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जांच रिपोर्ट खारिज, कासनी का मिजाज शायराना
संजय कुमार/अमर उजाला, रोहतक
Updated Fri, 13 Mar 2015 08:02 AM IST
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पीजीआई में पूर्व सीएम हुकम सिंह के इलाज में लापरवाही पर आईएएस अधिकारी प्रदीप कासनी की जांच रिपोर्ट को खारिज कर दिया गया है। रिपोर्ट खारिज होने के सवाल पर कासनी ने शायराना अंदाज में कहा कि ‘कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, यूं ही कोई बेवफा नहीं होता’।
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कासनी का कहना है कि मेरी जांच को गलत बता रहे लोगों से पूछा जाए कि क्या उन्होंने रिपोर्ट पढ़ी है। बिना रिपोर्ट सार्वजनिक हुए और बगैर कार्रवाई के ही शोर मचाना शुरू कर दिया। कुछ लोग कह रहे हैं कि रिपोर्ट को खारिज कर दिया गया, अच्छा है मेरी रिपोर्ट को फाड़ कर फेंक दो, मसला हल हो जाएगा। डीआरएमई प्रदीप कासनी ने ‘अमर उजाला’ से खास बातचीत में ये सवाल उठाए।
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ईमानदारी से काम करते तो नहीं आती नौबत
जांच से पहले मैं इनमें से किसी अधिकारी को नहीं जानता था। मेरा मकसद आम आदमी की भलाई है। स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज के कहने पर जांच की और रिपोर्ट उन्हें सौंप दी, अब आगे क्या होता है इसके बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता। यदि पीजीआई के कार्यवाहक निदेशक डॉ. रोहताश यादव और फिजिशियन डॉ. ध्रुव चौधरी अपना काम ईमानदारी से करते तो यह नौबत ही नहीं आती।
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मामले में बरती गई लापरवाही पर एक चालक को भी दोषी ठहराया जा सकता था। लेकिन जब तक वरिष्ठ अधिकारी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे तो जूनियर से उम्मीद करना बेकार है। जिम्मेदार अधिकारी को अपनी खामियां व गलती मान लेनी चाहिए। क्योंकि माली से लेकर अधिकारी तक हर किसी की जिम्मेदारी तय होती है।
अब क्या पीजीआई में हालात सुधर गए हैं?
कासनी का कहना है कि इतना हंगामा होने के बाद भी क्या पीजीआई के हालात सुधर गए हैं? मामले में हल्ला मचाने वाले पीजीआई में जा कर ध्यान से देखें तो सब समझ में आ जाएगा। हर जगह अफरा-तफरी है। जब मैं जांच करने गया तो पीजीआई में मरीज चीख रहे थे। एक व्यक्ति ने तो मेरे को शिकायत दी कि उसकी पत्नी 4 घंटे से तड़फ रही है कोई नहीं सुन रहा। क्या यह भी कोई योजना थी। मास्टर हुकम सिंह के परिजनों ने दस खामियां गिनवाई, लेकिन जांच के दौरान तो कइयों ने यहां तक कहा कि मरने वाले मर गए अब छोड़ो इस बात को।
जांच में मेरे साथ रहने वालों को मैं नहीं जानता
जांच के दौरान हेल्थ विवि की कुलसचिव व पूर्व एमएस मेरे साथ थे, मैं तो उन्हें भी नहीं जानता। मैंने अपनी रिपोर्ट किसी के कहने से नहीं बनाई। संस्थान में लोगों से बातचीत करने गया था न कि पूछताछ करने। उस समय मेरे साथ कौन था, उस पर मैंने ध्यान नहीं दिया।
परिजन जब पूर्व सीएम को ले जा रहे थे तो कोई क्यों नहीं गया
जांच अधिकारी प्रदीप कासनी का कहना है कि वीसी कार्यालय से वार्ड 24 का महज 5 मिनट का रास्ता है। जब अधिकारियों व डॉक्टरों का फोन गया कि परिजन एंबुलेंस की व्यवस्था चाहते हैं तो क्या वे मौके पर नहीं जा सकते थे। मास्टर हुकम सिंह आपके मरीज थे, आपकी उनके साथ हमदर्दी है, आप उन्हें नाम से जानते हैं, इसके बाद भी अनदेखी। यहां वीवीआईपी का मसला न भी जोडे़ तो क्या एक डॉक्टर का कोई नैतिक कर्तव्य नहीं बनता कि वह मौके पर पहुंच कर व्यवस्था जांचे। कुलपति कार्यालय में सभी अधिकारी मौजूद थे, लेकिन कोई नहीं गया।
एंबुलेंस में जाने से पहले क्या फिजिशियन ने उनसे जा कर बात की या उन्हें यह बताया कि उन्हें कैसे लेटना है, कैसे दवा लेनी है या क्या एहतियात बरतनी है। जांच रिपोर्ट में कहीं भी नहीं कहा गया कि मरीज को क्या दवा देनी थी और क्या दी गई।
सभी को बात रखने का अधिकार
जांच रिपोर्ट पर सवाल उठाए जा रहे हैं। लोगों का अधिकार है कि वे अपनी बात रखें, चाहे वह कैंडल मार्च के ही जरिए क्यों न हो। पीजीआई एक बेहतर संस्थान है तो अच्छी बात है।
इसे साबित भी कर दो तो बाकी चीजें अपने आप गलत हो जाएंगी। हां, यदि रिपोर्ट के संबंध में पूछा जाएगा तो मैं जवाब भी दूंगा। मेरे विभाग के मंत्री व अधिकारियों ने जांच रिपोर्ट को मान लिया और कार्रवाई की सिफारिश की। आगे क्या होता है, वह हमारे हाथ में नहीं है।