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पंजाबः शिअद में वरिष्ठ बनाम युवा की जंग हुई तेज, सुखबीर बादल की कमान से नाखुश हैं टकसाली

Tue, 30 Oct 2018 01:21 AM IST
सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर(पंजाब)
सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर(पंजाब) Updated Tue, 30 Oct 2018 01:21 AM IST
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Loksabha Election 2019, Revolt in Shiromani Akali Dal Party of Punjab
Sukhbir Badal - फोटो : File Photo
सुखबीर बादल के हाथों में शिरोमणि अकाली दल की कमान आ जाने के बाद से टकसाली अकाली पार्टी से नाखुश हैं। पार्टी के भीतर वरिष्ठ टकसाली नेताओं बनाम सुखबीर ब्रिगेड के बीच जंग छिड़ी हुई है। टकसाली अकाली प्रकाश सिंह बादल के नेतृत्व को तो स्वीकार करते हैं लेकिन सुखबीर व मजीठिया उन्हें स्वीकार नहीं हैं। उनका दर्द है कि पार्टी में सुखबीर और मजीठिया ही निर्णय लेते हैं। फिर चाहे वह सही हो या गलत।
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वे पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से चाहते हैं कि वे कोई सवाल न करें। मालवा में शिअद की तरफ से टकसाली नेताओं को दरकिनार कर सुखबीर अपनी लॉबी को आगे ला रहे हैं। मालवा में किसी समय सुखदेव सिंह ढींढसा और जत्थेदार तोता सिंह की तूती बोलती थी लेकिन पार्टी की कमान सुखबीर के हाथ में आने के बाद से मालवा में बंटी रोमाना और रोजी बरकंदी को आगे लाया जाने लगा। नतीजतन, मालवा के सभी महत्वपूर्ण फैसलों में ये दोनों युवा नेता शामिल होने लगे।
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सुखबीर का अपना विधानसभा हलका भी मालवा में पड़ता है। उन्होंने अपने विधानसभा हलके और जिले की कमान युवा नेता मंटा के हाथ दे रखी है। ऐसे में अकाली दल के टकसाली नेता दूर होते चले गए। पार्टी के कई महत्वपूर्ण फैसलों से उनको दूर रखा जाने लगा। सुखदेव सिंह ढींढसा को भी केंद्र सरकार में मंत्री पद नहीं दिलवाया गया जबकि पहले वह केंद्रीय मंत्री रह चुके थे। उनके स्थान पर सुखबीर बादल ने अपनी पत्नी हरसिमरत कौर को मंत्री बनवा दिया।
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सरवण सिंह फिल्लौर पार्टी को अलविदा कह चुके हैं

Loksabha Election 2019, Revolt in Shiromani Akali Dal Party of Punjab
सुखबीर बादल
वहीं दोआबा से टकसाली नेता सरवण सिंह फिल्लौर पार्टी को अलविदा कह चुके हैं। पार्टी की कोर कमेटी और कार्यालय संभालने वाले गुरचरण सिंह चन्नी भी पार्टी से दूरी बनाकर चल रहे हैं। दोआबा में सुखबीर और मजीठिया ने युवा नेता सर्बजोत साबी को पिछले कई साल से आगे कर रखा है। अकाली-भाजपा सरकार के दौरान साबी ही दोआबा का सर्वेसर्वा बना हुआ था और टकसाली अकाली इससे काफी खफा भी चल रहे थे।

हालांकि दोआबा दलित बहुसंख्यक क्षेत्र है और अकाली दल बसपा के नेताओं को पार्टी में शामिल कर अपनी गाड़ी चलाती रही है। विधायक पवन कुमार टीनू, अविनाश क्लेर और फिल्लौर से विधायक बलदेव खैरा बसपा से ही निकलकर आए हैं। शिअद में सबसे अहम जंग माझा में चल रही है। सांसद रणजीत सिंह ब्रह्मपुरा, पूर्व मंत्री सेवा सिंह सेखवां और सांसद रतन सिंह अजनाला का माझा क्षेत्र में जनाधार है, जिसे मजीठिया ने हथिया लिया।

मजीठिया द्वारा दरकिनार कर दिए जाने से तीनों नेता नाराज हैं। माझा के टकसाली अकाली नेताओं को यह अनुचित लगता है कि निचले स्तर पर काम किए बिना सुखबीर का रिश्तेदार माझा का जरनैल बन बैठा है। पूर्व मंत्री सेखवां ने साफ कह दिया कि अगर नए नेतृत्व ने हमारी बातों के महत्व को समझा होता तो हम खुलकर सामने आने और सिख संगत के सामने अपना मामला उठाने का कदम नहीं उठाते।

दरअसल, जब बादल परिवार जब सत्ता में था तब अकाली दल के कुछ ही नेता उनके खिलाफ बात करने की हिम्मत करते थे लेकिन अब बहुत से नेता बादल परिवार में सत्ता के केंद्रीकरण से नाराज हैं।

एसजीपीसी और अकाल तख्त पर नियंत्रण

Loksabha Election 2019, Revolt in Shiromani Akali Dal Party of Punjab
CM Parkash singh badal & Sukhbir singh badal - फोटो : File Photo
वरिष्ठ अकाली नेता अवतार सिंह मक्कड़ विधानसभा सत्र के बाद सुखबीर सिंह बादल के खिलाफ सार्वजनिक रूप से बोलने वाले पहले व्यक्ति थे। मक्कड़ जब एसजीपीसी के अध्यक्ष थे, जब डेरा प्रमुख को माफी दी गई थी। उस समय उन्होंने कहा था कि वह माफी देने के खिलाफ थे। उन्होंने यह भी साफ कर दिया था कि माफी का लिफाफा कहां से आया था।

सिख बुद्धिजीवियों ने शिरोमणि अकाली दल के नियंत्रण से एसजीपीसी और अकल तख्त को ‘मुक्त’ करने की मांग की है। एसजीपीसी की सदस्य किरणजोत कौर ने कहा कि एसजीपीसी सिखों के हित में काम करने के लिए बनाई गई थी न कि राजनीतिक दल के हित में। पिछले दशक में इस पर सिखों के नियंत्रण को कमजोर किया गया है।

सिख प्रतिनिधि के रूप में संस्था की शक्ति और सम्मान कम हो गया है। हर काम परमात्मा की इच्छा से होता है और आज सभी सिखों में जागरूकता आई है और अकाली की पंथक राजनीति पर सवाल उठने लगे हैं। अकाली दल ने पंथक रास्ता छोड़कर बाकी राजनीतिक पार्टियों का रास्ता अख्तियार किया। यही वजह है कि धर्म का राजनीतिक फायदे के लिए उपयोग किया गया।

 
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