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भाजपा-इनेलो के अलगाव से कांग्रेस को फायदा

Sun, 16 Mar 2014 10:39 AM IST
डॉ. सुरेंद्र धीमान/ अमर उजाला, चंडीगढ़
डॉ. सुरेंद्र धीमान/ अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Sun, 16 Mar 2014 10:39 AM IST
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हरियाणा में इस बार लोकसभा चुनाव के लिए इनेलो और भाजपा के बीच गठबंधन नहीं हो सका, जिसे लेकर कांग्रेस ने तो अवश्य ही राहत की सांस ली है। दोनों दलों के इस अलगाव का कांग्रेस को फायदा ही होगा।
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2009 के लोकसभा चुनाव में जब इनेलो-भाजपा का गठबंधन नहीं हो सका था, तब कांग्रेस ने सफलता हासिल की थी, लेकिन जब भी इनेलो और भाजपा के बीच जब भी चुनावी गठबंधन हुआ है, दोनों ही दल फायदे में रहे हैं। कांग्रेस को नुकसान ही हुआ है।
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लोकसभा चुनाव में तो यह गठबंधन एक बार कांग्रेस का सूपड़ा ही साफ कर चुका है जबकि दो बार विधानसभा चुनाव में इस गठबंधन ने कांग्रेस को धूल चटाई थी।

देश में इमरजेंसी के बाद 1977 में जब लोकसभा चुनाव हुए, तब हरियाणा में भारतीय लोक दल (बीएलडी) पार्टी के नाम से आज की इनेलो और भाजपा के अनेक नेताओं ने चुनाव लड़ते हुए सभी 10 सीटें जीती थीं।
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मगर 1980 के लोकसभा चुनाव में दोनों दल अलग हो गए और जनता पार्टी ने 10 सीटों पर चुनाव लड़कर केवल एक सीट जीती जबकि जनता पार्टी सेक्युलर (जेएनपी एस) ने भी 10 सीटों पर चुनाव लड़कर चार पर जीत हासिल की। कांग्रेस को तब 10 में से 5 सीटें मिली थीं।

1984 में दोनों दल अलग-अलग चुनाव लड़े

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1984 के लोकसभा चुनाव में भी दोनों दल अलग-अलग लड़े, नतीजतन कांग्रेस सभी 10 सीटें जीत गई। हालांकि उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश में कांग्रेस के प्रति सहानुभूति लहर भी थी।

1989 के लोकसभा चुनाव में भाजपा और इनेलो (तब जनता दल) गठबंधन फायदे में रहा। उस चुनाव में भाजपा तो अपने हिस्से की दोनों सीटें हारी लेकिन जनता दल ने 8 में से 6 सीटें जीत ली। कांग्रेस को 4 सीटें ही मिली।

बसपा के सभी नौ प्रत्याशी हार गए थे। दो साल बाद 1991 में भाजपा-जनता दल का गठबंधन टूट गया और दोनों दलों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा। नतीजतन भाजपा सभी 10 सीटों पर और जनता दल सात सीटों पर हार गए।

कांग्रेस ने 10 में से 9 सीटें जीतीं। उस समय कांग्रेस से अलग होकर बंसीलाल ने हविपा बनाई थी, जिसने चार में से एक सीट पर जीत हासिल की।

1996 में भाजपा-हविपा से गठबंधन

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1996 के चुनाव में भी भाजपा का हविपा से गठबंधन हो गया और इनेलो (उस समय समता पार्टी) अलग रह गई। उस चुनाव में भाजपा-हविपा गठबंधन लाभ में रहा जबकि इनेलो नुकसान में रही। भाजपा ने 6 में से 4 और हविपा ने 4 में से 3 जीती थीं।

कांग्रेस को सिर्फ 2 सीट ही मिलीं। सोनीपत से अरविंद शर्मा निर्दलीय सांसद बन गए। समता पार्टी सभी सीटों पर हार गई।
1998 के चुनाव में प्रदेश में दो गठबंधन मैदान में उतरे।

भाजपा-हविपा का गठबंधन कायम रहा जबकि इनेलो (हरियाणा लोक दल राष्ट्रीय) ने बसपा से गठबंधन कर चुनाव लड़ा। उस समय प्रदेश में भाजपा-हविपा की सरकार होने के बावजूद भाजपा 6 में से सिर्फ एक सीट जीत पाई जबकि हविपा को भी 4 में से सिर्फ एक सीट मिली। हरियाणा लोक दल राष्ट्रीय ने 7 में से 4 सीटें और बसपा ने 3 में से एक सीट जीती। कांग्रेस को तीन सीट ही मिली।

1999 में भाजपा-इनेलो गठबंधन

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1999 के चुनाव में भाजपा का इनेलो से गठबंधन हुआ तो गठबंधन ने कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया। भाजपा और इनेलो ने पांच-पांच सीटें जीत ली।

2000 में प्रदेश में भाजपा-इनेलो की सरकार बनी लेकिन उसी दौरान फरीदाबाद में भाजपा नेताओं पर लाठीचार्ज की घटना ने दोनों दलों में मनमुटाव पैदा कर दिया और 2004 के चुनाव आते-आते यह गठबंधन टूट गया।

दोनों पार्टियों ने अलग-अलग सभी दस सीटों पर चुनाव लड़ा। भाजपा को तो एक सीट पर जीत मिली लेकिन इनेलो एक भी सीट नहीं जीत सकी। राज्य की शेष नौ सीटें कांग्रेस की झोली में चली गईं।

2009 के चुनाव में भाजपा और इनेलो के बीच गठबंधन तो हुआ लेकिन इस बार दोनों दल अपने-अपने हिस्से की पांच-पांच सीटें हार गए। इस चुनाव में कांग्रेस ने दस में से नौ और हजकां ने अकेले चुनाव लड़ते हुए एक सीट जीती।

विधानसभा चुनाव में भी हावी रहा गठबंधन

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प्रदेश में 1991 के विधानसभा चुनाव में भाजपा-इनेलो अलग-अलग लड़े तो कांग्रेस ने राज्य में सरकार बनाई थी। लेकिन 1996 में जब भाजपा का हविपा से गठबंधन हुआ तो प्रदेश में हविपा-भाजपा की गठबंधन सरकार बनी।

2000 के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा-इनेलो गठबंधन ने चुनाव लड़ा तो उनकी सरकार बन गई। लेकिन 2005 और 2009 में दोनों दलों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा और दोनों ही दल सत्ता से बाहर रह गए। दोनों बार प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी। हालांकि 2009 में कांग्रेस की जोड़-तोड़कर सरकार बनी थी।
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