{"_id":"5f2e5d6550196f59022800dc","slug":"pgi-chandigarh-got-gastroenterology-department","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"पीजीआई चंडीगढ़ को 15 साल बाद मिला सर्जिकल गेस्ट्रोएंटोलॉजी डिपार्टमेंट, हो रहा था ये नुकसान","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
पीजीआई चंडीगढ़ को 15 साल बाद मिला सर्जिकल गेस्ट्रोएंटोलॉजी डिपार्टमेंट, हो रहा था ये नुकसान
Sat, 08 Aug 2020 01:38 PM IST
खुशबू गोयल
आशीष वर्मा, चंडीगढ़
आशीष वर्मा, चंडीगढ़
Published by: खुशबू गोयल
Updated Sat, 08 Aug 2020 01:38 PM IST
सार
- 15 साल पहले डिपार्टमेंट बनाने के आदेश हो गए थे, लेकिन बात सिरे नहीं चढ़ पाई
- प्रो. राजेश गुप्ता बनाए गए विभागाध्यक्ष, 25 बेड व दो ऑपरेशन थियेटर अलॉट
विज्ञापन
प्रतीकात्मक तस्वीर
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
आखिरकार 15 साल बाद पीजीआई को स्वतंत्र रूप से सर्जिकल गेस्ट्रोएंट्रोलॉजी डिपार्टमेंट मिल गया है। इससे न सिर्फ मरीजों को राहत मिलेगी, बल्कि यहां से एमसीएच की डिग्री हासिल करने वाले डॉक्टरों को नई पहचान भी मिलेगी। 23 जुलाई को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस संबंध में दिशा-निर्देश व मंजूरी प्रदान की थी। उसके बाद पीजीआई ने भी इस संबंध में आदेश जारी कर दिए हैं।
इसके साथ सर्जरी डिपार्टमेंट के प्रो. राजेश गुप्ता को विभागाध्यक्ष, प्रो. टीडी यादव, प्रो. विकास गुप्ता व एसोसिएट प्रो. डॉ. हरजीत सिंह को डिपार्टमेंट में स्थानांतरित कर दिया गया है। सर्जिकल गेस्ट्रोएंट्रोलॉजी इससे पहले सर्जरी डिपार्टमेंट के अधीन एक डिवीजन के तौर पर काम करता था। पीजीआई से जुड़े सूत्रों ने दावा किया है कि 15 साल पहले इस संबंध में मंजूरी मिल गई थी।
कई बार मीटिंगों में मुद्दा उठा, लेकिन बात सिरे नहीं चढ़ पाई, जबकि देश के दूसरे संस्थानों एम्स व लखनऊ पीजीआई में सर्जिकल गेस्ट्रोएंट्रोलाजी डिपार्टमेंट कई साल पहले बन चुके थे। नई दिल्ली एम्स में साल 1987 में, जबकि लखनऊ पीजीआई में साल 1991 में डिपार्टमेंट का निर्माण हुआ था।
विज्ञापन
यहां तक कि पिछले कुछ साल में जहां एम्स का निर्माण हुआ है, वहां भी डिपार्टमेंट को स्थापित किया जा चुका था। ऐसी स्थिति में पीजीआई लगातार पिछड़ रहा था। पीजीआई डायरेक्टर प्रो. जगतराम व सर्जरी डिपार्टमेंट के एचओडी डॉ. गुरप्रीत सिंह ने इस मुद्दे को गंभीरता से लिया और उसे डिपार्टमेंट के तौर पर स्थापित किया।
विज्ञापन
इसके साथ सर्जरी डिपार्टमेंट के प्रो. राजेश गुप्ता को विभागाध्यक्ष, प्रो. टीडी यादव, प्रो. विकास गुप्ता व एसोसिएट प्रो. डॉ. हरजीत सिंह को डिपार्टमेंट में स्थानांतरित कर दिया गया है। सर्जिकल गेस्ट्रोएंट्रोलॉजी इससे पहले सर्जरी डिपार्टमेंट के अधीन एक डिवीजन के तौर पर काम करता था। पीजीआई से जुड़े सूत्रों ने दावा किया है कि 15 साल पहले इस संबंध में मंजूरी मिल गई थी।
विज्ञापन
कई बार मीटिंगों में मुद्दा उठा, लेकिन बात सिरे नहीं चढ़ पाई, जबकि देश के दूसरे संस्थानों एम्स व लखनऊ पीजीआई में सर्जिकल गेस्ट्रोएंट्रोलाजी डिपार्टमेंट कई साल पहले बन चुके थे। नई दिल्ली एम्स में साल 1987 में, जबकि लखनऊ पीजीआई में साल 1991 में डिपार्टमेंट का निर्माण हुआ था।
विज्ञापन
यहां तक कि पिछले कुछ साल में जहां एम्स का निर्माण हुआ है, वहां भी डिपार्टमेंट को स्थापित किया जा चुका था। ऐसी स्थिति में पीजीआई लगातार पिछड़ रहा था। पीजीआई डायरेक्टर प्रो. जगतराम व सर्जरी डिपार्टमेंट के एचओडी डॉ. गुरप्रीत सिंह ने इस मुद्दे को गंभीरता से लिया और उसे डिपार्टमेंट के तौर पर स्थापित किया।
डिपार्टमेंट नहीं होने से ये हो रहा था नुकसान
सर्जिकल गेस्ट्रों का अलग से डिपार्टमेंट नहीं होने से दो तरह से खामियाजा भुगतना पड़ रहा था। पहला यह कि जो भी जूनियर डॉक्टर यहां से एमसीएच की डिग्री पासआउट करके जाते थे तो उन्हें डिपार्टमेंट के बजाय एक डिवीजन से पासआउट डॉक्टर के तौर पर देखा जाता था।
इसका असर वैकेंसी के इंटरव्यू पर दिखता था, जबकि जो डिपार्टमेंट से पासआउट आते थे, उनकी अलग ही पहचान होती थी। दूसरा, सर्जरी डिपार्टमेंट के अधीन होने से न तो अलग से मरीजों के लिए बेड होते थे और न ही ऑपरेशन थियेटर। सब कुछ सर्जरी डिपार्टमेंट में बराबर बंटता था, जबकि सर्जिकल गेस्ट्रो के मरीज दिन पर दिन बढ़ते जा रहे थे।
घोषणा होते ही मिले बेड और ओटी
पीजीआई की ओर से सर्जिकल डिपार्टमेंट की घोषणा होते ही 23 बेड जनरल वार्ड में, दो बेड एचडीयू में और दो ऑपरेशन थियेटर भी मिल गए हैं। इससे फायदा यह होगा कि अब सर्जरी गेस्ट्रो के मरीजों को ज्यादा बेड मिलेंगे और इलाज भी बेहतर होगा। गेस्ट्रो सर्जिकल में फूड पाइप से संबंधित मरीज, गाल ब्लेडर, लीवर कैंसर, एक्यूट पैनक्रियाज, छोटी व बड़ी आंत और पेट से जुड़ी सर्जरी के इलाज हो सकेंगे।
सर्जिकल गेस्ट्रोएंटोलॉजी को स्वतंत्र डिपार्टमेंट बनाने का मुद्दा काफी दिन से लटका हुआ था, जिसे अब पूरा कर दिया गया है। डिपार्टमेंट के विभागाध्यक्ष और फेकल्टी मेंबर नियुक्त कर दिए गए हैं। बेड व ऑपरेशन थियेटर भी अलॉट कर दिए गए हैं। अब बारी मेडिकल आंकोलॉजी डिपार्टमेंट की है। इस बारे में भी हम लोग तैयार हैं और इसे बनाकर ही रहेंगे।
- प्रो. जगतराम, डायरेक्टर पीजीआई
इसका असर वैकेंसी के इंटरव्यू पर दिखता था, जबकि जो डिपार्टमेंट से पासआउट आते थे, उनकी अलग ही पहचान होती थी। दूसरा, सर्जरी डिपार्टमेंट के अधीन होने से न तो अलग से मरीजों के लिए बेड होते थे और न ही ऑपरेशन थियेटर। सब कुछ सर्जरी डिपार्टमेंट में बराबर बंटता था, जबकि सर्जिकल गेस्ट्रो के मरीज दिन पर दिन बढ़ते जा रहे थे।
घोषणा होते ही मिले बेड और ओटी
पीजीआई की ओर से सर्जिकल डिपार्टमेंट की घोषणा होते ही 23 बेड जनरल वार्ड में, दो बेड एचडीयू में और दो ऑपरेशन थियेटर भी मिल गए हैं। इससे फायदा यह होगा कि अब सर्जरी गेस्ट्रो के मरीजों को ज्यादा बेड मिलेंगे और इलाज भी बेहतर होगा। गेस्ट्रो सर्जिकल में फूड पाइप से संबंधित मरीज, गाल ब्लेडर, लीवर कैंसर, एक्यूट पैनक्रियाज, छोटी व बड़ी आंत और पेट से जुड़ी सर्जरी के इलाज हो सकेंगे।
सर्जिकल गेस्ट्रोएंटोलॉजी को स्वतंत्र डिपार्टमेंट बनाने का मुद्दा काफी दिन से लटका हुआ था, जिसे अब पूरा कर दिया गया है। डिपार्टमेंट के विभागाध्यक्ष और फेकल्टी मेंबर नियुक्त कर दिए गए हैं। बेड व ऑपरेशन थियेटर भी अलॉट कर दिए गए हैं। अब बारी मेडिकल आंकोलॉजी डिपार्टमेंट की है। इस बारे में भी हम लोग तैयार हैं और इसे बनाकर ही रहेंगे।
- प्रो. जगतराम, डायरेक्टर पीजीआई