{"_id":"579f964f4f1c1b56152b94e4","slug":"metro-dpr-observation-by-dmrc-for-chandigarh-metro-project","type":"story","status":"publish","title_hn":"चंडीगढ़ में मेट्रो की राह में अड़ंगा, प्रशासन उठाएगा ये बड़ा कदम","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
चंडीगढ़ में मेट्रो की राह में अड़ंगा, प्रशासन उठाएगा ये बड़ा कदम
अमर उजाला ब्यूरो, चंडीगढ़
Updated Tue, 02 Aug 2016 12:04 AM IST
विज्ञापन
metro rail
- फोटो : demo
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
मेट्रो प्रोजेक्ट के अड़ंगे दूर करना प्रशासन के लिए चुनौती बन गया है। हालत यह हो गई है कि मेट्रो का सपना सपने जैसा ही लगने लगा है। अब इस प्रोजेक्ट में 200 एकड़ जमीन का नया पेंच फंस गया है। जमीन उपलब्ध नहीं करवा पाने के कारण यूटी प्रशासन अब इस प्रोजेक्ट में हिस्सेदार पंजाब और हरियाणा से इस पर बात करेगा। दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (डीएमआरसी) ने मेट्रो डीपीआर ऑब्जर्वेशंस में चंडीगढ़ से प्रापर्टी डेवलपमेंट प्लान के तहत 200 एकड़ जमीन मांगी है।
जमीन नहीं दे पाने की स्थिति में 1 हजार करोड़ रुपये सालाना की व्यवस्था के लिए कहा है। दोनों ही मामलों में चंडीगढ़ प्रशासन असफल साबित हो रहा है। प्रशासन के पास इस समय अधिग्रहित की गई जमीन में से 600 एकड़ के करीब ही जमीन बची है। यह भी विभिन्न संस्थानों केलिए आरक्षित है। आईटी पार्क फेज-3 के लिए जिस भूमि का अधिग्रहण किया गया था। वह भी प्रशासन पहले ही सुप्रीम कोर्ट में अधिग्रहण रद्द होने के बाद किसानों को वापस लौटा चुका है। ऐसे में 200 एकड़ जमीन प्रापर्टी डेवलपमेंट प्लान के लिए अलग से निकालना संभव नहीं है। रही बात प्रतिवर्ष 1 हजार करोड़ रुपये अदा करने की तो यह भी दूर की कोड़ी है। यूटी प्रशासन का सालाना प्लान बजट ही 700 करोड़ है। इसकेअलावा मेट्रो प्रोजेक्ट पर भी 13 हजार 909 करोड़ रुपये का बजट खर्च होना है। जिसमें बड़ा हिस्सा यूटी प्रशासन को देना है। ऐसे में अलग से 1 हजार करोड़ रुपये निकालना नामुमकिन साबित हो रहा है।
अवलोकन के लिए भेजी थी रिपोर्ट
केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने यूटी प्रशासन को प्रापर्टी डेवलपमेंट प्लान और कई अन्य मुद्दों पर अवलोकन को कहा था। जिसके बाद पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ के अधिकारियों ने आपस में मीटिंग भी की। इन सभी बिंदुओं पर डीएमआरसी से विस्तृत प्लान मांगा गया था। जिस पर डीएमआरसी ने अतिरिक्त 200 एकड़ जमीन की मांग रखी है।
विज्ञापन
प्रोजेक्ट में लगातार हो रही देरी
मेट्रो प्रोजेक्ट में लगातार देरी हो रही है। डीपीआर फाइनल होने के बाद वर्ष 2016 में इसका ग्राउंड लेवल पर काम शुरू होना था और 2021 में काम पूरा हो जाना था। लेकिन जुलाई बीतने के बाद आज तक डीपीआर ही फाइनल नहीं हो पाई है। जिस कारण ग्राउंड लेवल पर काम भी नहीं शुरू हो पाया है। इस देरी के चक्कर में एस्टीमेट बजट भी 10 हजार 909 करोड़ से 13 हजार 900 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।
विज्ञापन
जमीन नहीं दे पाने की स्थिति में 1 हजार करोड़ रुपये सालाना की व्यवस्था के लिए कहा है। दोनों ही मामलों में चंडीगढ़ प्रशासन असफल साबित हो रहा है। प्रशासन के पास इस समय अधिग्रहित की गई जमीन में से 600 एकड़ के करीब ही जमीन बची है। यह भी विभिन्न संस्थानों केलिए आरक्षित है। आईटी पार्क फेज-3 के लिए जिस भूमि का अधिग्रहण किया गया था। वह भी प्रशासन पहले ही सुप्रीम कोर्ट में अधिग्रहण रद्द होने के बाद किसानों को वापस लौटा चुका है। ऐसे में 200 एकड़ जमीन प्रापर्टी डेवलपमेंट प्लान के लिए अलग से निकालना संभव नहीं है। रही बात प्रतिवर्ष 1 हजार करोड़ रुपये अदा करने की तो यह भी दूर की कोड़ी है। यूटी प्रशासन का सालाना प्लान बजट ही 700 करोड़ है। इसकेअलावा मेट्रो प्रोजेक्ट पर भी 13 हजार 909 करोड़ रुपये का बजट खर्च होना है। जिसमें बड़ा हिस्सा यूटी प्रशासन को देना है। ऐसे में अलग से 1 हजार करोड़ रुपये निकालना नामुमकिन साबित हो रहा है।
विज्ञापन
अवलोकन के लिए भेजी थी रिपोर्ट
केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने यूटी प्रशासन को प्रापर्टी डेवलपमेंट प्लान और कई अन्य मुद्दों पर अवलोकन को कहा था। जिसके बाद पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ के अधिकारियों ने आपस में मीटिंग भी की। इन सभी बिंदुओं पर डीएमआरसी से विस्तृत प्लान मांगा गया था। जिस पर डीएमआरसी ने अतिरिक्त 200 एकड़ जमीन की मांग रखी है।
विज्ञापन
प्रोजेक्ट में लगातार हो रही देरी
मेट्रो प्रोजेक्ट में लगातार देरी हो रही है। डीपीआर फाइनल होने के बाद वर्ष 2016 में इसका ग्राउंड लेवल पर काम शुरू होना था और 2021 में काम पूरा हो जाना था। लेकिन जुलाई बीतने के बाद आज तक डीपीआर ही फाइनल नहीं हो पाई है। जिस कारण ग्राउंड लेवल पर काम भी नहीं शुरू हो पाया है। इस देरी के चक्कर में एस्टीमेट बजट भी 10 हजार 909 करोड़ से 13 हजार 900 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।