Haryana Election: हरियाणा चुनाव में नहीं दिखा किसान आंदोलन का असर , विरोध के बावजूद किंग बनी भाजपा
हरियाणा में भाजपा ने 48 सीटें जीतकर चुनाव से पहले सत्ता के खिलाफ बनी धूमिल छवि को एक बार फिर साफ कर दिया है। यही नजारा लोकसभा चुनाव-2024 में पंजाब में देखने को मिला था।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
सियासी घमासान के बीच किसान आंदोलन का असर एक बार फिर बैकफुट पर रहा। हरियाणा में विधानसभा चुनाव के नतीजों ने यह एक बार फिर साबित कर दिया। हरियाणा में भाजपा ने तीसरी बार जनता से बहुमत जुटाकर धरातल पर किसान आंदोलन के खास असर न होने का फैक्टर दिखाया है।
हरियाणा में भाजपा ने 48 सीटें जीतकर चुनाव से पहले सत्ता के खिलाफ बनी धूमिल छवि को एक बार फिर साफ कर दिया है। यही नजारा लोकसभा चुनाव-2024 में पंजाब में देखने को मिला था। पंजाब में 13 सीटों पर संसदीय चुनाव में भाजपा बेशक एक भी सीट जुटाने में नाकाम रही, लेकिन बीते तीन लोकसभा चुनाव में किसान आंदोलन के बीच इस बार कांग्रेस और आप के बाद तीसरे स्थान पर सबसे ज्यादा वोट हासिल किए थे। भाजपा ने पंजाब में बीते लोकसभा चुनाव में 18.56 प्रतिशत वोट हासिल किए, जोकि प्रदेश की क्षेत्रीय पार्टी शिरोमणि अकाली दल (शिअद) के वोटिंग प्रतिशत 13.42 से 5.14 प्रतिशत अधिक रहा।
एमएसपी की कानूनी गारंटी पर किसान आंदोलन की धमक
एमएसपी की कानूनी गारंटी को लेकर 13 फरवरी से शुरू हुए किसान आंदोलन की धमक शंभू से लेकर खन्नौरी बॉर्डर तक देखने को मिली। लोकसभा चुनाव से ठीक पहले भी पंजाब और हरियाणा में किसान संगठनों और जत्थबंदियों ने अपने आंदोलन को लेकर सत्तारुढ़ दलों और विशेषकर केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले रखा। किसान आंदोलन के बीच लोकसभा चुनाव में पंजाब में भाजपा का वोटिंग प्रतिशत बढ़ने और पड़ोसी राज्य हरियाणा में कुछ महीने बाद ही केंद्रीय नेतृत्व में तीसरी बार बहुमत से सरकार बनाने ने किसान आंदोलन के लिए चुनौती खड़ी कर दी है।
बदलना पड़ेगा किसान आंदोलन का तरीका
शंभू बॉर्डर पर बीते 9 महीने ने आंदोलन पर बैठे किसान संगठनों व जत्थेबंदियों को अपनी मांगों को मनवाने के लिए अब नया तरीका तलाशना होगा, क्योंकि पंजाब और हरियाणा में हुए लोकसभा और विधानसभा चुनाव में सियासी घमासान के बीच किसान आंदोलन का असर बैकफुट पर साबित हुआ। यहां तक कि हरियाणा के पिहोवा से भारतीय किसान यूनियन के गुरनाम सिंह चढूनी को हार का सामना करना पड़ा।
किसानों की आवाज बुलंद करने वाले गुरनाम सिंह चढूनी को हरियाणा विधानसभा चुनाव में केवल 1170 वोट ही मिले। पंजाब से सटे हरियाणा के विधानसभा हलकों में भी किसान आंदोलन का कोई खास असर नहीं देखने को मिला, जबकि चुनाव से ठीक पहले पंजाब व हरियाणा के कई किसान जत्थेबंदियों ने एक साथ केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ मोर्चा खोला था।