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पीजीआई चंडीगढ़ के डॉक्टरों का कमाल: बिना दिमाग खोले 3 सेमी की गांठ निकाल बचाई दो मरीजों की जान

Sat, 25 Sep 2021 10:52 AM IST
Trainee Trainee न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: Trainee Trainee Updated Sat, 25 Sep 2021 10:52 AM IST
सार

डॉक्टरों ने बताया कि दोनों मरीजों की एक हफ्ते के अंदर सर्जरी की गई है। गांठ होने के कारण ये मरीज दृष्टिहीन हो चुके थे। अब अगले 24 घंटे के दौरान दिखाई देना शुरू हो गया है। सर्जरी को करने में 6 घंटे का समय लगा। ब्रेन खोलने पर आंखों पर असर आने का डर रहता है। वहीं, रिकवरी भी धीमी गति से होती है।
 

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PGI Chandigarh doctors save two patients life without opening their brains removed lump
पीजीआई में सर्जरी। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पीजीआई चंडीगढ़ के न्यूरो सर्जरी विभाग के विशेषज्ञों की टीम ने दो मरीजों को नई जिंदगी दी। मरीजों के नाक और ब्रेन के पास हुई तीन सेमी की प्लेनम मेनिंगियोमा गांठ को बिना दिमाग खोले निकालने में सफलता हासिल की है। इस सर्जरी को अंजाम देने के लिए विशेषज्ञों ने 4के  एंडोस्कोप सिस्टम का उपयोग कर गांठ को काटकर निकाला है। इससे उन मरीजों को कम होती दृष्टि को बचाने में भी सफलता मिली है। इतना ही नहीं, दिमाग खोलकर की जाने वाली सर्जरी की तुलना में इस तकनीक से मरीजों की रिकवरी भी काफी तेजी से हो रही है। इस तरह की सर्जरी डॉक्टरों की ओर से किया जाना एक अनूठा प्रयास बताया जा रहा है।

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मरीज हो चुके थे दृष्टिहीन, अब देखने लगे दुनिया
सर्जरी करने वाले न्यूरो सर्जरी विभाग के सर्जन डॉ. एसएस ढंडापानी और ईएनटी विभाग की डॉ. रिजुनिता ने बताया कि दोनों मरीजों की एक हफ्ते के अंदर सर्जरी की गई है। आंख के पास गांठ होने के कारण हो रहे दबाव से ये मरीज दृष्टिहीन हो चुके थे, लेकिन सर्जरी के अगले 24 घंटे के दौरान उन्हें धीरे-धीरे दिखाई देना शुरू हो गया है। डॉ. ढंडापानी ने बताया कि इस सर्जरी को करने में 6 घंटे का समय लगा। इसमें 4के एंडोस्कोप सिस्टम से लैस फुल्ली हाई डेफिनेशन रिजॉल्यूशन कैमरे की मदद से बिना ब्रेन खोले नाक के जरिये गांठ को काटकर निकाला गया। ब्रेन खोलने पर आंखों पर असर आने का डर रहता है। वहीं, रिकवरी भी धीमी गति से होती है।
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सर्जरी जटिल, मगर मरीज के लिए फायदेमंद
इस तकनीक से की गई सर्जरी थोड़ी जटिल तो है, लेकिन मरीज के लिए फायदेमंद मानी जाती है। इसमें ब्रेन तक जाने की जरूरत ही नहीं पड़ती। जो मरीज ब्रेन खोलकर की गई सर्जरी में एक महीने बाद धीरे-धीरे देखना शुरू करता है, वहीं, इस तकनीक से मिले इलाज में 24 घंटे के बाद परिणाम आने लगता है। डॉ. ढंडापानी ने कहा कि न्यूरो सर्जरी विभाग के प्रमुख डॉ. सुनील कुमार गुप्ता के उत्साहवर्धन और सहयोग के परिणामस्वरूप ही ऐसी जटिल सर्जरी करने में सफलता प्राप्त हो रही है। टीम में एनेस्थीसिया विभाग की डॉ. शाल्वी और डॉ. राजीव के साथ न्यूरो सर्जरी के डॉ. सिद्धार्थ शामिल थे।

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