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‘आजाद’ ने दर्शकों में जगाया आजादी का जोश
ब्यूरो/ अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Thu, 27 Mar 2014 01:49 PM IST
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किसी भी नाटक के मंचन के दौरान इससे अच्छा क्या होगा कि उसमें साउंड की खराबी आए, लेकिन फिर भी अदाकारी के दम पर दर्शक आखिरी वक्त तक सीट न छोड़ें।
पंजाब कला भवन सेक्टर-16 में नाटक ‘आजाद’ का मंचन किया गया। नाटक को प्रसिद्ध नाटककार सीएस सिंधरा ने लिखा है। निर्देशन तेजभान गांधी ने किया।
नाटक में सेट के रूप में सिर्फ एक पोडियम रखा गया, जो नाटक लिखने की शैली को दर्शाता था। यह नाटक 1984 के समय का लिखा हुआ है, जब पंजाब में नुक्कड़ नाटकों से सभी को सीख दी जाती थी।
नाटक शुरू होता है एक बुत (ऊधमसिंह का) और उसके आस-पास खड़े चार लोगों से जो विभिन्न धर्म से संबंधित हैं। चारों उस बुत पर फूलों की माला चढ़ाने आते हैं। लेकिन, जब एक व्यक्ति उनसे पूछता है कि वह इंसान के बारे में क्या जानते हैं, तो सब चुप हो जाते हैं।
इसके बाद वह व्यक्ति उन्हें ऊधमसिंह की कहानी सुनाता है। 1919 में हुए जलियांवाला बाग कांड का बदला लेने के लिए ऊधमसिंह माइकल ओडॉयर की केक्सटन हॉल में हत्या कर दी थी। चारों युवक इससे सबक लेते हैं, लेकिन एक अंग्रेज के चंगुल में फंस जाते हैं जो उन्हें एक दूसरे के धर्म के लिए भड़काता है।
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इस बीच जब एक बुजुर्ग व्यक्ति बुत पर माला चढ़ाने आता है तो सभी लोग उसको ऐसा करने से रोकते हैं और बुत को अपने धर्म का बताकर लड़ने लगते हैं। इस बीच बुत बने ऊधमसिंह जाग जाते हैं और उन सभी को याद दिलाते हैं कि वह किसी एक धर्म से नहीं बल्कि पूरे देश से जुड़े हैं।
नाटक में कलाकारों ने उम्दा अभिनय किया। ऊधमसिंह और बुजुर्ग के किरदार ने नाटक को अंत तक बांधे रखा। नाटक के अंत में कलाकारों को सम्मानित करने के लिए भाजपा प्रत्याशी किरण खेर पहुंचीं।
नाटक बहुत ही अच्छा लिखा गया है। आजकल के युवाओं को ऐसे नाटक देखने की बहुत जरूरत है। इस तरह के नाटक ही भटके हुए युवाओं को सही दिशा में ला सकते हैं।
- कुलवंत धालीवाल, समाज सेविका
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पंजाब कला भवन सेक्टर-16 में नाटक ‘आजाद’ का मंचन किया गया। नाटक को प्रसिद्ध नाटककार सीएस सिंधरा ने लिखा है। निर्देशन तेजभान गांधी ने किया।
नाटक में सेट के रूप में सिर्फ एक पोडियम रखा गया, जो नाटक लिखने की शैली को दर्शाता था। यह नाटक 1984 के समय का लिखा हुआ है, जब पंजाब में नुक्कड़ नाटकों से सभी को सीख दी जाती थी।
नाटक शुरू होता है एक बुत (ऊधमसिंह का) और उसके आस-पास खड़े चार लोगों से जो विभिन्न धर्म से संबंधित हैं। चारों उस बुत पर फूलों की माला चढ़ाने आते हैं। लेकिन, जब एक व्यक्ति उनसे पूछता है कि वह इंसान के बारे में क्या जानते हैं, तो सब चुप हो जाते हैं।
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इसके बाद वह व्यक्ति उन्हें ऊधमसिंह की कहानी सुनाता है। 1919 में हुए जलियांवाला बाग कांड का बदला लेने के लिए ऊधमसिंह माइकल ओडॉयर की केक्सटन हॉल में हत्या कर दी थी। चारों युवक इससे सबक लेते हैं, लेकिन एक अंग्रेज के चंगुल में फंस जाते हैं जो उन्हें एक दूसरे के धर्म के लिए भड़काता है।
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इस बीच जब एक बुजुर्ग व्यक्ति बुत पर माला चढ़ाने आता है तो सभी लोग उसको ऐसा करने से रोकते हैं और बुत को अपने धर्म का बताकर लड़ने लगते हैं। इस बीच बुत बने ऊधमसिंह जाग जाते हैं और उन सभी को याद दिलाते हैं कि वह किसी एक धर्म से नहीं बल्कि पूरे देश से जुड़े हैं।
नाटक में कलाकारों ने उम्दा अभिनय किया। ऊधमसिंह और बुजुर्ग के किरदार ने नाटक को अंत तक बांधे रखा। नाटक के अंत में कलाकारों को सम्मानित करने के लिए भाजपा प्रत्याशी किरण खेर पहुंचीं।
नाटक बहुत ही अच्छा लिखा गया है। आजकल के युवाओं को ऐसे नाटक देखने की बहुत जरूरत है। इस तरह के नाटक ही भटके हुए युवाओं को सही दिशा में ला सकते हैं।
- कुलवंत धालीवाल, समाज सेविका