्कूल बच्चों से फीस भी ले रहे हैं। डेढ़ साल से ऑनलाइन शिक्षा के दौर में बच्चों की सुबह के साथ शाम में भी कक्षाएं लेते हैं। छुट्टी के दिन ही बच्चों के टेस्ट लिए जाते हैं, जिसके कारण अवकाश भी कम हो गया है। बच्चों को घर में तनाव नहीं हो, इसलिए हर हफ्ते कलात्मक गतिविधियां भी करवानी पड़ती हैं। ऑनलाइन शिक्षण में तनख्वाह कम और काम का दबाव अधिक है।
स्कूलों की सुनिए
पहले कटौती की थी, फिर बहाल कर दिया वेतन
लॉकडाउन की शुरुआत में शिक्षकों की तनख्वाह में दो महीने तक कुछ प्रतिशत की कटौती की गई थी। बाद में महामारी के संकट को देखते हुए मैनेजमेंट ने दोनों महीनों की तनख्वाह बहाल कर दी थी। स्कूल में शिक्षकों से लेकर अन्य स्टाफ नियमित भर्ती पर ही हैं, इसलिए उन्हें पूरी तनख्वाह दी जा रही है। बस पिछले तीन वर्षों से वेतन वृद्धि नहीं की गई है। - लुइस लोपेज, प्राचार्य, सेंट स्टीफंस स्कूल -45
अभिभावक भी नहीं दे रहे पूरी फीस
जब से कोरोना महामारी शुरू हुई है, निजी स्कूलों को अभिभावकों की ओर से पूरी फीस नहीं दी जा रही है। स्कूल में 100 लड़कियों का हॉस्टल भी है, खाली होने के कारण स्कूल के साथ उसका भी खर्च निकालना पड़ रहा है। सभी कर्मचारियों को पूरी तनख्वाह दी जा रही है। पिछले वर्ष लॉकडाउन लगने के चार माह बाद हमने आर्थिक संकट देखते हुए दो दैनिक वेतनभोगी सफाईकर्मियों का काम बंद कर दिया था। हालांकि उन्हें चार माह तक बिना काम के ही तनख्वाह दी थी। -अनुजा शर्मा, प्राचार्या, डीएवी -15
स्कूलों को भी झेलना पड़ रहा आर्थिक संकट
स्कूल फीस में कटौती करने के बाद भी लगभग 9 प्रतिशत अभिभावकों की ओर से अभी स्कूल फीस जमा नहीं करवाई गई है। फीस कम करने और कम जमा होने के कारण स्कूल को आर्थिक बोझ उठाना पड़ रहा है। अभी तक स्कूल में किसी स्टाफ की तनख्वाह में कटौती नहीं की गई है। क्योंकि शिक्षकों के साथ आया, माली, सफाईकर्मी इत्यादि कर्मचारी नियमित तौर पर कार्यरत हैं। - संजीव सरदाना, निदेशक, मानव मंगल स्कूल -21
वेतन पूरा दिया, बढ़ोतरी नहीं की
पिछले डेढ़ वर्ष से कोरोना महामारी के कारण निजी स्कूल आर्थिक संकट में आ गए हैं। हमने इसकी एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर शिक्षा विभाग को भी सौंपी थी, विभाग ने कहा था कि जो अभिभावक फीस नहीं दे पा रहे हैं, उनसे कारण बताओ का शपथपत्र लिया जाए। स्कूल की तरफ से नियमित कर्मचारियों को पूरी तनख्वाह दी जा रही है। बस पिछले लगभग दो वर्ष से किसी भी कर्मचारी की वेतन वृद्धि नहीं की गई है। - नियति चितकारा, निदेशक, चितकारा स्कूल - 25