मां के कंधे पर उठा शहीद बेटे का जनाजा
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विधवा मां सुखबीर कौर की आंखों में बेटे का शव देख भले ही दर्द भरे आंसू थे, लेकिन उन्हें इस बात का फक्र भी था कि आज से उनकी पहचान भी किसी शहीद की मां के रूप में होगी। यही वजह था कि रविवार को बेटे मनप्रीत सिंह के शव के गांव अवान पहुंचने पर उन्होंने खुद आगे बढ़कर अपने बेटे के जनाजे को कंधा भी दिया।
जम्मू-कश्मीर के उड़ी सेक्टर में आतंकियों का सामना करते हुए शहीद मनप्रीत सिंह का रविवार को राजकीय सम्मान के साथ पैतृक गांव में अंतिम संस्कार किया गया। इस बीच सैकड़ों लोगों ने शव यात्रा में शामिल होकर नम आंखों से उन्हें अंतिम विदाई दी। इससे पूर्व शहीद के पार्थिव शरीर के घर पहुंचने पर परिजनों के चित्कार से पूरा माहौल गमगीन हो गया।
इस बीच 31 एफडी रेजिमेंट के जवान मनप्रीत सिंह पुत्र स्व. बलदेव सिंह को स्टेशन कमांडर तिब्बड़ी कैंट कर्नल अनिल कुमार मोर, मेजर अरविंद राज हंस, एडीसी जनरल गुरदासपुर डा.ए कार्तिक, सैनिक भलाई बोर्ड के डिप्टी डायरेक्टर सतबीर सिंह, शहीद सैनिक परिवार सुरक्षा परिषद के महासचिव कुंवर रविन्द्र सिंह ने श्रद्धांजलि दी। वहीं 17 सिख रेजिमेंट के जवानों ने शव को सलामी दी। शहीद के तीन वर्षीय पुत्र अरमानप्रीत तथा बड़े भाई गुरजिन्द्र सिंह ने चिता को मुखाग्नि दी।
पत्नी को नौकरी और परिवार को प्लॉट
इस अवसर पर एडीसी जनरल गुरदासपुर डा.ए कार्तिक ने बताया कि सरकार की ओर से शहीद की पत्नी रणजीत कौर को एक लाख रुपये ,विधवा माता सुखबीर कौर को तीन लाख रुपये, शहीद के परिवार को एक प्लाट या पांच लाख रुपये के अलावा शहीद की पत्नी को सरकारी नौकरी दी जाएगी।
इसी प्रकार शहीद मनप्रीत सिंह के गांव में स्मारक का निर्माण कराया जाएगा। इस अवसर पर सलविन्द्र सिंह, डीएसपी हरजिन्द्र सिंह, शहीद के चाचा सुखदेव सिंह, शहीद के ससुर बलवंत सिंह, विजय सिंह, बलजीत सिंह, अवतार सिंह छोटेपुर, सूबेदार मेजर शाम सिंह, हवलदार हरप्रीत सिंह, हवलदार कुलविन्द्र सिंह, हवलदार र्स्वण सिंह, हवलदार सतनाम सिंह, हवलदार बलवंत सिंह, सूबेदार बलदेव सिंह मौजूद थे।
मौका मिला तो बरकरार रहेगी शहादत की परंपरा
उड़ी सेक्टर में आतंकियों से लड़ते हुए शहीद हुए मनप्रीत सिंह की मां सुखबीर कौर ने कहा कि आज उन्होंने अपने पुत्र की अर्थी को अंधा देकर सारे देश को यह संदेश दिया है कि एक शहीद की माता का रुतबा कितना ऊंचा होता है।
आंसुओं को अपनी आंखों में समेटे शहीद की माता ने कहा कि उसके दो और बेटे सेना में तैनात हैं। यदि मौका मिला तो उसके परिवार में शहादत की परंपरा आगे भी बरकरार रहेगी। उन्हें बेशक अपने पुत्र के बिछड़ने का गम है, लेकिन उन्हें बेटे की शहादत पर नाज भी है।