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14 महीने में पीजीआई के खिलाफ 273 केस
आशीष वर्मा/ अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Fri, 10 Jan 2014 11:07 AM IST
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पीजीआई अपने एडवांस इलाज से कई राज्यों के मरीजों को संतुष्ट कर रहा है, लेकिन संस्थान के कई प्रोफेसर व कर्मचारी खुश नहीं है।
वे इतना ज्यादा तंग हो रहे हैं कि छोटी सी बात पर अदालत का दरवाजा खटखटाने चले जाते हैं। नतीजा पीजीआई के खिलाफ मुकदमों का भार बढ़ गया है।
सूचना के अधिकार कानून के तहत मांगी गई जानकारी से पता चला कि मात्र 14 महीने के भीतर संस्थान के खिलाफ 273 केस अदालत में फाइल किए गए।
यानी हर डेढ़ दिन में एक केस पीजीआई के खिलाफ अदालत में पहुंचा। कोर्ट में यह केस एक जनवरी 2012 से लेकर 31 मार्च 2013 तक दायर हुए हैं।
कानून से जुड़े विशेषज्ञ बताते हैं कि यदि एक संस्थान के लिए खिलाफ इतने ज्यादा केस फाइल किए गए हैं तो यह न तो संस्थान के लिए अच्छी बात है और न उनके कर्मचारियों के लिए।
एक तो पीजीआई में मरीजों को बोझ काफी अधिक है। इससे डाक्टर व कर्मचारी तनाव में रहते हैं। संस्थान प्रोत्साहित करने के बजाए अपने साथियों की मांगों को दरकिनार कर देते हैं।
आखिर में उन्हें परेशान होकर अदालत का रास्ता अपनाना पड़ता है। इनमें से ज्यादा केस प्रमोशन, सैलरी, नौकरी व अन्य मुद्दे को लेकर है।
35 लाख रुपये से ज्यादा फूंक दिए
आरटीआई की जानकारी से पता चला है कि इन केसों से निपटने के लिए पीजीआई ने अपने वकीलों को इन 14 महीने में करीब 35 लाख रुपये खर्च किए, जबकि कागज, अदालत की कॉपी और गाड़ी के खरचे के बारे में कोई भी जानकारी नहीं दी गई।
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सूत्र बताते हैं कि इनमें करीब आठ से दस लाख रुपये का खर्च आया है। 14 महीने में खर्च की गई यह राशि काफी अधिक है।
पीजीआई ने बताया है कि इन केसों में 106 मामले अदालत ने उनके पक्ष में दिए, जबकि 49 केस संस्थान के खिलाफ आया है। इन 49 में से 32 केसों को फिर से पीजीआई ने चैलेंज किया है।
बाकी केसों की कोर्ट में सुनवाई चल रही है। यहां बताना जरूरी है कि जिन केसों को अदालत में दोबारा से चैलेंज किया गया है, उन पर फिर से खर्चा होगा।
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वे इतना ज्यादा तंग हो रहे हैं कि छोटी सी बात पर अदालत का दरवाजा खटखटाने चले जाते हैं। नतीजा पीजीआई के खिलाफ मुकदमों का भार बढ़ गया है।
सूचना के अधिकार कानून के तहत मांगी गई जानकारी से पता चला कि मात्र 14 महीने के भीतर संस्थान के खिलाफ 273 केस अदालत में फाइल किए गए।
यानी हर डेढ़ दिन में एक केस पीजीआई के खिलाफ अदालत में पहुंचा। कोर्ट में यह केस एक जनवरी 2012 से लेकर 31 मार्च 2013 तक दायर हुए हैं।
कानून से जुड़े विशेषज्ञ बताते हैं कि यदि एक संस्थान के लिए खिलाफ इतने ज्यादा केस फाइल किए गए हैं तो यह न तो संस्थान के लिए अच्छी बात है और न उनके कर्मचारियों के लिए।
एक तो पीजीआई में मरीजों को बोझ काफी अधिक है। इससे डाक्टर व कर्मचारी तनाव में रहते हैं। संस्थान प्रोत्साहित करने के बजाए अपने साथियों की मांगों को दरकिनार कर देते हैं।
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आखिर में उन्हें परेशान होकर अदालत का रास्ता अपनाना पड़ता है। इनमें से ज्यादा केस प्रमोशन, सैलरी, नौकरी व अन्य मुद्दे को लेकर है।
35 लाख रुपये से ज्यादा फूंक दिए
आरटीआई की जानकारी से पता चला है कि इन केसों से निपटने के लिए पीजीआई ने अपने वकीलों को इन 14 महीने में करीब 35 लाख रुपये खर्च किए, जबकि कागज, अदालत की कॉपी और गाड़ी के खरचे के बारे में कोई भी जानकारी नहीं दी गई।
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सूत्र बताते हैं कि इनमें करीब आठ से दस लाख रुपये का खर्च आया है। 14 महीने में खर्च की गई यह राशि काफी अधिक है।
पीजीआई ने बताया है कि इन केसों में 106 मामले अदालत ने उनके पक्ष में दिए, जबकि 49 केस संस्थान के खिलाफ आया है। इन 49 में से 32 केसों को फिर से पीजीआई ने चैलेंज किया है।
बाकी केसों की कोर्ट में सुनवाई चल रही है। यहां बताना जरूरी है कि जिन केसों को अदालत में दोबारा से चैलेंज किया गया है, उन पर फिर से खर्चा होगा।