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'सत्याग्रह' में दिखा अकबर के हमले के बाद का जोधपुर
श्ांकर सिंह/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Sat, 25 Jan 2014 01:41 PM IST
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एक तलवार से ज्यादा धार कलम में होती है और यही धार देखने को मिली टीएफटी के छठे दिन पंजाब कला भवन मे हुए नाटक ‘सत्याग्रह’ में। नाटक को जोधपुर के नाटक ग्रुप रागनाथ, ने अर्जुन के निर्देशन में किया।
नाटक की एतिहासिक कहानी
नाटक राजस्थान के जोधपुर शहर में हुई जमीनी जंग के ऊपर है। नाटक पीरीयोडिक था इसलिए सेट को सिंबोलिक रूप में तैयार किया गया।
जैसा की एतिहासिक नाटकों में होता है, इस नाटक को भी सूत्रधार ने ही शुरू किया और कहानी आगे बढ़ी। इसमें अकबर के हमले के बाद जोधपुर के राजा अपनी जमीन और उपाधी बचाने के लिए सब कुछ करने को तैयार हो जाता है और अपनी जमीन भी जागीर के तोर पर दे देता है।
इससे परेशान गांव के कुछ कवि विद्रोह पर उतर आते है और अनशन पर बैठ जाते है। राजा इससे आहत होकर कवियों को राज्य छोड़ने को कहता है। कवि अपनी मातृभूमि के लिए अंत में अपनी जान त्याग देते है, लेकिन राजा के आगे नहीं झुकते।
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संगीत ने डाली नाटक में जान
नाटक में कुछ जगहों पर संगीत का इस्तेमाल हुआ जिसमें कुछ गानों का भी इस्तेमाल हुआ जो नाटक को समय के हिसाब से जोड़ता है।
सूत्रधार के किरदार और राज्य मंत्री के किरदार में महुआ ने बेहद खूब काम किया। नाटक में राजा और कवियों के बीच हुए संवाद काफी अच्छे थे।
ये रहीं नाटक की कमियां
क्योंकि नाटक पुराना था इसलिए लोगों को बांधना काफी मुश्किल हो जाता है, नाटक में कई जगह संवाद के साथ एक्टिंग थोड़ी कमजोर रही, जिससे सीन थोडे़ निरस लगे। कई जगह लाइट को जल्दी फेड आउट कर दिया गया, जिससे नाटक की तैयारी थोड़ा कम लगी।
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नाटक की एतिहासिक कहानी
नाटक राजस्थान के जोधपुर शहर में हुई जमीनी जंग के ऊपर है। नाटक पीरीयोडिक था इसलिए सेट को सिंबोलिक रूप में तैयार किया गया।
जैसा की एतिहासिक नाटकों में होता है, इस नाटक को भी सूत्रधार ने ही शुरू किया और कहानी आगे बढ़ी। इसमें अकबर के हमले के बाद जोधपुर के राजा अपनी जमीन और उपाधी बचाने के लिए सब कुछ करने को तैयार हो जाता है और अपनी जमीन भी जागीर के तोर पर दे देता है।
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इससे परेशान गांव के कुछ कवि विद्रोह पर उतर आते है और अनशन पर बैठ जाते है। राजा इससे आहत होकर कवियों को राज्य छोड़ने को कहता है। कवि अपनी मातृभूमि के लिए अंत में अपनी जान त्याग देते है, लेकिन राजा के आगे नहीं झुकते।
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संगीत ने डाली नाटक में जान
नाटक में कुछ जगहों पर संगीत का इस्तेमाल हुआ जिसमें कुछ गानों का भी इस्तेमाल हुआ जो नाटक को समय के हिसाब से जोड़ता है।
सूत्रधार के किरदार और राज्य मंत्री के किरदार में महुआ ने बेहद खूब काम किया। नाटक में राजा और कवियों के बीच हुए संवाद काफी अच्छे थे।
ये रहीं नाटक की कमियां
क्योंकि नाटक पुराना था इसलिए लोगों को बांधना काफी मुश्किल हो जाता है, नाटक में कई जगह संवाद के साथ एक्टिंग थोड़ी कमजोर रही, जिससे सीन थोडे़ निरस लगे। कई जगह लाइट को जल्दी फेड आउट कर दिया गया, जिससे नाटक की तैयारी थोड़ा कम लगी।