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पेक में अब पीएचडी वाले अभ्यर्थी ही बनेंगे शिक्षक, यूटी प्रशासन ने लगाई मुहर

Mon, 07 Jun 2021 02:18 AM IST
Panchkula Bureau पंचकुला ब्‍यूरो
Updated Mon, 07 Jun 2021 02:18 AM IST
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Now only PhD candidates will become teachers in Peck, UT administration has stamped
चंडीगढ़। पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज (पेक) चंडीगढ़ ने शिक्षा की गुणवत्ता सुधार के लिए बड़ा कदम उठाया है। अब यहां जितने भी शिक्षकों की भर्ती होगी, उसके लिए अभ्यर्थी का पीएचडी होना अनिवार्य होगा। सूत्रों का कहना है कि पेक प्रशासन के इस प्रस्ताव पर यूटी प्रशासन ने मुहर लगा दी है। इसी शैक्षिक सत्र से यह नियम लागू हो जाएगा।
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पेक में नौ विभाग संचालित हैं। इसके अलावा सात से अधिक सेंटर हैं। इन विभागों व सेंटरों का संचालन करने का जिम्मा लगभग 105 शिक्षकों के पास है। विद्यार्थियों की संख्या यहां करीब 3300 से अधिक है। छात्रों की संख्या के मुताबिक शिक्षकों की संख्या में बड़ी कमी है। पेक प्रशासन अभी तक जैसे-तैसे काम चला रहा था। कुछ गेस्ट फैकल्टी भी रखी जा रही थी तो उसकी योग्यता के लिए पीएचडी अनिवार्य नहीं थी। अन्य शिक्षकों की भर्ती के लिए भी रिसर्च पार्ट महत्वपूर्ण नहीं था। तमाम विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की भर्ती पीएचडी की डिग्री के जरिए होने लगी तो पेक ने भी इस पर विचार किया और इसके लिए प्रस्ताव तैयार किया। यह प्रस्ताव यूटी प्रशासन को भेजा गया था, जिसे स्वीकार कर लिया गया।
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पेक को चाहिए 50 से अधिक शिक्षक
पेक को कम से कम 50 शिक्षकों की आवश्यकता महसूस हो रही है, लेकिन अब तक इसकी पूर्ति नहीं की गई। इसका असर रैंकिंग पर पड़ रहा है। हालांकि निरफ में पेक को 68वीं रैंक मिली है जो पिछले वर्ष से बेहतर रही है। जानकारों का कहना है कि यदि शिक्षक व छात्र अनुपात बेहतर होता तो इस रैंक में और बेहतर सुधार होता। शिक्षक भर्ती का रास्ता कब साफ होगा? यह तय नहीं है। लेकिन जरूरत के हिसाब से शिक्षक रखे जा सकते हैं। उसके लिए यूटी प्रशासन की अनुमति जरूरी है।
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ऐसे प्रभावित हो रही शिक्षा गुणवत्ता
पेक में शिक्षकों की संख्या कम होने के कारण उन पर अतिरिक्त भार पड़ रहा है। इस कारण शिक्षा की गुणवत्ता भी प्रभावित हो रही है। अब विकल्प आधारित विषय विद्यार्थियों को पढ़ाए जाएंगे तो स्थिति और खराब होगी यानी शिक्षकों की जरूरत पेक को अधिक पड़ेगी। कुछ शिक्षकों का यह भी कहना है कि इस अतिरिक्त भार के कारण वह अपने रिसर्च के कार्य नहीं कर पा रहे हैं। पब्लिकेशंस की संख्या में भी कमी आई है।
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