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नाटक 'द फर्स्ट टीचर': यूपी की 14 साल की लड़की की कहानी
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Thu, 26 May 2016 08:48 PM IST
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टैगोर थियेटर में द फर्स्ट टीचर नाटक का मंचन
- फोटो : अमर उजाला
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टैगौर थिएटर में नाटक द फर्स्ट टीचर का मंचन किया गया। इसमें यूपी में रहने वाली 14 साल की लड़की की कहानी दिखाई गई। इसमें दिखाया गया कि समाज में आज भी महिलाओं की शिक्षा पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता है। अगर महिला चाहे तो पूरी दुनिया से लड़ कर शिक्षा हासिल कर सकती है। नाटक डिपार्टमेंट ऑफ कल्चरल अफेयर्स व चंडीगढ़ संगीत व नाटक अकादमी की तरफ से इसका आयोजन हुआ। इसे अलंकार थिएटर ग्रुप की ओर से पेश किया गया।
रशियन लेखक चिंगिजआइन्मातोव द्वारा लिखित इस नाटक का हिन्दी रूपांतरण मंजू यादव ने किया। जिसका निर्देशन च्रकेश कुमार ने किया। नाटक की कहानी उत्तर प्रदेश के जिला मेनपुरी स्थित गांव दौलत पुर में रहने वाली चौदह वर्षीय संगीता नाम की लड़की के आस पास घूमती है। जिसके माता-पिता बचपन में गुजर जाते है। उसकेचाचा-चाची ही उसे पालते हैं। संगीता की चाची उसे बात-बात पर टोकती है और अच्छा व्यवाहर नही करती। एक दिन एक अध्यापक इस गांव में पढ़ाने के लिए आता है। हर घर से वह बच्चों को ढूंढ कर लाता है। वह स्कूल खोल लेता है। जिसका गांव वाले विरोध करते है। क्योंकि वह शिक्षा के प्रति जागरूक नहीं होते है। इन सब के बाद भी अध्यापक स्कूल चलाता है।
उसके पास संगीता भी पढऩे के लिए आती है। समय बीतता रहता है और संगीता के चाचा-चाची पैसे के लिए संगीता की शादी बुजुर्ग के साथ करवाना चाहते है। जिसके लिए अध्यापक संघर्ष करता है। वह इस बात का विरोध करता है। जिसके चलते चाचा-चाची उसे गुंडों से पिटवा देते है और संगीता की शादी बुजुर्ग के साथ कर देते है। लेकिन अध्यापक घायल होन के बावजूद संगीता को इस नर्क से निकाल देता है और पढ़ने के लिए बाहर भेज देता है। पढ़-लिखने के बाद संगीता एक समारोह में भाग लेने के लिए उसी गांव में आती है। वहां वहीं अध्यापक संगीता को समझाता है और उसे अपनी तरह बच्चों को पढ़ाने के लिए कहता है। इसके बाद संगीता मिसाल कायम करके बच्चों को पढ़ाने लगती है।
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रशियन लेखक चिंगिजआइन्मातोव द्वारा लिखित इस नाटक का हिन्दी रूपांतरण मंजू यादव ने किया। जिसका निर्देशन च्रकेश कुमार ने किया। नाटक की कहानी उत्तर प्रदेश के जिला मेनपुरी स्थित गांव दौलत पुर में रहने वाली चौदह वर्षीय संगीता नाम की लड़की के आस पास घूमती है। जिसके माता-पिता बचपन में गुजर जाते है। उसकेचाचा-चाची ही उसे पालते हैं। संगीता की चाची उसे बात-बात पर टोकती है और अच्छा व्यवाहर नही करती। एक दिन एक अध्यापक इस गांव में पढ़ाने के लिए आता है। हर घर से वह बच्चों को ढूंढ कर लाता है। वह स्कूल खोल लेता है। जिसका गांव वाले विरोध करते है। क्योंकि वह शिक्षा के प्रति जागरूक नहीं होते है। इन सब के बाद भी अध्यापक स्कूल चलाता है।
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उसके पास संगीता भी पढऩे के लिए आती है। समय बीतता रहता है और संगीता के चाचा-चाची पैसे के लिए संगीता की शादी बुजुर्ग के साथ करवाना चाहते है। जिसके लिए अध्यापक संघर्ष करता है। वह इस बात का विरोध करता है। जिसके चलते चाचा-चाची उसे गुंडों से पिटवा देते है और संगीता की शादी बुजुर्ग के साथ कर देते है। लेकिन अध्यापक घायल होन के बावजूद संगीता को इस नर्क से निकाल देता है और पढ़ने के लिए बाहर भेज देता है। पढ़-लिखने के बाद संगीता एक समारोह में भाग लेने के लिए उसी गांव में आती है। वहां वहीं अध्यापक संगीता को समझाता है और उसे अपनी तरह बच्चों को पढ़ाने के लिए कहता है। इसके बाद संगीता मिसाल कायम करके बच्चों को पढ़ाने लगती है।
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