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राष्ट्रपति मेडल पाने वाले इस सब इंस्पेक्टर ने देश को किया शर्मसार, सजा और जुर्माना दोनों
अमरीश शर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Fri, 27 Apr 2018 12:46 PM IST
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राष्ट्रपति पुरस्कार विजेता सब इंस्पेक्टर
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राष्ट्रपति मेडल मिलना गर्व की बात है, लेकिन यह अवार्ड जीतने वाले चंडीगढ़ के एक सब इंस्पेक्टर ने इस सम्मान और देश को शर्मसार कर दिया। सब इंस्पेक्टर (निलंबित) संजीव कुमार शर्मा राष्ट्रपति मेडल मिलने के बाद भ्रष्टाचार के मामले में दोषी पाया गया। ऐसा कर उसने देश के साथ धोखा किया है। उससे देशभक्त होने की उम्मीद थी। ऐसे में वह सजा में नरमी का हकदार नहीं है।’
सीबीआई की विशेष अदालत की जज गगन गीत कौर ने उक्त टिप्पणी 10 साल पहले 50 हजार रुपये रिश्वत मामले में गिरफ्तार तत्कालीन नीलम चौकी इंचार्ज सब इंस्पेक्टर संजीव कुमार शर्मा और सेक्टर-17 मार्केट के पूर्व प्रधान सुभाष कटारिया के केस में सुनाए अंतिम फैसले में कहीं। अदालत ने दोनों को आपराधिक साजिश और भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के तहत दोषी ठहराते हुए दो-दो साल की सजा सुनाई है। साथ ही दोनों पर 25-25 हजार रुपये जुर्माना भी लगाया है।
हालांकि तीन साल से कम सजा होने पर दोनों को 25-25 हजार रुपये के बेल बांड पर जमानत मिल गई है। वहीं मामले में तीसरे आरोपी सब इंस्पेक्टर (रिटायर्ड) रमेश चंद को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया है। सीबीआई की ओर से केस की पैरवी सरकारी वकील केपी सिंह ने की।
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केस से जुड़े खास पहलू
10 साल और 164 सुनवाइयों के बाद आए फैसले में अदालत ने संजीव कुमार शर्मा और सुभाष कटारिया को दोषी करार दिया। केस में कुछ खास पहलू ये हैं कि सीबीआई को चार्जशीट दायर करने में ही पहले दो साल लग गए। इसका कारण बचाव पक्ष द्वारा मामले में हाईकोर्ट चले जाना था।
सीबीआई ने केस में 36 गवाह बनाए गए थे, जबकि बचाव पक्ष की ओर से बचाव में 15 गवाह पेश किए गए। इतने लंबे चले ट्रायल का मुख्य कारण यह भी था कि बचाव पक्ष द्वारा शिकायतकर्ता सेक्टर-17 स्थित पांडे बुक स्टोर के मालिक अरविंद पांडे का क्रास एग्जामिनेशन करीब एक साल तक चलाया। सौ से ज्यादा पेज का उनका क्रास एग्जामिनेशन रिकार्ड किया गया था।
इन धाराओं में पाया दोषी और सुनाई सजा
- संजीव कुमार और सुभाष कटारिया को आईपीसी की धारा 120बी आर/डब्ल्यू 7, 8, 13 (2), 13 (1) (डी) के तहत दो-दो साल और 5-5 हजार रुपये जुर्माना।
- भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम की धारा 7 के तहत संजीव कुमार को दो साल कैद और 10 हजार रुपये जुर्माना।
- संजीव कुमार को भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम की धारा 13 (2), 13 (1) (डी) के तहत दो साल सजा, दस हजार रुपये जुर्माना।
- सुभाष कटारिया को भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम की धारा 8 के तहत दो साल सजा, 20 हजार रुपये जुर्माना लगाया गया।
यह था मामला
7 नवंबर, 2008 को दर्ज हुए केस के अनुसार अरविंद कुमार पांडे ने अपना बूथ एक गारमेंट डीलर दीनानाथ मिश्रा को किराए पर दिया हुआ था। पांडे और मिश्रा में अक्तूबर 2008 को बूथ को लेकर झगड़ा हो गया। मिश्रा ने डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में सिविल केस फाइल कर दिया। तीन नवंबर 2008 को मिश्रा का पांडे के साथ समझौता हो गया। इसमें तय हुआ कि कोर्ट का फैसला आने तक बूथ की चाबियां मार्केट प्रधान सुभाष कटारिया के पास रहेंगी। यह समझौता एसआई संजीव कुमार की मौजूदगी में हुआ। इसी बीच मिश्रा की एप्लीकेशन पर कोर्ट ने मामले में ‘स्टेटस को’ का फैसला सुना दिया।
पांडे ने 5 नवंबर को संजीव कुमार और सुभाष कटारिया के खिलाफ सीबीआई को शिकायत दी। कहा कि ये दोनों मामले को सेटल करने और उनका बूथ खाली करवाने के लिए 50 हजार रुपये रिश्वत की मांग कर रहे हैं। पांडे की शिकायत पर 7 नवंबर 2008 को सीबीआई ने ट्रैप लगाया। इसके बाद पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार किया। सीबीआई ने जो चार्जशीट कोर्ट में दायर की थी उसमें रमेश चंद को आरोपी बनाया था, लेकिन उन्हें कभी गिरफ्तार नहीं किया गया। केस के बाद विभाग ने 12 नवंबर 2008 को संजीव कुमार को सस्पेंड कर दिया था, लेकिन 7 मई 2010 को उन्हें फिर से नियुक्त कर दिया था।
अदालत ने रिकार्डिंग की सीडी को नहीं माना सबूत
अदालत ने अपने आदेश में शिकायतकर्ता द्वारा रिश्वत मांगते वक्त की बनाई गई ऑडियो रिकार्डिंग को मान्य नहीं माना है। शिकायतकर्ता पांडे ने दोषियों द्वारा रिश्वत मांगते वक्त की रिकॉर्डिंग कर ली थी। उसने तत्कालीन एसआई संजीव, रमेश चंद, सुभाष कटारिया समेत सेक्टर-17 थाने के तत्कालीन एसएचओ और एएसपी की भी रिकॉर्डिंग की थी। इसके बाद मामले की शिकायत सीबीआई को दी थी। सीबीआई ने इसके आधार पर ट्रैप लगाया था। शिकायतकर्ता ने जिस डिवाइस से यह रिकार्डिंग की थी, वह लापता हो गई थी। हालांकि इससे पहले उसने यह रिकार्डिंग कंप्यूटर में सेव कर ली थी। इसकी सीडी बनाकर उसने अदालत में बतौर सबूत पेश की थी। इसे अदालत ने अपने फैसले में अमान्य करार दिया है।
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सीबीआई की विशेष अदालत की जज गगन गीत कौर ने उक्त टिप्पणी 10 साल पहले 50 हजार रुपये रिश्वत मामले में गिरफ्तार तत्कालीन नीलम चौकी इंचार्ज सब इंस्पेक्टर संजीव कुमार शर्मा और सेक्टर-17 मार्केट के पूर्व प्रधान सुभाष कटारिया के केस में सुनाए अंतिम फैसले में कहीं। अदालत ने दोनों को आपराधिक साजिश और भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के तहत दोषी ठहराते हुए दो-दो साल की सजा सुनाई है। साथ ही दोनों पर 25-25 हजार रुपये जुर्माना भी लगाया है।
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हालांकि तीन साल से कम सजा होने पर दोनों को 25-25 हजार रुपये के बेल बांड पर जमानत मिल गई है। वहीं मामले में तीसरे आरोपी सब इंस्पेक्टर (रिटायर्ड) रमेश चंद को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया है। सीबीआई की ओर से केस की पैरवी सरकारी वकील केपी सिंह ने की।
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केस से जुड़े खास पहलू
10 साल और 164 सुनवाइयों के बाद आए फैसले में अदालत ने संजीव कुमार शर्मा और सुभाष कटारिया को दोषी करार दिया। केस में कुछ खास पहलू ये हैं कि सीबीआई को चार्जशीट दायर करने में ही पहले दो साल लग गए। इसका कारण बचाव पक्ष द्वारा मामले में हाईकोर्ट चले जाना था।
सीबीआई ने केस में 36 गवाह बनाए गए थे, जबकि बचाव पक्ष की ओर से बचाव में 15 गवाह पेश किए गए। इतने लंबे चले ट्रायल का मुख्य कारण यह भी था कि बचाव पक्ष द्वारा शिकायतकर्ता सेक्टर-17 स्थित पांडे बुक स्टोर के मालिक अरविंद पांडे का क्रास एग्जामिनेशन करीब एक साल तक चलाया। सौ से ज्यादा पेज का उनका क्रास एग्जामिनेशन रिकार्ड किया गया था।
इन धाराओं में पाया दोषी और सुनाई सजा
- संजीव कुमार और सुभाष कटारिया को आईपीसी की धारा 120बी आर/डब्ल्यू 7, 8, 13 (2), 13 (1) (डी) के तहत दो-दो साल और 5-5 हजार रुपये जुर्माना।
- भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम की धारा 7 के तहत संजीव कुमार को दो साल कैद और 10 हजार रुपये जुर्माना।
- संजीव कुमार को भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम की धारा 13 (2), 13 (1) (डी) के तहत दो साल सजा, दस हजार रुपये जुर्माना।
- सुभाष कटारिया को भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम की धारा 8 के तहत दो साल सजा, 20 हजार रुपये जुर्माना लगाया गया।
यह था मामला
7 नवंबर, 2008 को दर्ज हुए केस के अनुसार अरविंद कुमार पांडे ने अपना बूथ एक गारमेंट डीलर दीनानाथ मिश्रा को किराए पर दिया हुआ था। पांडे और मिश्रा में अक्तूबर 2008 को बूथ को लेकर झगड़ा हो गया। मिश्रा ने डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में सिविल केस फाइल कर दिया। तीन नवंबर 2008 को मिश्रा का पांडे के साथ समझौता हो गया। इसमें तय हुआ कि कोर्ट का फैसला आने तक बूथ की चाबियां मार्केट प्रधान सुभाष कटारिया के पास रहेंगी। यह समझौता एसआई संजीव कुमार की मौजूदगी में हुआ। इसी बीच मिश्रा की एप्लीकेशन पर कोर्ट ने मामले में ‘स्टेटस को’ का फैसला सुना दिया।
पांडे ने 5 नवंबर को संजीव कुमार और सुभाष कटारिया के खिलाफ सीबीआई को शिकायत दी। कहा कि ये दोनों मामले को सेटल करने और उनका बूथ खाली करवाने के लिए 50 हजार रुपये रिश्वत की मांग कर रहे हैं। पांडे की शिकायत पर 7 नवंबर 2008 को सीबीआई ने ट्रैप लगाया। इसके बाद पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार किया। सीबीआई ने जो चार्जशीट कोर्ट में दायर की थी उसमें रमेश चंद को आरोपी बनाया था, लेकिन उन्हें कभी गिरफ्तार नहीं किया गया। केस के बाद विभाग ने 12 नवंबर 2008 को संजीव कुमार को सस्पेंड कर दिया था, लेकिन 7 मई 2010 को उन्हें फिर से नियुक्त कर दिया था।
अदालत ने रिकार्डिंग की सीडी को नहीं माना सबूत
अदालत ने अपने आदेश में शिकायतकर्ता द्वारा रिश्वत मांगते वक्त की बनाई गई ऑडियो रिकार्डिंग को मान्य नहीं माना है। शिकायतकर्ता पांडे ने दोषियों द्वारा रिश्वत मांगते वक्त की रिकॉर्डिंग कर ली थी। उसने तत्कालीन एसआई संजीव, रमेश चंद, सुभाष कटारिया समेत सेक्टर-17 थाने के तत्कालीन एसएचओ और एएसपी की भी रिकॉर्डिंग की थी। इसके बाद मामले की शिकायत सीबीआई को दी थी। सीबीआई ने इसके आधार पर ट्रैप लगाया था। शिकायतकर्ता ने जिस डिवाइस से यह रिकार्डिंग की थी, वह लापता हो गई थी। हालांकि इससे पहले उसने यह रिकार्डिंग कंप्यूटर में सेव कर ली थी। इसकी सीडी बनाकर उसने अदालत में बतौर सबूत पेश की थी। इसे अदालत ने अपने फैसले में अमान्य करार दिया है।