फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Chandigarh ›   Loksabha Election 2014, Punjab, Ambika Soni, Arun Jaitely

सियासी जमीन तलाशते दिल्ली के ये दो दिग्गज

Sun, 06 Apr 2014 07:20 PM IST
अखिल तलवार/अमर उजाला, चंडीगढ़
अखिल तलवार/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Sun, 06 Apr 2014 07:20 PM IST
विज्ञापन
Loksabha Election 2014, Punjab, Ambika Soni, Arun Jaitely
28 दिसंबर 1952 को पंजाबी हिंदू परिवार में जन्मे अरुण जेटली के पिता वकील थे। सेंट जेवियर्स, श्रीराम कॉलेज और दिल्ली यूनिवर्सिटी से उन्होंने शिक्षा हासिल की। एबीवीपी से जुड़े और 1974 में डीयू की स्टूडेंट्स यूनियन के प्रेसिडेंट बने।
विज्ञापन


1973 के जेपी आंदोलन में प्रमुख युवा नेता रहे। जेपी की गठित नेशनल कमेटी फॉर स्टूडेंट्स एंड यूथ ऑर्गेनाइजेशन के कनवीनर बनाए गए। इमरजेंसी के दौरान 19 महीने जेल में रहे, बाहर आने के बाद जनसंघ ज्वाइन किया।
विज्ञापन


1991 में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य और 1999 में प्रवक्ता बने। अटल बिहारी वाजपेई की सरकार में सूचना प्रसारण राज्यमंत्री बनाए गए, फिर नवगठित विनिवेश मंत्रालय के राज्यमंत्री बने। बाद में कानून, न्याय और कंपनी मामलों का अतिरिक्त प्रभार दिया गया। फिर कैबिनेट मंत्री बनाया गया।
विज्ञापन
विज्ञापन


2006 में राज्य सभासदस्य बने, राज्य सभा में विपक्ष का नेता बनने के बाद एक पार्टी एक पद के सिद्धांत पर 2009 में महासचिव पद से इस्तीफा दे दिया। 1980 से पार्टी में होने के बावजूद जेटली ने कभी चुनाव नहीं लड़ा।

दो संगठनों की प्रधान रहीं अंबिका

Loksabha Election 2014, Punjab, Ambika Soni, Arun Jaitely
13 नवंबर 1942 को लाहौर में जन्मी अंबिका सोनी के पिता आईसीएस अफसर थे। वेलहम गर्ल्स स्कूल देहरादून व इंद्रप्रस्थ कॉलेज दिल्ली से पढ़ाई के बाद उन्होंने बैंकाक और यूनिवर्सिटी ऑफ क्यूबा हवाना से शिक्षा हासिल की।

देश के बंटवारे के समय अंबिका पिता अमृतसर जिले के डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर थे, उन्होंने प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के काफी करीब रह कर विस्थापितों के पुनर्वास के लिए काम किया था। तभी से दोनों परिवारों के संबंध थे।

1969 में जब कांग्रेस विभाजन के दौर में थी तो इंदिरा गांधी, अंबिका को कांग्रेस में लाईं। 1975 में वह यूथ कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रधान बनीं और संजय गांधी के साथ काम किया। 1976 में पहली बार राज्य सभा की सदस्य बनीं। 1998 में महिला कांग्रेस का राष्ट्रीय प्रधान बनाया गया।

1999 से 2006 तक पार्टी की राष्ट्रीय महासचिव रहीं। वर्ष 2000 में फिर राज्यसभा सदस्य बनाया गया। 2006 से 2009 तक पर्यटन और उसके बाद सूचना प्रसारण मंत्री रहीं। जुलाई 2010 में फिर राज्यसभा सदस्य चुनी गईं। इतने लंबे सियासी कैरियर में अंबिका भी पहली बार चुनाव लड़ रही हैं।

अपने-अपने राष्ट्रीय नेतृत्व के हैं करीबी

Loksabha Election 2014, Punjab, Ambika Soni, Arun Jaitely
पंजाब का लोकसभा चुनाव इस बार कुछ खास बन गया है। यह पहला मौका होगा जब दोनों प्रमुख पार्टियों के दो राष्ट्रीय नेता पंजाब की सरजमीं से चुनाव मैदान में हैं। भाजपा ने अरुण जेटली को अमृतसर से तो कांग्रेस ने अंबिका सोनी को आनंदपुर सीट से उतारा है।

दोनों नेताओं के लिए यह जीत बेहद अहम बन गई है क्योंकि दिल्ली के ये दिज्गज पंजाब में सियासी जमीन तलाशने के लिए आए हैं। इन दोनों नेताओं में कई दिलचस्प समानताएं हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि दोनों का लंबा सियासी कैरियर है। इसके बावजूद ये कभी चुनाव नहीं लड़े। दोनों ही नेता पहली बार चुनाव मैदान में उतरे हैं। दोनों ही बाहरी हलकों से लड़ रहे हैं।

अरुण जेटली व अंबिका सोनी पंजाबी परिवारों से हैं। दोनों की साफ छवि है और एक अच्छे वक्ता और सियासी रणनीतिकार के रूप में पहचान है। अपनी-अपनी पार्टियों के राष्ट्रीय नेतृत्व के दोनों बेहद करीबी हैं और पार्टियों के अहम फैसलों में भूमिका निभाते रहे हैं। अरुण जेटली जहां राज्य सभा में विपक्ष के नेता हैं। वहीं, अंबिका, कांग्रेस प्रधान सोनिया गांधी की सियासी सलाहकार हैं।

आसान नहीं चुनावी मैदान की डगर

Loksabha Election 2014, Punjab, Ambika Soni, Arun Jaitely
चुनावी मैदान में पहली बार उतरे दोनों दिज्गजों के लिए संसद की डगर आसान नहीं है। अरुण जेटली ने जब अमृतसर से लड़ने का फैसला किया था तो यह विनिंग सीट मानी जा रही थी, तब तक कांग्रेस का कोई मजबूत उम्मीदवार सामने नहीं आया था।

डिप्टी सीएम सुखबीर बादल ने आत्मविश्वास के साथ जेटली को भरोसा दिलाया था कि वह सिर्फ नामांकन भरने आएं, अकाली दल उन्हें जिता कर भेजेगा। पर कांग्रेस हाईकमान ने सूबे के सबसे बड़े नेता पूर्व सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह को यहां से उतार कर गठबंधन को करारा झटका दिया है।

कैप्टन का ग्रामीण इलाकों में आधार है, जेटली के मुकाबले सिख चेहरा भी असर दिखा सकता है। उनके आने से कांग्रेस एकजुट हो गई है तो जेटली अभी तक नवजोत सिद्धू गुट को साथ नहीं ला सके हैं। उधर, अंबिका सोनी का मुकाबला अकाली दल के प्रो. प्रेम सिंह चंदूमाजरा से है।

आनंदपुर साहिब हलका चार जिलों में फैला होने के कारण प्रचार मुश्किल है और हलके के साथ-साथ अंबिका के लिए सब कुछ नया है। अकाली दल यहां एकजुट है तो कुछ जिला प्रधानों की नियुक्ति के कारण कांग्रेसी नाराज हैं। अंबिका फिलहाल कांग्रेसियों को एकजुट करने में लगी हैं, वही उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed