अवार्ड वापसी: बादल के सियासी दांव पर ढींढसा का पेच, पढ़ें- पंजाब की राजनीति पर क्या होगा असर
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कृषि कानूनों के विरोध में पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल और बादल परिवार से बागी होकर नए शिअद (लोकतांत्रिक) का गठन कर सिख राजनीति के समीकरण बदलने का प्रयास कर रहे सुखदेव सिंह ढींढसा द्वारा पद्म सम्मान वापस करने के पीछे पंथक वोट बैंक पर वर्चस्व बढ़ाने की लड़ाई है। बरगाड़ी बेअदबी व बहिबल कलां गोलीकांड के बाद विधानसभा चुनाव में करारी हार का सामना करने वाले शिअद (बादल) को श्री गुरु ग्रंथ साहिब के लापता पावन स्वरूपों के मामले में भी बचे हुए पंथक वोट बैंक छिटकने का डर सता रहा है।
पंथक वोट में किसानों का बड़ा हिस्सा है। अगले साल एसजीपीसी चुनाव भी होंगे। इसी वोट बैंक को फिर शिअद के पाले में करने के लिए बादल ने राष्ट्रपति को पद्म विभूषण वापस कर तुरुप का पत्ता खेला। इससे पहले मोदी की कैबिनेट से हरसिमरत कौर बादल का इस्तीफा भी किसानों को अपने पक्ष में नहीं कर पाया।
शिअद के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल भी किसानों का समर्थन नहीं हासिल कर सके। हालांकि प्रकाश सिंह बादल के इस राजनीतिक दांव की धार को चंद घंटे में ही सुखदेव सिंह ढींढसा ने सम्मान लौटाकर कुंद कर दी है।
बता दें कि पूर्व सीएम बादल द्वारा पद्म विभूषण वापस करने की घोषणा के कुछ मिनट बाद ही विरोधी गुट के सुखदेव सिंह ढींढसा ने पद्म भूषण सम्मान वापस करने की घोषणा कर दी। बादल परिवार से छिटक चुके पंथक वोट बैंक पर अपनी पकड़ बनाने के लिए ढींढसा ने सम्मान वापस कर एसजीपीसी व विधानसभा चुनाव में शिअद (लोकतांत्रिक) के रूप में एक बार फिर बादल परिवार का विकल्प पेश कर दिया है।
ढींढसा के बेटे व विधायक परमिंदर सिंह ढींढसा जिस प्रकार किसान आंदोलन के समर्थन में उतरे हैं, इससे स्पष्ट है कि प्रदेश में शिअद (बादल) व शिअद (लोकतांत्रिक) के बीच पंथक वोटों को अपने-अपने पक्ष में करने की लड़ाई तेज हो गई है।
दोनों अकाली नेताओं द्वारा लौटाए गए सम्मान का पंथक वोट बैंक पर क्या प्रभाव पड़ेगा, इसका पता तो एसजीपीसी चुनाव परिणाम से लगेगा। लेकिन यह स्पष्ट है कि बादल की इस चाल पर ढींढसा ने पलटवार कर दिया है। सुखबीर बादल द्वारा पंथक वोट बैंक की सहानुभूति पाने को बिछाई बिसात में ढींढसा ने अपना सियासी पासा चला है। ढींढसा के इस अप्रत्याशित कदम ने सिख राजनीति को एक नई दिशा की तरफ मोड़ दिया है। किसानों के इस संघर्ष में शिअद को अभी तक कोई भी सियासी लाभ मिलता दिखाई नहीं दे रहा है। केंद्र सरकार से इस्तीफा देने के बाद शिअद ऐसी स्थित में नहीं है कि वह किसान संघर्ष में अपनी भूमिका निभा सके।