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यहां कम वोट पड़ने पर होता है कांग्रेस को फायदा
अनिल भारद्वाज/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Sun, 06 Apr 2014 10:02 AM IST
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पंजाब में 1977 से 2007 तक हुए 10 लोकसभा और 8 विधानसभा चुनावों के दौरान अधिक मतदान का कांग्रेस विरोधी पार्टियों को ज्यादा फायदा मिला है।
बेशक लोकसभा चुनाव के दौरान अधिक या कम मतदान का कोई ज्यादा फर्क कांग्रेस या इसके विरोधी दलों को नहीं पड़ा, लेकिन विधानसभा चुनाव में इसका स्पष्ट असर देखने को मिला। विधानसभा चुनाव में जब-जब मतदान प्रतिशत बढ़ा, इसका फायदा कांग्रेस विरोधी दलों शिअद, भाजपा आदि को हुआ।
लोकसभा चुनाव में मतदान का खेल
1977 के लोकसभा चुनाव में 70.14 फीसदी मतदान हुआ और प्रदेश में अकाली दल और बीएलडी को जबरदस्त सफलता मिली। 1980 में मतदान का प्रतिशत कम होकर 62.65 रह गया और कांग्रेस ने लगभग क्लीन स्वीप किया।
1985 में मतदान प्रतिशत बढ़ा और 67.36 फीसदी पर जा पहुंचा। इसका फायदा शिअद को मिला और इसको कांग्रेस के मुकाबले एक सीट अधिक मिली। 1989 में शिअद (बादल) के बहिष्कार के बीच 62.67 फीसदी लोगों ने मतदान किया और अकाली दल मान ने 6 सीटें जीत कर सभी को हैरान कर दिया।
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1992 में एक बार फिर शिअद (बादल) ने चुनाव प्रक्रिया का बायकॉट किया तथा मतदान केवल 23.96 फीसदी रहा। कांग्रेस 13 में से 12 सीटों पर जीत दर्ज करने में कामयाब रही। 1996 में मतदान प्रतिशत बढ़कर 62.25 फीसदी हो गया तथा शिअद-बसपा गठबंधन ने 11 सीटें जीतीं।
1998, 1999 तथा 2004 में अकाली-भाजपा गठबंधन ने कांग्रेस को लगातार शिकस्त दी। इन वर्षों के लोकसभा चुनावों में क्रमश: 60.07, 56.11 और 61.59 फीसदी मतदान हुआ। 2009 में अधिक मतदान फायदा जरूर कांग्रेस को मिला। 69.77 फीसदी मतदान के बीच पार्टी 13 में से 8 सीटों पर जीत हासिल करने में सफल रही।
विधानसभा चुनाव में अधिक मत प्रतिशत बना कांग्रेस का सिरदर्द
1977 के विधानसभा चुनाव में 65.37 फीसदी मतदान हुआ और अकाली-जनता गठबंधन को जीत मिली। 1980 में मतदान कम होकर 64.33 फीसदी रह गया तथा सरकार कांग्रेस की बनी। मतदान प्रतिशत बढ़कर 67.53 फीसदी हुआ और शिअद की सरकार बन गई।
1992 में शिअद (बादल) के बहिष्कार के बीच हुए 23.82 फीसदी मतदान ने कांग्रेस की सरकार बनवा दी। 1997 में मतदान एक बार फिर बढ़ा और 68.73 फीसदी तक पहुंच गया। इस चुनाव में अकाली-भाजपा गठबंधन को जबरदस्त सफलता मिली। 2002 में मतदान फिर गिरा और 65.14 फीसदी पोलिंग के बीच कांग्रेस को बहुमत मिला।
2007 में मतदान बढ़कर 75.45 फीसदी हुआ और सरकार अकाली-भाजपा गठबंधन की बन गई। 2012 में मतदान प्रतिशत और बढ़ गया। इसके 78.20 फीसदी पर पहुंचते ही 1966 में पंजाब के पुनर्गठन के बाद से जारी हर बार सत्ताधारी पार्टी के बदलने का सिलसिला भी बदल गया। अकाली-भाजपा गठबंधन ने इतिहास बनाते हुए लगातार दूसरी बार पंजाब में सरकार बनाई।
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बेशक लोकसभा चुनाव के दौरान अधिक या कम मतदान का कोई ज्यादा फर्क कांग्रेस या इसके विरोधी दलों को नहीं पड़ा, लेकिन विधानसभा चुनाव में इसका स्पष्ट असर देखने को मिला। विधानसभा चुनाव में जब-जब मतदान प्रतिशत बढ़ा, इसका फायदा कांग्रेस विरोधी दलों शिअद, भाजपा आदि को हुआ।
लोकसभा चुनाव में मतदान का खेल
1977 के लोकसभा चुनाव में 70.14 फीसदी मतदान हुआ और प्रदेश में अकाली दल और बीएलडी को जबरदस्त सफलता मिली। 1980 में मतदान का प्रतिशत कम होकर 62.65 रह गया और कांग्रेस ने लगभग क्लीन स्वीप किया।
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1985 में मतदान प्रतिशत बढ़ा और 67.36 फीसदी पर जा पहुंचा। इसका फायदा शिअद को मिला और इसको कांग्रेस के मुकाबले एक सीट अधिक मिली। 1989 में शिअद (बादल) के बहिष्कार के बीच 62.67 फीसदी लोगों ने मतदान किया और अकाली दल मान ने 6 सीटें जीत कर सभी को हैरान कर दिया।
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1992 में एक बार फिर शिअद (बादल) ने चुनाव प्रक्रिया का बायकॉट किया तथा मतदान केवल 23.96 फीसदी रहा। कांग्रेस 13 में से 12 सीटों पर जीत दर्ज करने में कामयाब रही। 1996 में मतदान प्रतिशत बढ़कर 62.25 फीसदी हो गया तथा शिअद-बसपा गठबंधन ने 11 सीटें जीतीं।
1998, 1999 तथा 2004 में अकाली-भाजपा गठबंधन ने कांग्रेस को लगातार शिकस्त दी। इन वर्षों के लोकसभा चुनावों में क्रमश: 60.07, 56.11 और 61.59 फीसदी मतदान हुआ। 2009 में अधिक मतदान फायदा जरूर कांग्रेस को मिला। 69.77 फीसदी मतदान के बीच पार्टी 13 में से 8 सीटों पर जीत हासिल करने में सफल रही।
विधानसभा चुनाव में अधिक मत प्रतिशत बना कांग्रेस का सिरदर्द
1977 के विधानसभा चुनाव में 65.37 फीसदी मतदान हुआ और अकाली-जनता गठबंधन को जीत मिली। 1980 में मतदान कम होकर 64.33 फीसदी रह गया तथा सरकार कांग्रेस की बनी। मतदान प्रतिशत बढ़कर 67.53 फीसदी हुआ और शिअद की सरकार बन गई।
1992 में शिअद (बादल) के बहिष्कार के बीच हुए 23.82 फीसदी मतदान ने कांग्रेस की सरकार बनवा दी। 1997 में मतदान एक बार फिर बढ़ा और 68.73 फीसदी तक पहुंच गया। इस चुनाव में अकाली-भाजपा गठबंधन को जबरदस्त सफलता मिली। 2002 में मतदान फिर गिरा और 65.14 फीसदी पोलिंग के बीच कांग्रेस को बहुमत मिला।
2007 में मतदान बढ़कर 75.45 फीसदी हुआ और सरकार अकाली-भाजपा गठबंधन की बन गई। 2012 में मतदान प्रतिशत और बढ़ गया। इसके 78.20 फीसदी पर पहुंचते ही 1966 में पंजाब के पुनर्गठन के बाद से जारी हर बार सत्ताधारी पार्टी के बदलने का सिलसिला भी बदल गया। अकाली-भाजपा गठबंधन ने इतिहास बनाते हुए लगातार दूसरी बार पंजाब में सरकार बनाई।