फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Chandigarh ›   Meet to 1971 Indo-Pak War Hero

मिलिए, 71 के भारत-पाक युद्ध के हीरो ब्रिगेडियर चांदपुरी से

Fri, 02 May 2014 10:48 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, मोहाली
ब्यूरो/अमर उजाला, मोहाली Updated Fri, 02 May 2014 10:48 AM IST
विज्ञापन
Meet to 1971 Indo-Pak War Hero

1971 में भारत-पाकिस्तान के बीच जो युद्ध हुआ था, उसमें जीत केवल मेरी वजह से नहीं हुई थी। बल्कि उन जवानों की वजह से मिली थी, जो कि पूरी रात मोर्चे पर डटे रहे। इस दौरान कई जवान शहीद भी हो गए थे।

विज्ञापन


यह बात भारत-पाक युद्घ के हीरो रहे ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी ने कही। वह प्रेस क्लब एसएएस नगर में मीडिया से रूबरू हुए थे।

ब्रिगेडियर (रिटा.) चांदपुरी ने युद्घ के दिनों को याद करते हुए कहा कि वह पंजाब रेजीमेंट में थे। उन्हें उस समय लौंगेवाला में दुश्मनों से लोहा लेने के आर्डर हुए थे। लेकिन, हमारे पास वहां केवल 92 ही जवान थे। वहां मैं अकेला अफसर था, जबकि पाकिस्तान सेना में तीन हजार से ज्यादा जवान थे।
विज्ञापन


साथ ही 45 के करीब उनके पास टैंक थे। वह हमारी सीमा से करीब 18 किमी अंदर तक घुस आए थे। ऐसे में मैने जवानों को कहा कि अगर आप चाहो तो मैदान छोड़कर जा सकते हैं, लेकिन मैं यहीं डटा रहूंगा।
विज्ञापन
विज्ञापन


चाहे जान भी चली जाए। इसके बाद जवानों में भी जोश आ गया। उन्होंने भी मोर्चे पर डटे रहने का फैसला लिया। फिर उन्होंने पूरे जोश से नारे और जयकारे लगाने शुरू कर दिए।

इसी बीच पाकिस्तान की सेना को यह भ्रम हो गया कि यहां पर कुछ ही जवान नहीं, बल्कि पूरी बटालियन है। ऐसे में वे डर के मारे आगे तो नहीं बढ़ पाए, परंतु पूरी रात जंग चलती रही।

इसमें हमारे कई जवान शहीद हुए। जैसे ही सुबह होने वाली थी, तो बिग्रेडियर चांदपुरी ने एयरफोर्स से मदद मांगी और पाकिस्तान पर हमला बोल दिया। इसमें हमें सफलता मिली और हम युद्घ जीत गए।


उन्होंने बताया कि उन्हें जो महावीर चक्र मिला वे उसे उन जवानों को समर्पित करते हैं, जिन्होंने युद्घ के मोर्चे पर अपनी जान न्योछावर कर दी थी।

बॉक्स
टॉपर नहीं, एवरेज स्टूडेंट था
ब्रिगेडियर (रिटा.) कुलदीप सिंह चांदपुरी ने कहा कि वह किसी कॉन्वेट स्कूल से नहीं, बल्कि गांव के ही सरकारी स्कूल से पढ़े हैं। पढ़ाई में ज्यादा होशियार भी नहीं थे। न ही आज के बच्चों की तरह 90 फीसदी से ऊपर अंक आते थे। बस पासिंग मार्क्स ही आते थे, लेकिन उस जमाने में बीए की थी जब बहुत कम लोग ही पढ़ पाते थे। साथ ही हॉकी के भी खिलाड़ी रहे हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed