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म्यूजियम देख भावुक हुए गुलजार, बताया कैसे जीती जा सकती है हर जंग

Mon, 06 Feb 2017 12:27 AM IST
रमेश शुक्ला सफर/अमर उजाला, अमृतसर
रमेश शुक्ला सफर/अमर उजाला, अमृतसर Updated Mon, 06 Feb 2017 12:27 AM IST
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Museum emotional watching the buzzing, described how every battle is won
गुलजार - फोटो : अमर उजाला

मशहूर शायर पद्मभूषण गुलजार (संपूर्ण सिंह कालरा) भारत-पाकिस्तान विभाजन में अपने परिवार के साथ खालसा कॉलेज के जिस रिफ्यूजी कैंप में रहे थे, उसी कैंप की दीवार से सटी श्री गुरुनानक देव यूनिवर्सिटी में रविवार को उनके सम्मान के लिए शहर की बड़ी हस्तियां मौजूद थीं। 

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वे यूनिवर्सिटी में एक नाटक देखने पहुंचे थे। इस दौरान गुलजार की आंखों में आजादी की खुशी भी थी तो उजड़ने का दर्द भी। इससे पहले उन्होंने श्री हरमंदिर साहिब के पास बनाए गए पार्टीशन म्यूजियम को भी देखा। 
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बंटवारे पर आधारित इस म्यूजियम को देख गुलजार की आंखें नम हुई और दर्द जुबां पर आ गया। गुलजार ने कहा बंटवारे का दर्द उस दिल से पूछो जो बंटा था। खैर, घरों में बंटवारा होते हैं। 
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बंटवारा केवल खेत-खलिहान, जमीन-जायदाद का होता है दिलों का नही। भारत-पाकिस्तान दोनों एक ही घर थे। अब भले ही एक नहीं हो सकते लेकिन दोनोंमिलकर एक-दूसरे के लिए सलामती तो मांग ही सकते हैं। 

;'दर्द का वो मंजर मेरे दिल में आज भी है'

Museum emotional watching the buzzing, described how every battle is won
गुलजार

बंटवारे के बाद भाई के साथ-साथ अच्छा पड़ोसी के गुण हो तो क्या संभव नहीं है। पूरी दुनिया के बंटवारे हुए हैं। बंटवारे हो रहे हैं। लेकिन यह दिलों का बंटवारा नही है। दोनों देशों के बीच अवाम भी मोहब्बत चाहती है। 

दोनों मुल्क मिलकर रहे क्योंकि मोहब्बत से हर जंग जीती जा सकती है। दोनों मुल्कों के बीच प्यार व व्यापार बढ़े, अमन चैन रहे यही मेरी प्रार्थना है और यही मेरी दुआ भी। 

भारत-पाक विभाजन के दर्द को समेटे हुए बन रहे पार्टीशन म्यूजियम को देख गुलजार की आंखें नम हो गई। जिस तरह से लाशों की गाड़ी लाती ट्रेन, विलाप करते परिवार और रिफ्यूजी कैंपों को म्यूजियम में जगह दी जा गई है, उसे देख गुलजार आंसू नहीं रोक सके। 

उन्होंने कहा कि मैं भी अपने परिवार के साथ बटवारे में बंटा हूं। अमृतसर ही नहीं पंजाब के कई रिफ्यूजी कैंप से होते हुए परिवार दिल्ली पहुंचा। 18 अगस्त 1936 का जन्म है, उस समय ग्यारह साल का था। 

दर्द का वो मंजर मेरे दिल में आज भी है। बंटवारा ठीक था हो गया। लेकिन बंटवारे के बाद वक्त है दोनों मिलकर अमन चैन से रहे, मानवता का पाठ पढ़े। व्यापार बढ़े। 

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