Chandigarh: पीजीआई चंडीगढ़ में खुला उत्तर भारत का पहला स्किन बैंक, अब अंग ही नहीं त्वचा भी कर सकेंगे दान
इस बैंक की मदद से आग से झुलसे मरीजों की जान बचाने और उन्हें बेहतर इलाज देने में मदद मिलेगी। प्लास्टिक सर्जरी विभाग के प्रमुख प्रो. अतुल पराशर ने बताया कि अंगदान की ही तरह अब त्वचा दान के लिए भी रोटो के प्रतिनिधि गंभीर मरीजों के परिजनों को प्रेरित करेंगे।
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पीजीआई के एडवांस ट्रामा सेंटर स्थित प्लास्टिक सर्जरी विभाग में गुरुवार को उत्तर भारत के पहले स्किन बैंक का उद्घाटन निदेशक प्रो. विवेक लाल ने किया। उन्होंने कहा कि इस स्किन बैंक के शुरू हो जाने से बर्न और एसिड अटैक पीड़ितों को दर्द रहित इलाज देने में मदद मिलेगी। उन्होंने कहा कि पीजीआई रोटो अब अंगदान के साथ त्वचा दान के लिए भी जागरूकता अभियान चलाएगा ताकि इसकी जरूरत वाले लोगों को समय रहते बेहतर इलाज उपलब्ध कराया जा सके।
इस दौरान पब्लिक फोरम का आयोजन किया गया। इसमें देशभर से आए विशेषज्ञों ने स्किन बैंक संबंधी जानकारी साझा की। प्लास्टिक सर्जरी विभाग के प्रमुख प्रोफेसर अतुल पाराशर ने बताया कि यह उत्तरी क्षेत्र के पहले स्किन बैंकों में से एक है। स्किन बैंक की सुविधा गंभीर रूप से जले हुए मरीजों के लिए बहुत उपयोगी होगी।
उन्होंने बताया कि जलने से रोगियों और उनके परिवारों पर शारीरिक, मनोवैज्ञानिक और वित्तीय तनाव होता है। पीजीआई में जलने के सालाना लगभग 500 मामले आते हैं। इनमें से अधिकांश रोगियों के शरीर की सतह का 40 प्रतिशत से अधिक हिस्सा जला होता है, जिसके लिए व्यापक सर्जरी की आवश्यकता होती है। ऐसे मामलों में इलाज के दौरान त्वचा उपलब्ध न होने पर बिना ग्राफ्ट के ही उसे छोड़ना पड़ता है। ऐसी स्थिति में जले हुए क्षेत्रों का उपचार संभव नहीं हो पाता है या देरी हो जाती है, जिससे पीड़ित को भयंकर पीड़ा सहन करते हुए काफी लंबे समय तक इलाज के लिए अस्पताल में रुकना पड़ता है। उन्होंने कहा कि भारत वर्तमान में त्वचा बैंकों की कमी का सामना कर रहा है, खासकर उत्तर में, जिससे इस सुविधा की स्थापना एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर बन गई है।
ब्रेन डेड या पीड़ित व्यक्ति की त्वचा हो सकती है सहायक
प्रो. अतुल ने बताया कि त्वचा महत्वपूर्ण सुरक्षात्मक कार्य करने वाला मानव शरीर का सबसे बड़ा अंग है। जलने के कारण खोई हुई त्वचा को कहीं और की त्वचा से प्रतिस्थापित किया जाना चाहिए। इस प्रक्रिया को स्किन ग्राफ्टिंग कहा जाता है और इसमें रोगी के स्वयं के शरीर से ली गई त्वचा का या मृत व्यक्तियों से दान में मिली त्वचा का उपयोग किया जाता है। इस संरक्षित त्वचा का उपयोग अस्थायी जले हुए घाव के ग्राफ्ट के रूप में किया जाता है। यह स्वस्थ त्वचा कई महत्वपूर्ण कार्य करती है, जैसे संक्रमण से बचाना, अंदरूनी त्वचा से प्रोटीन व अन्य आवश्यक तत्वों के नुकसान को रोकना, दर्द को कम करना और अंतर्निहित ऊतकों के उपचार को बढ़ावा देना शामिल है।
परिवार की सहमति है महत्वपूर्ण
प्रो.अतुल ने बताया कि एलोग्राफ्ट त्वचा को निकटतम रिश्तेदार से सहमति प्राप्त होने के बाद कैडवेरिक (मृत) दाताओं से प्राप्त किया जाता है। हेपेटाइटिस और एड्स सहित कई संक्रामक बीमारियों के लिए दाता के रक्त के नमूनों का भी परीक्षण किया जाता है। 18 वर्ष से अधिक आयु के किसी भी मृत व्यक्ति की त्वचा लिंग और रक्त समूह की परवाह किए बिना, बिना किसी आयु सीमा के, मृत्यु के छह घंटे के भीतर दान की जा सकती है।
त्वचा को किया जाता है संरक्षित
सहमति प्राप्त होने के बाद त्वचा को निकाला जाता है, काटा जाता है और संसाधित किया जाता है, जिसमें पांच से छह सप्ताह लगते हैं। इसके बाद इसे जरूरतमंद मरीजों को मुहैया कराया जा सकेगा। किडनी और लीवर के विपरीत, जिन्हें संग्रहित नहीं किया जा सकता है और दान के कुछ घंटों के भीतर प्रत्यारोपित करने की आवश्यकता होती है, त्वचा को 85 प्रतिशत ग्लिसरॉल समाधान में संरक्षित किया जा सकता है। त्वचा पांच साल तक की अवधि के लिए 4 से 8 डिग्री सेल्सियस के बीच संग्रहित किया जा सकता है।
महज 30 से 45 मिनट लगते हैं प्रक्रिया में
प्रो. अतुल ने बताया कि त्वचा दान की प्रक्रिया तेज है, इसमें केवल 30 से 45 मिनट लगते हैं। स्किन हार्वेस्टिंग एक प्रशिक्षित टीम की ओर से की जाती है। दोनों पैरों, जांघों और पीठ से त्वचा काटी जाती है। त्वचा की केवल बहुत पतली परत, जिसमें पूरी एपिडर्मिस और डर्मिस का कुछ हिस्सा (0.4 से 0.6 मिमी मोटा) होता है, मृतक से काटा जाता है। जिस स्थान से त्वचा काटी गई है वहां कोई रक्तस्राव नहीं होता है और शरीर पर कोई विकृति नहीं होती है। प्रक्रिया के बाद, शरीर के उस स्थान उचित रूप से पट्टी बांधी जाती है। दान की गई त्वचा का मूल्यांकन, प्रसंस्करण, त्वचा बैंक में जांच की जाती है और फिर जले हुए रोगियों के लिए उपयोग किया जाता है।
मरीज के परिजन ने की शिकायत
उद्घाटन कार्यक्रम के दौरान ट्रॉमा सेंटर में भर्ती एक मरीज के परिजन ने पीजीआई निदेशक प्रो. विवेक लाल से शिकायत करते कहा कि उसके मरीज को इलाज नहीं मिल रहा है। इस पर प्रो. विवेक लाल ने आश्वासन दिया कि वे वह खुद उसके मरीज से जुड़ी जानकारी लेकर यह सुनिश्चित करेंगे कि इलाज की प्रगति रिपोर्ट क्या है।