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Chandigarh: स्वास्थ्य वसीयत बनाएं...अपने अंतिम समय में इच्छा अनुरूप इलाज पाएं, जानें पूरी प्रक्रिया

Mon, 27 Nov 2023 02:18 PM IST
चंडीगढ़ ब्यूरो वीणा तिवारी, अमर उजाला, चंडीगढ़
वीणा तिवारी, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: चंडीगढ़ ब्यूरो Updated Mon, 27 Nov 2023 02:18 PM IST
सार

हेल्थ विल उन मरीजों के लिए महत्वपूर्ण है जो गंभीर बीमारियों से ग्रस्त हैं। इंडियन सोसाइटी ऑफ क्रिटिकल केयर मेडिसिन के अध्यक्ष के तौर पर डॉ. राजकुमार ने 2005 में पहली गाइडलाइन बनाई। जो मेडिकल और एथिकल साइड पर आधारित थी लेकिन वो लागू नहीं हो पाया। उसे 2012 और 2014 में अपडेट किया गया।  

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Make a health will... you will get treatment as per your wish in the last moments
स्वास्थ्य वसीयत

विस्तार

अस्पतालों में गंभीर मरीजों को लंबे समय तक वेंटीलेटर पर रखने के कारण उस मरीज के साथ ही उसका परिवार भी काफी परेशान होता है। क्योंकि वे ये भलि-भांति जानते हैं कि इस इलाज से कोई लाभ नहीं मिलने वाला लेकिन डॉक्टर के निर्देश के पालन से इनकार नहीं कर पाते। इससे मरीज की शारीरिक पीड़ा के साथ ही परिवार पर आर्थिक बोझ भी बढ़ता जाता है। 

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अब ऐसे मरीज और उनके परिजन इस पीड़ा से मेडिकल विल यानि स्वास्थ्य वसीयत से बचा सकते हैं। कोर्ट ने 2023 में इस स्थिति की गंभीरता को समझते हुए मेडिकल विल की प्रक्रिया को स्वीकृति दे दी है। यह जानकारी इस प्रस्ताव को लागू कराने में अहम भूमिका निभाने वाले इंडियन सोसाइटी ऑफ क्रिटिकल केयर मेडिसिन के पूर्व अध्यक्ष डॉ. राजकुमार मणी ने दी। वह पीजीआई की ओर से आयोजित किडनी और अग्नाशय प्रत्यारोपण पर स्वर्ण वर्षगांठ शिखर सम्मेलन में बतौर वक्ता मौजूद थे।
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नोटरी से करवानी होगी सत्यापित
उन्होंने बताया कि जैसे कैंसर या ऐसे ही मर्ज से ग्रस्त लोग होशोहवास में अपना एडवांस हेल्थ विल बना सकते हैं। यह एक किस्म की वसीयत है, जो सेहत से जुड़ी है। इसमें एक डायॅक्युमेंट बना सकते हैं। जिसमें मरीज एक फॉर्मेट तैयार करता है कि अंतिम स्थिति में मेरे इलाज में क्या नहीं होना चाहिए।

मरीज इसे तैयार करके नोटरी के माध्यम से सत्यापित करवा सकता है। फिर उसके दस्तावेज का पालन कानूनन अनिवार्य हो जाता है। इसमें मरीज अपने अंगदान की भी इच्छा शामिल कर सकता है। इसके आधार पर मरीज किसी को नॉमिनेट भी कर सकता है, जिससे अंतिम समय में उसके अनुसार इलाज तय हो। जैसे उसे आईसीयू में या वार्ड में तो रखा जाए लेकिन उस दौरान उस पर उन दवाओं और तकनीकों का उपयोग न किया जाए जो उसके लिए लाभदायक न हो।

22 वर्षों के संघर्ष का मिला फल
डॉ. राजकुमार मणी ने बताया कि 22 वर्षों से इस पर काम कर रहा हूं। ये उन मरीजों के लिए महत्वपूर्ण है जो गंभीर बीमारियों से ग्रस्त हैं। इंडियन सोसाइटी ऑफ क्रिटिकल केयर मेडिसिन के अध्यक्ष के तौर पर डॉ. राजकुमार ने 2005 में पहली गाइडलाइन बनाई। जो मेडिकल और एथिकल साइड पर आधारित थी लेकिन वो लागू नहीं हो पाया। उसे 2012 और 2014 में अपडेट किया गया। कुछ डॉक्टर इसे फॉलो करने लगे। लेकिन ज्यादातर इसे लेकर भ्रम की स्थिति में थे। 2018 में कोर्ट ने इसमें महत्वपूर्ण निर्णय लिया। उन्होंने इसे उचित और कानूनी मान लिया। इसके बाद ही विल यानि वसीयत बनाने की भी अनुमति मिली। लेकिन उस समय भी प्रक्रिया जटिल मानी जा रही थी। उसके बाद उसके सरलीकरण के लिए 2019 में अपील की गई। जनवरी 2023 में हमारे पक्ष में निर्णय सुनाया गया।

डॉक्टरों की कमेटी प्रत्येक अस्पताल में
डॉ. राजकुमार ने बताया कि इसके लिए प्रत्येक अस्पताल में प्राइमरी और सेकेंडरी दो बोर्ड स्थापित होती है। जिसमें दो-दो डॉक्टर और दो गवाह होते हैं। उनमें से एक डॉक्टर सीएमओ इनपैनल्ड होना चाहिए। उस बोर्ड की देखरेख में ऐसे मरीजों के इलाज की प्रक्रिया आगे जारी करने से संबंधित निर्णय लिया जाना है। यह वसीयत न होने पर भी मरीज और उसके परिजन के निर्णय को समर्थन देगी। इनका मुख्य उद्देश्य लामा की स्थिति पर काबू पाना है। 

डॉ. राजकुमार का कहना है कि जिन मरीजों पर व्यर्थ रूप से दवाईयां और लाइफ सेविंग तकनीक का प्रयोग किया जाता है। उन मरीज के परिवार पर आर्थिक बोझ बढ़ाता है। उन मरीजों की मौत आईसीयू में होना उचित नहीं है। उस मरीज का अधिकार है कि वह अंतिम सांस परिवार के साथ ले। परिवार के पास चुनाव का विकल्प नहीं होता। डॉक्टर दो-चार प्रतिशत चांस बोलकर मरीज को आईसीयू में रखे रहते हैं। इस स्थिति में मरीज के परिजन लामा जिसे लेफ्ट अगेंस्ड मेडिकल एडवाइज कहा जाता है की प्रक्रिया अपनाते हैं। इससे मरीज की मौत और दर्दनाक हो जाती है। इसे कम करने का प्रयास होना चाहिए। इसलिए यह कानून बेहद महत्वपूर्ण है।

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