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यहां महिलाओं के हाथों में है सत्ता की चाबी
अनिल भारद्वाज/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Tue, 08 Apr 2014 03:43 PM IST
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पंजाब की महिला मतदाताओं की भूमिका हर चुनाव में अहम रही है। इस बार भी ऐसा ही होने जा रहा है। प्रदेश में अभी तक एनरोल हुए 1 करोड़ 92 लाख 7 हजार 230 मतदाताओं में से 90 लाख 94 हजार 357 महिलाएं हैं। उनकी यह संख्या इस नजरिए से और भी महत्वपूर्ण हो जाती है कि 2012 में हुए विधानसभा चुनाव में पंजाब में कुल 78.20 फीसदी मतदान हुआ था, जिसमें महिलाएं बाजी मार गई थीं। इस 78.20 फीसदी मतों में से महिलाओं के 78.90, जबकि पुरुषों के 77.58 फीसदी मत थे।
इससे पहले 2007 में हुए विधानसभा चुनाव में भी यही स्थिति थी। कुल 75.45 फीसदी मतदान में से महिलाओं के 75.47, जबकि पुरुषों के 75.36 फीसदी वोट थे। लोकसभा चुनाव-2014 में भी पंजाब महिलाएं इसी प्रकार बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेंगी, ऐसी उम्मीद है।
ऐसे में खतरा सभी पार्टियों के लिए है, क्योंकि 1977 से 2012 तक हुए अलग-अलग चुनावों में जब-जब महिलाओं का मतदान प्रतिशत बढ़ा, उनमें से अधिकतर मौकों पर इसका नुकसान कांग्रेस व फायदा शिअद-भाजपा आदि को हुआ।
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इससे पहले 2007 में हुए विधानसभा चुनाव में भी यही स्थिति थी। कुल 75.45 फीसदी मतदान में से महिलाओं के 75.47, जबकि पुरुषों के 75.36 फीसदी वोट थे। लोकसभा चुनाव-2014 में भी पंजाब महिलाएं इसी प्रकार बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेंगी, ऐसी उम्मीद है।
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ऐसे में खतरा सभी पार्टियों के लिए है, क्योंकि 1977 से 2012 तक हुए अलग-अलग चुनावों में जब-जब महिलाओं का मतदान प्रतिशत बढ़ा, उनमें से अधिकतर मौकों पर इसका नुकसान कांग्रेस व फायदा शिअद-भाजपा आदि को हुआ।
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प्रदेश सरकार के गठन में योगदान
1977 के विधानसभा चुनाव में 63.35 फीसदी महिलाओं ने मतदान किया और शिअद-जनता सरकार बनी। 1980 में महिलाओं का मतदान प्रतिशत कम हुआ और सत्ता कांग्रेस को मिल गई। वहीं, 1985 के चुनाव में महिला मतदाताओं ने 1980 के मुकाबले ज्यादा मतदान किया और सत्ता शिरोमणि अकाली दल के हाथों में आ गई।
1992 में कुल मतदान प्रतिशत ही काफी कम रहा और इसमें से महिलाओं के मत भी घटे। सरकार कांग्रेस की बनी। 1997 में महिलाओं ने मतदान में पहले से कहीं अधिक दिलचस्पी दिखाई तथा शिअद-भाजपा गठबंधन को बड़ी जीत हासिल हुई। 2002 में महिलाओं की दिलचस्पी मतदान में घटी तथा सत्ता कांग्रेस की झोली में गई।
इसके बाद 2007 और 2012 में विधानसभा चुनावों में महिलाओं ने मतदान के सभी रिकॉर्ड तोड़ते हुए, पुरुषों से अधिक वोटें डालीं। नतीजा, दोनों ही मौकों पर शिअद-भाजपा गठबंधन को सत्ता नसीब हुई।
1992 में कुल मतदान प्रतिशत ही काफी कम रहा और इसमें से महिलाओं के मत भी घटे। सरकार कांग्रेस की बनी। 1997 में महिलाओं ने मतदान में पहले से कहीं अधिक दिलचस्पी दिखाई तथा शिअद-भाजपा गठबंधन को बड़ी जीत हासिल हुई। 2002 में महिलाओं की दिलचस्पी मतदान में घटी तथा सत्ता कांग्रेस की झोली में गई।
इसके बाद 2007 और 2012 में विधानसभा चुनावों में महिलाओं ने मतदान के सभी रिकॉर्ड तोड़ते हुए, पुरुषों से अधिक वोटें डालीं। नतीजा, दोनों ही मौकों पर शिअद-भाजपा गठबंधन को सत्ता नसीब हुई।
लोकसभा चुनाव में महिलाओं की भूमिका
पिछले दस लोकसभा चुनाव की बात करें तो पंजाब में महिलाओं के अधिक या कम दोनों ही तरह के मतदान का शिअद, भाजपा आदि दलों को 7 मौकों पर फायदा मिला। वहीं, कांग्रेस को दो लोकसभा चुनाव में महिलाओं के कम, जबकि पिछले आम चुनाव में इनके अधिक मतदान का फायदा मिला।
इमरजेंसी के बाद 1977 में हुए लोकसभा चुनाव में शिअद-बीएलडी गठबंधन को जीत हासिल हुई। 1980 में इसकी तुलना में महिलाओं का मतदान प्रतिशत कम होते ही कांग्रेस अधिक सीटें हासिल करने में कामयाब रहीं। 1985 में महिलाओं का मत प्रतिशत बढ़ा और शिअद को कांग्रेस से अधिक सीटें मिलीं।
1989 में शिअद (बादल) के बहिष्कार के बीच हुए आम चुनाव में महिला मतदाताओं ने 1985 के मुकाबले कम मतदान किया, लेकिन कांग्रेस को इसका फायदा नहीं मिल पाया। इस चुनाव में अकाली दल (मान) को प्रदेश की अधिकतर सीटों पर सफलता मिली। 1992 में बहुत ही कम मत पड़े और महिलाओं का मतदान प्रतिशत भी गिर गया। कांग्रेस को बड़ी जीत हासिल हुई।
1996 में महिलाओं का मतदान प्रतिशत बढ़ा और अकाली-बसपा गठबंधन कांग्रेस से कहीं अधिक सीटें ले गया। 1998, 1999 और 2004 में महिलाओं के बढ़ते-घटते मतदान प्रतिशत के बीच अकाली-भाजपा गठबंधन, कांग्रेस की तुलना में ज्यादा सीटें लेने में कामयाब रहा। 2009 जरूर अपवाद रहा, जब महिलाओं का मतदान प्रतिशत बढ़ने के बावजूद कांग्रेस प्रदेश की 13 में से 8 सीटों पर जीत हासिल करने में कामयाब रही।
इमरजेंसी के बाद 1977 में हुए लोकसभा चुनाव में शिअद-बीएलडी गठबंधन को जीत हासिल हुई। 1980 में इसकी तुलना में महिलाओं का मतदान प्रतिशत कम होते ही कांग्रेस अधिक सीटें हासिल करने में कामयाब रहीं। 1985 में महिलाओं का मत प्रतिशत बढ़ा और शिअद को कांग्रेस से अधिक सीटें मिलीं।
1989 में शिअद (बादल) के बहिष्कार के बीच हुए आम चुनाव में महिला मतदाताओं ने 1985 के मुकाबले कम मतदान किया, लेकिन कांग्रेस को इसका फायदा नहीं मिल पाया। इस चुनाव में अकाली दल (मान) को प्रदेश की अधिकतर सीटों पर सफलता मिली। 1992 में बहुत ही कम मत पड़े और महिलाओं का मतदान प्रतिशत भी गिर गया। कांग्रेस को बड़ी जीत हासिल हुई।
1996 में महिलाओं का मतदान प्रतिशत बढ़ा और अकाली-बसपा गठबंधन कांग्रेस से कहीं अधिक सीटें ले गया। 1998, 1999 और 2004 में महिलाओं के बढ़ते-घटते मतदान प्रतिशत के बीच अकाली-भाजपा गठबंधन, कांग्रेस की तुलना में ज्यादा सीटें लेने में कामयाब रहा। 2009 जरूर अपवाद रहा, जब महिलाओं का मतदान प्रतिशत बढ़ने के बावजूद कांग्रेस प्रदेश की 13 में से 8 सीटों पर जीत हासिल करने में कामयाब रही।
लोकसभा चुनाव
वर्ष---------------महिला मतदान प्रतिशत
1977---------------69.26
1980---------------60.21
1985---------------66.54
1989---------------58.32
1992---------------21.02
1996---------------61.11
1998---------------58.07
1999---------------54.52
2004---------------60.21
2009---------------68.40
1977---------------69.26
1980---------------60.21
1985---------------66.54
1989---------------58.32
1992---------------21.02
1996---------------61.11
1998---------------58.07
1999---------------54.52
2004---------------60.21
2009---------------68.40
विधानसभा चुनाव
वर्ष---------------महिला मतदान प्रतिशत
1977---------------63.65
1980---------------62.80
1985---------------66.72
1992---------------21.59
1997---------------67.84
2002---------------64.27
2007---------------75.47
2012---------------78.90
1977---------------63.65
1980---------------62.80
1985---------------66.72
1992---------------21.59
1997---------------67.84
2002---------------64.27
2007---------------75.47
2012---------------78.90