बर्तन से शुरुआत, अब बनाते हैं करंसी और सेना की बुलेट
बर्तन बनाने के पुश्तैनी काम से राधेश्याम गुप्ता आज सेना की बुलेट से लेकर भारतीय मुद्रा के पांच के सिक्के बनाते हैं। कई देशों को भी उनकी मुद्रा के लिए मेटल शीट सप्लाई करते हैं।
लगभग दो सौ साल पहले उनके पुर्खों ने बर्तन बनाने का काम शुरू किया था,जो भारत को आजादी मिलने तक चलता रहा। जैसे ही 1947 में देश आजाद हुआ उन्होंने तीन लाख की लागत से छोटी सी यूनिट लगाई।
इसके बाद 1990 में लोस में चल रही एक यूनिट को खरीदा। तब से लेकर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
मुश्किलों से भरा सफर लेकिन नहीं छोड़ा हौसला
राधे श्याम गुप्ता बताते हैं पहले लोग पीतल व कांसे के बर्तनों का उपयोग बहुत ज्यादा करते थे और पूरे देश में इनकी मांग थी। मगर बाद में जापनी स्टेनलेस स्टील आई और इस उद्योग की कमर टूटने लगी।
उद्योग को बचाने के लिए तकनीकि मदद जरूरी थी। साथ ही क्वालिटी मेंटेन करना भी। इसलिए उन्होंने मेटल शीट का कारोबार शुरू किया। अपनी क्वालिटी की वजह से देश में ही नहीं, विदेशों में भी इसकी अच्छी मांग है।