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सिद्धू की सियासत: बगावत से नवजोत का पुराना नाता, कभी अजहरुदीन तो कभी अरुण जेटली के खिलाफ खोला मोर्चा

Wed, 29 Sep 2021 01:38 AM IST
ajay kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जालंधर (पंजाब)
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जालंधर (पंजाब) Published by: ajay kumar Updated Wed, 29 Sep 2021 01:38 AM IST
सार

नवजोत सिंह सिद्धू का बगावत से पुराना नाता रहा है। क्रिकेट के मैदान से लेकर सियासी अखाड़े तक सिद्धू ने धुरंधरों के खिलाफ मोर्चा खोला। बगावत की सूची में अरुण जेटली, मोहम्मद अजहरुदीन और कैप्टन अमरिंदर सिंह का नाम शामिल हैं। सिद्धू ने इन लोगों के खिलाफ भी मोर्चा खोला। 

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Old relation of Navjot Singh Sidhu with the rebellion
मोहम्मद अजहरुदीन, नवजोत सिद्धू और अरुण जेटली। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

नवजोत सिंह सिद्धू ने क्रिकेट से लेकर राजनीति की पिच पर अपने आसपास के लोगों को असहज किया है। जिसे राजनीति का गुरू बनाया उसके खिलाफ भी बगावत की। क्रिकेटर के तौर पर दौरा बीच में छोड़ना हो या फिर राज्यसभा से इस्तीफा देकर दल बदलना। सिद्धू अपने बगावती सुरों से सुर्खियां बटोरते रहे हैं

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किक्रेट में कप्तान के खिलाफ की बगावत
नवजोत सिंह सिद्धू 2004 में राजनीति में आए। खेल में उनका कैरियर विवादों से दूर नहीं रहा। क्रिकेट प्रेमियों को याद होगा कि 1996 के इंग्लैंड दौरे के वक्त नवजोत सिंह सिद्धू कप्तान मोहम्मद अजहरुद्दीन से बगावत कर बीच दौरे में स्वदेश लौट आए थे। काफी बवाल मचा और बात उठी कि एक संयम रखना खिलाड़ी का सबसे बड़ा गुण है।
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अरुण जेटली के खिलाफ भी खोल चुके मोर्चा
नवजोत सिंह सिद्धू 2004 में भाजपा की टिकट पर अमृतसर से लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंचे। उन पर उस वक्त एक पुराना मुकदमा चल रहा था। पटियाला निवासी गुरनाम सिंह को पार्किंग विवाद के दौरान पीटने का आरोप था। सुप्रीम कोर्ट में बीजेपी के वरिष्ठ नेता रहे अरुण जेटली ने सिद्धू की पैरवी की और सिद्धू को जमानत मिली। 
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सिद्धू ने अपनी सियासी पारी में अरुण जेटली को अपना गुरू बना लिया। 2014 में बीजेपी ने यहां से अरुण जेटली को अपना उम्मीदवार बनाया तो सिद्धू ने घोषणा कर दी कि वह चुनाव नहीं लड़ेंगे। महत्वाकांक्षी सिद्धू ने इसके बाद बगावती सुर अख्तियार कर लिया। वह अपने सियासी गुरू अरुण जेटली का चुनाव प्रचार करने अमृतसर नहीं पहुंचे। 

अकाली दल के बड़े अलोचक

किसी समय बिक्रम सिंह मजीठिया व सुखबीर बादल की शान में कसीदे पढ़ने वाले सिद्धू ने उनकी जमकर अलोचना करनी शुरू कर दी। उनके इस व्यवहार ने तत्कालीन भाजपा प्रधान कमल शर्मा को खासी परेशानी में डाल दिया। सिद्धू ने भ्रष्टाचार, केबल माफिया, खनन माफिया जैसे मुद्दों को लेकर कई मौकों पर अकाली दल पर निशाना साधा। वहीं, भाजपा नेताओं को भी लपेटना शुरू कर दिया। सिद्धू की पत्नी नवजोत कौर सिद्धू तब मुख्य संसदीय सचिव थीं। अप्रैल, 2016 में सिद्धू राज्यसभा सांसद बने लेकिन उन्होंने तीन महीने बाद अपना इस्तीफा दे दिया।

राजनीतिक गलियारों में तब यह चर्चा उभरने लगी थी कि नवजोत सिद्धू अब आम आदमी पार्टी का दामन थामेंगे। वही राज्य में मुख्यमंत्री का चेहरा होंगे। इसके उलट उन्होंने 2017 के विधानसभा चुनावों से कुछ सप्ताह पूर्व कांग्रेस का दामन थाम लिया। उससे पहले उन्होंने आवाज-ए-पंजाब फोरम का गठन किया था, जिसमें बैंस बंधु और परगट सिंह भी शामिल थे।

2017 में बने थे कैबिनेट मंत्री
2017 में कांग्रेस पार्टी पंजाब में सत्ता में आई और सिद्धू कैबिनेट मंत्री बने। कुछ ही महीनों के बाद उन्होंने अमृतसर के मेयर के चुनाव पर अपनी नाराजगी जाहिर की और कैप्टन के खिलाफ बगावत शुरू कर दी। सिद्धू ने इसके बाद केबल नेटवर्कों पर मनोरंजन कर और रेत के खनन के लिए कार्पोरेशन बनाने का प्रस्ताव दिया, जिसे खारिज कर दिया गया। 

2019 में कैप्टन ने बदला विभाग तो बढ़ी रार
2019 में कैप्टन अमरिंदर सिंह ने सिद्धू का मंत्रालय बदल दिया। विरोध में सिद्धू ने पदभाग ग्रहण किए बिना इस्तीफा दे दिया। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने नवजोत सिंह सिद्धू को शपथ ग्रहण का न्योता भेजा था। कैप्टन अमरिंदर सिंह ने सिद्धू से इस समारोह में नहीं जाने की अपील की लेकिन सिद्धू वाघा बार्डर के रास्ते पाकिस्तान पहुंचे। 

वहां करतारपुर कॉरिडोर खोलने की पेशकश पर वो पाकिस्तान सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा से गले भी मिले। अमरिंदर सिंह की सरकार इस मुद्दे पर बुरी तरह से घिर गई। तेलंगाना में कांग्रेस का प्रचार करते हुए सिद्धू ने कहा था कि कैप्टन अमरिंदर सिंह के भी कैप्टन राहुल गांधी ही हैं। सिद्धू के इस बयान की पंजाब कांग्रेस में काफी आलोचना हुई। 

प्रदेश अध्यक्ष बने लेकिन चंद दिनों में छोड़ा
2019 के लोकसभा चुनाव के प्रचार में सिद्धू ज्यादा नहीं दिखे पर प्रियंका गांधी के कहने पर उन्होंने बठिंडा में प्रचार किया। लंबे इंतजार के बाद सिद्धू ने पार्टी में सक्रियता बढ़ाई तो उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया। इस दौरान कैप्टन अमरिंदर सिंह ने सिद्धू का जमकर विरोध किया था। अध्यक्ष बनने के बाद सिद्धू ने दोबारा कैप्टन के खिलाफ आवाज बुलंद की और बवाल इतना बढ़ा कि अमरिंदर सिंह को इस्तीफा देना पड़ा। सीएम बदलने और प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद लग रहा था कि सिद्धू अब पार्टी के प्रति डटकर काम करेंगे लेकिन अचानक इस्तीफा देकर सभी को चौंका दिया। 

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