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56 साल का हुआ पीजीआई चंडीगढ़, देश ही नहीं दुनिया में मशहूर यहां के डॉक्टर, सफर पर एक नजर
Tue, 16 Jul 2019 01:33 PM IST
खुशबू गोयल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: खुशबू गोयल
Updated Tue, 16 Jul 2019 01:33 PM IST
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पीजीआई चंडीगढ़
- फोटो : फाइल फोटो
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16 जुलाई को पीजीआई चंडीगढ़ पूरे 56 साल का हो गया है। वर्ष 1963 में नेहरू हॉस्पिटल से शुरू हुआ इसका सफर आज पंजाब के संगरूर में सेटेलाइट सेंटर तक पहुंच गया है। नेहरू हास्पिटल के बाद रिसर्च ब्लॉक ए, रिसर्च ब्लॉक बी, एडवांस पीडियाट्रिक सेंटर, एडवांस कार्डियक सेंटर, आई सेंटर और ओपीडी की बिल्डिंग का विस्तार हुआ है। आने वाले सालों में कई और बिल्डिंगें पीजीआई में बनकर तैयार हो जाएंगी। सारंगपुर में भी 50 एकड़ जमीन मिल चुकी हैं।
यहां पर ओपीडी, इमरजेंसी, कैंसर व अन्य सेंटरों का विकास होना है। अपने 56 साल के इस सफर में पीजीआई ने न सिर्फ देश में बल्कि विश्वभर में सफलता के कई नए आयाम तय किए। पीजीआई के कई ऐसे डिपार्टमेंट हैं, जो देशभर में नंबर वन हैं। उनके सामने एम्स भी कहीं नहीं ठहरता। पीजीआई ने कई ऐसे डॉक्टर तैयार किए, जो देश के अलग-अलग हिस्सों में मरीजों की सेवा कर पीजीआई का नाम रोशन कर रहे हैं। हालांकि पीजीआई के सामने कई चुनौतियां भी खड़ी हैं। आइए, पीजीआई की 56 साल की उपलब्धियों और चुनौतियों पर नजर डालते हैं।
सात से ज्यादा राज्यों के मरीजों की करता है सेवा
पीजीआई में देश के सात से ज्यादा प्रदेशों के मरीज इलाज के लिए आते हैं। इनमें चंडीगढ़, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर के मरीज शामिल हैं। इसके अतिरिक्त राजस्थान, बिहार, पश्चिम बंगाल और नेपाल के भी काफी मरीज इलाज के लिए पीजीआई आते हैं।
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यहां पर ओपीडी, इमरजेंसी, कैंसर व अन्य सेंटरों का विकास होना है। अपने 56 साल के इस सफर में पीजीआई ने न सिर्फ देश में बल्कि विश्वभर में सफलता के कई नए आयाम तय किए। पीजीआई के कई ऐसे डिपार्टमेंट हैं, जो देशभर में नंबर वन हैं। उनके सामने एम्स भी कहीं नहीं ठहरता। पीजीआई ने कई ऐसे डॉक्टर तैयार किए, जो देश के अलग-अलग हिस्सों में मरीजों की सेवा कर पीजीआई का नाम रोशन कर रहे हैं। हालांकि पीजीआई के सामने कई चुनौतियां भी खड़ी हैं। आइए, पीजीआई की 56 साल की उपलब्धियों और चुनौतियों पर नजर डालते हैं।
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सात से ज्यादा राज्यों के मरीजों की करता है सेवा
पीजीआई में देश के सात से ज्यादा प्रदेशों के मरीज इलाज के लिए आते हैं। इनमें चंडीगढ़, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर के मरीज शामिल हैं। इसके अतिरिक्त राजस्थान, बिहार, पश्चिम बंगाल और नेपाल के भी काफी मरीज इलाज के लिए पीजीआई आते हैं।
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राज्य मरीज प्रतिशत
पंजाब 1087420 19.0
चंडीगढ़ 546468 37.9
हरियाणा 541764 18.9
हिमाचल प्रदेश 359273 12.5
उत्तर प्रदेश 133554 4.7
जम्मू कश्मीर 74131 1.2
अन्य राज्य 91970 3.2
हर साल देश को 100-150 स्पेशलिस्ट व सुपर स्पेशलिस्ट देता है पीजीआई
पीजीआई चंडीगढ़ की उपलब्धि का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां से हर साल देश को 100-150 स्पेशलिस्ट व सुपरस्पेशलिस्ट डॉक्टर मिलते हैं। यह डॉक्टर देश के कई प्रदेशों में मरीजों की सेवा कर रहे हैं। सार्क देशों के स्टूडेंट भी यहां पढ़ाई के लिए आते हैं और सुपरस्पेशलिस्ट बनकर अपने देश जाते हैं और पीजीआई का नाम रोशन करते हैं। पीजीआई में इस समय 640 जूनियर रेजिडेंस व 262 सीनियर रेजिडेंस हैं। इसके अतिरिक्त 500 फैकल्टी मेंबर हैं। जुलाई के आखिर तक फैकल्टी मेंबरों की संख्या 600 पार हो जाएगी।
पंजाब 1087420 19.0
चंडीगढ़ 546468 37.9
हरियाणा 541764 18.9
हिमाचल प्रदेश 359273 12.5
उत्तर प्रदेश 133554 4.7
जम्मू कश्मीर 74131 1.2
अन्य राज्य 91970 3.2
हर साल देश को 100-150 स्पेशलिस्ट व सुपर स्पेशलिस्ट देता है पीजीआई
पीजीआई चंडीगढ़ की उपलब्धि का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां से हर साल देश को 100-150 स्पेशलिस्ट व सुपरस्पेशलिस्ट डॉक्टर मिलते हैं। यह डॉक्टर देश के कई प्रदेशों में मरीजों की सेवा कर रहे हैं। सार्क देशों के स्टूडेंट भी यहां पढ़ाई के लिए आते हैं और सुपरस्पेशलिस्ट बनकर अपने देश जाते हैं और पीजीआई का नाम रोशन करते हैं। पीजीआई में इस समय 640 जूनियर रेजिडेंस व 262 सीनियर रेजिडेंस हैं। इसके अतिरिक्त 500 फैकल्टी मेंबर हैं। जुलाई के आखिर तक फैकल्टी मेंबरों की संख्या 600 पार हो जाएगी।
पीजीआई ये डिपार्टमेंट हैं देश की शान
क्लीनिकल हीमेटोलाजी ऑंकोलाजी एंड बोनमैरो सेंटर : यह सेंटर पीजीआई के इंटरनल मेडिसिन डिपार्टमेंट के अंतर्गत आता है। इसमें ब्लड से संबंधित रोग व कैंसर का इलाज किया जाता है। साल 2003 में बोन मैरो ट्रांसप्लांट सेंटर की शुरुआत की गई थी। सीनियर प्रोफेसर डा. पंकज मल्होत्रा के मुताबिक एक साल में 40-50 बोन मैरो ट्रांसप्लांट होते हैं। जो सक्सेस रेट विश्व के सर्वोच्च संस्थान के हैं, वही सक्सेस रेट पीजीआई का है। बोन मैरो मल्टीप्ल मायलोमा, ल्यूकेमिया, एप्लेस्टिक एनिमिया व थैलीसीमिया से पीड़ित मरीज के किए जाते हैं।
इम्यूनो डिफेसिएशंसी से पीड़ित बच्चों के ट्रांसप्लांट भी पीजीआई करता है। सीएमएल के मरीजों की आयु बढ़ाने का श्रेय भी पीजीआई को ही जाता है। मैजिक बुलेट की खोज डा. पंकज की देन है। मैजिक बुलेट खाने से सीएमएल यानी क्रोनिक मायोलोएड ल्यूकेमिया का मरीज भी आम व्यक्ति की तरह जीवन बिता सकता है। यह सेंटर ब्लड कैंसर व ब्लड से संबंधित बीमारियों के एक साल में करीब 45 हजार मरीज को देखता है।
पीडियाएट्रिक सर्जरी : यह देश एक ऐसा सेंटर है, जहां सबसे ज्यादा बच्चों की सर्जरी होती है। डिपार्टमेंट के एचओडी प्रोफेसर राम समुझ ने बताया कि एक साल में यहां पर चार हजार से ज्यादा सर्जरी की जाती हैं। इनमें वे बच्चे होते हैं, जिनमें खाने के नली या पॉटी की नली नहीं होती है। उन्हें यहां के सर्जन अपने हुनर से कृत्रिम रास्ता बना देते हैं। इससे इन बच्चों को नया जीवन मिलता है। चार से तीन साल पहले यहां के सर्जन रवि कनौजिया ने एक साथ जुड़े दो बच्चों को सुरक्षित अलग कर नया इतिहास रचा था।
इम्यूनो डिफेसिएशंसी से पीड़ित बच्चों के ट्रांसप्लांट भी पीजीआई करता है। सीएमएल के मरीजों की आयु बढ़ाने का श्रेय भी पीजीआई को ही जाता है। मैजिक बुलेट की खोज डा. पंकज की देन है। मैजिक बुलेट खाने से सीएमएल यानी क्रोनिक मायोलोएड ल्यूकेमिया का मरीज भी आम व्यक्ति की तरह जीवन बिता सकता है। यह सेंटर ब्लड कैंसर व ब्लड से संबंधित बीमारियों के एक साल में करीब 45 हजार मरीज को देखता है।
पीडियाएट्रिक सर्जरी : यह देश एक ऐसा सेंटर है, जहां सबसे ज्यादा बच्चों की सर्जरी होती है। डिपार्टमेंट के एचओडी प्रोफेसर राम समुझ ने बताया कि एक साल में यहां पर चार हजार से ज्यादा सर्जरी की जाती हैं। इनमें वे बच्चे होते हैं, जिनमें खाने के नली या पॉटी की नली नहीं होती है। उन्हें यहां के सर्जन अपने हुनर से कृत्रिम रास्ता बना देते हैं। इससे इन बच्चों को नया जीवन मिलता है। चार से तीन साल पहले यहां के सर्जन रवि कनौजिया ने एक साथ जुड़े दो बच्चों को सुरक्षित अलग कर नया इतिहास रचा था।
हीपेटोलॉजी डिपार्टमेंट : हैपेटाइटिस बी के इलाज में इस डिपार्टमेंट का पूरे देश में कोई सानी नहीं है। हैपेटाइटिस बी से ग्रसित हजारों मरीजों को नया जीवन दिया है। देश में सबसे पहले डीएम इन हीप्टोलाजी कोर्स शुरू करने का श्रेय इस डिपार्टमेंट को ही जाता है। पब्लिक सेक्टर के किसी हास्पिटल में यदि लिवर ट्रांसप्लांट होता है तो वह सिर्फ पीजीआई में ही होता है। एम्स में भी लिवर ट्रांसप्लांट की सुविधा नहीं है। अब तक 100 से ज्यादा लिवर ट्रांसप्लांट किए जा चुके हैं। डोनर लाइव लिवर ट्रांसप्लांट की भी सुविधा शुरू की गई है। हालांकि अभी इसकी शुरुआत है, लेकिन आने वाले समय में इसमें भी पीजीआई दक्ष हो जाएगा।
रीनल ट्रांसप्लांट सर्जरी : पीजीआई का यह डिपार्टमेंट पूरे देश में पायनियर है। पैंक्रियाज ट्रांसप्लांट सिर्फ पीजीआई में ही हो रहे हैं। अब तक 19 पैंक्रियाज ट्रांसप्लांट किए जा चुके हैं। यह सुविधा देश के अन्य किसी पब्लिक हास्पिटल में उपलब्ध नहीं है। कार्डियक डेथ के बाद ट्रांसप्लांट भी सिर्फ पीजीआई में होता है। अब तक पीजीआई ऐसे 24 केस को सफलतापूर्वक अंजाम दे चुका है। डायलिसिस वाले मरीजों का अक्सर फिस्टुला खराब हो जाता है। इसके लिए रीनल ट्रांसप्लांट डिपार्टमेंट अल्ट्रासाउंड गाइडेड एंजियो प्लास्टी से पेशेंट को ठीक किया जाता है। यह सुविधा भी सिर्फ पीजीआई में ही उपलब्ध है।
रीनल ट्रांसप्लांट सर्जरी : पीजीआई का यह डिपार्टमेंट पूरे देश में पायनियर है। पैंक्रियाज ट्रांसप्लांट सिर्फ पीजीआई में ही हो रहे हैं। अब तक 19 पैंक्रियाज ट्रांसप्लांट किए जा चुके हैं। यह सुविधा देश के अन्य किसी पब्लिक हास्पिटल में उपलब्ध नहीं है। कार्डियक डेथ के बाद ट्रांसप्लांट भी सिर्फ पीजीआई में होता है। अब तक पीजीआई ऐसे 24 केस को सफलतापूर्वक अंजाम दे चुका है। डायलिसिस वाले मरीजों का अक्सर फिस्टुला खराब हो जाता है। इसके लिए रीनल ट्रांसप्लांट डिपार्टमेंट अल्ट्रासाउंड गाइडेड एंजियो प्लास्टी से पेशेंट को ठीक किया जाता है। यह सुविधा भी सिर्फ पीजीआई में ही उपलब्ध है।
रूमेटोलॉजी विंग : यह इंटरनल मेडिसिन डिपार्टमेंट के अंतर्गत आता है। इसमें गठिया, वस्कुलाइटिस, रेलेप्सिंग पालीक्रोडाइटिस व अन्य गंभीर मरीजों का इलाज किया जाता है। प्रोफेसर अमन शर्मा ने बताया कि इस बीमारी से ग्रसित मरीज पूरे देश से इलाज के लिए पीजीआई में आते हैं। इस विंग का रिसर्च, टीचिंग और पेशेंट केयर इंटरनेशनल स्टैंडर्ड का है।
प्रोफेसर अमन शर्मा कई इंटरनेशनल संस्थाओं में सक्रिय सदस्य के तौर पर काम कर चुके हैं। वे अमेरिकन कालेज आफ रूमेटोलाजी की एनुअल प्लानिंग कमेटी के मेंबर भी रहे हैं। इसमें अमेरिका के बाहर सिर्फ एक या दो सदस्यों को नियुक्त किया जाता है, जिसमें से एक प्रोफेसर अमन शर्मा हैं। डीएम इन रूमेटोलॉजी का कोर्स शुरू करने का श्रेय भी पीजीआई को जाता है।
एडवांस आई सेंटर : आई सेंटर ने इस देश के लाखों मरीजों को नई रोशनी दी है। चाहे वह बच्चा हो या एडल्ट। मोतियाबिंद, ग्लूकोमा, आई इंजरी और अंधता की बीमारी के इलाज में पीजीआई से बेहतर कोई दूसरा संस्थान इस देश में नहीं है। इलाज की कई तकनीक आईसेंटर ने ही ईजाद की है। उस तकनीक का इस्तेमाल सिर्फ भारत के नहीं बल्कि विश्व के कई सेंटर कर रहे हैं। कई कोर्सेज सिर्फ आई सेंटर ही संचालित करता है।
प्रोफेसर अमन शर्मा कई इंटरनेशनल संस्थाओं में सक्रिय सदस्य के तौर पर काम कर चुके हैं। वे अमेरिकन कालेज आफ रूमेटोलाजी की एनुअल प्लानिंग कमेटी के मेंबर भी रहे हैं। इसमें अमेरिका के बाहर सिर्फ एक या दो सदस्यों को नियुक्त किया जाता है, जिसमें से एक प्रोफेसर अमन शर्मा हैं। डीएम इन रूमेटोलॉजी का कोर्स शुरू करने का श्रेय भी पीजीआई को जाता है।
एडवांस आई सेंटर : आई सेंटर ने इस देश के लाखों मरीजों को नई रोशनी दी है। चाहे वह बच्चा हो या एडल्ट। मोतियाबिंद, ग्लूकोमा, आई इंजरी और अंधता की बीमारी के इलाज में पीजीआई से बेहतर कोई दूसरा संस्थान इस देश में नहीं है। इलाज की कई तकनीक आईसेंटर ने ही ईजाद की है। उस तकनीक का इस्तेमाल सिर्फ भारत के नहीं बल्कि विश्व के कई सेंटर कर रहे हैं। कई कोर्सेज सिर्फ आई सेंटर ही संचालित करता है।
इन चुनौतियों से जूझ रहा है पीजीआई
रिसर्च : क्वालिटी रिसर्च के मामले में पीजीआई पिछड़ता जा रहा है। पूरे साल पीजीआई एक हजार से ज्यादा रिसर्च प्रकाशित करता है, लेकिन उनमें से हाई इंपेक्ट में प्रकाशित होने वाली स्टडी नाम मात्र की होती है। पीजीआई के पास पेटेंट भी सिर्फ आधा दर्जन है। पीजीआई ने इसके लिए दो साल पहले डीन रिसर्च का पद बनाया था, लेकिन कोई खास फायदा नहीं हो सका।
पेशेंट लोड : पीजीआई में एक साल में 28 लाख से ज्यादा मरीज देखे जाते हैं। हर साल डेढ़ से दो लाख नए मरीज जुड़ जाते हैं। यदि यही हालात रहे तो अगले कुछ सालों में पीजीआई में पैर रखने की जगह नहीं मिलेगी। यह हालात पड़ोसी राज्यों की वजह से बने हैं। वे अपने यहां न तो इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार कर रहे हैं और न ही डॉक्टरों के लिए बेहतर माहौल। इस वजह से सारे मरीज पीजीआई आते हैं, जो पीजीआई की तरक्की की राह में रोड़े बनकर खड़ा है।
गुटबाजी : हालांकि अब यह किसी से छिपा नहीं रहा है कि पीजीआई में हेडशिप को लेकर प्रोफेसरों के बीच किस तरह की जंग होती है। इस वजह से सीनियर प्रोफेसर के बीच मनमुटाव रहता है और एकजुटता नहीं दिखती। इस बात से पीजीआई का प्रशासन भी वाकिफ है, लेकिन अब तक कोई ठोस नीति तैयार नहीं हो सकी। जो पीजीआई के लिए जी का जंजाल बनती जा रही है।
पेशेंट लोड : पीजीआई में एक साल में 28 लाख से ज्यादा मरीज देखे जाते हैं। हर साल डेढ़ से दो लाख नए मरीज जुड़ जाते हैं। यदि यही हालात रहे तो अगले कुछ सालों में पीजीआई में पैर रखने की जगह नहीं मिलेगी। यह हालात पड़ोसी राज्यों की वजह से बने हैं। वे अपने यहां न तो इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार कर रहे हैं और न ही डॉक्टरों के लिए बेहतर माहौल। इस वजह से सारे मरीज पीजीआई आते हैं, जो पीजीआई की तरक्की की राह में रोड़े बनकर खड़ा है।
गुटबाजी : हालांकि अब यह किसी से छिपा नहीं रहा है कि पीजीआई में हेडशिप को लेकर प्रोफेसरों के बीच किस तरह की जंग होती है। इस वजह से सीनियर प्रोफेसर के बीच मनमुटाव रहता है और एकजुटता नहीं दिखती। इस बात से पीजीआई का प्रशासन भी वाकिफ है, लेकिन अब तक कोई ठोस नीति तैयार नहीं हो सकी। जो पीजीआई के लिए जी का जंजाल बनती जा रही है।