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लोकसभा चुनाव 2019: सिरसा में कांग्रेस-इनेलो में वर्चस्व की लड़ाई, भाजपा को चाहिए पहली जीत
Sun, 05 May 2019 12:35 PM IST
खुशबू गोयल
यशपाल शर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
यशपाल शर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: खुशबू गोयल
Updated Sun, 05 May 2019 12:35 PM IST
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इनेलो नेता अभय चौटाला
- फोटो : फाइल फोटो
प्राचीन एवं गौरवपूर्ण इतिहास की नगरी सिरसा में कांग्रेस और इनेलो अपने वर्चस्व की जंग लड़ रही है। वहीं भाजपा को पहली जीत चाहिए। कांग्रेस के इस किले को इनेलो व ताऊ देवीलाल परिवार काफी समय से भेदता आ रहा है। इनेलो सुप्रीमो ओमप्रकाश चौटाला परिवार की यहां धमक का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बीते विधानसभा चुनाव में भाजपा लहर के बावजूद नौ में से सात सीटें इनेलो व एक उसकी सहयोगी शिरोमणि अकाली दल ने जीती थीं। इनेलो ने सिरसा लोकसभा क्षेत्र में कांग्रेस को तो हाशिए पर ही धकेल दिया है।
भाजपा की भी सिरसा लोकसभा क्षेत्र में कोई अधिक पैठ नहीं। इतना जरूर है कि भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सुभाष बराला टोहाना से विधायक हैं। कभी इस संसदीय क्षेत्र में कांग्रेस की तूती बोलती थी। केंद्रीय राज्यमंत्री कुमारी सैलजा के पिता चौधरी दलबीर सिंह यहां से चार बार और खुद सैलजा दो बार सांसद रहीं। आत्मा राम गिल और कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष अशोक तंवर भी यहां से एक-एक बार सांसद रह चुके हैं। इस बार यहां से तंवर फिर चुनावी दंगल में उतरे हुए हैं। 2014 में उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा था।
चुनाव के शुरुआती दौर में माना जा रहा था कि मुकाबला इस बार कांग्रेस और इनेलो के बीच ही रहेगा। चूंकि, चरणजीत रोड़ी यहां से इनेलो सांसद हैं। मगर, जैसे-जैसे चुनाव बढ़ता गया मुकाबला रोचक होता गया। भाजपा की सुनीता दुग्गल, तंवर और रोड़ी की सियासी जमीन खिसकाने का दम भर रही हैं। उन्हें मोदी फैक्टर का भी लाभ मिलता नजर आ रहा है। जजपा ने यहां से निर्मल सिंह को उतारा है। कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष अशोक तंवर इस बार भी यहां तगड़े सियासी भंवर में फंसे हुए हैं तो रोड़ी की राह भी आसान नहीं दिख रही। भाजपा यहां पहली बार कमल खिलाने के लिए जीजान से जुटी है।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दुग्गल की चुनावी नैया पार लगाने के लिए 8 मई फतेहाबाद में चुनावी रैली करने आ रहे हैं, जिससे हवा का रुख बदल सकता है। उधर, कांग्रेस प्रत्याशी अशोक तंवर ने भाजपा की रणनीति को मात देने के लिए सिरसा डेरे के फेरे लगाने भी शुरू कर दिए हैं। वह प्रवचन के दौरान भी डेरे में हाजिरी लगा चुके हैं। तंवर समर्थक व डीएनटी प्रकोष्ठ के चेयरमैन भीम सिंह महेशवाल तो कांग्रेस को डेरे का समर्थन मिलने का दावा भी करते हैं। उधर, इनेलो भी डेरे का समर्थन चुनावों में मिलने की आस लगाए बैठा है।
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भाजपा की भी सिरसा लोकसभा क्षेत्र में कोई अधिक पैठ नहीं। इतना जरूर है कि भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सुभाष बराला टोहाना से विधायक हैं। कभी इस संसदीय क्षेत्र में कांग्रेस की तूती बोलती थी। केंद्रीय राज्यमंत्री कुमारी सैलजा के पिता चौधरी दलबीर सिंह यहां से चार बार और खुद सैलजा दो बार सांसद रहीं। आत्मा राम गिल और कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष अशोक तंवर भी यहां से एक-एक बार सांसद रह चुके हैं। इस बार यहां से तंवर फिर चुनावी दंगल में उतरे हुए हैं। 2014 में उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा था।
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चुनाव के शुरुआती दौर में माना जा रहा था कि मुकाबला इस बार कांग्रेस और इनेलो के बीच ही रहेगा। चूंकि, चरणजीत रोड़ी यहां से इनेलो सांसद हैं। मगर, जैसे-जैसे चुनाव बढ़ता गया मुकाबला रोचक होता गया। भाजपा की सुनीता दुग्गल, तंवर और रोड़ी की सियासी जमीन खिसकाने का दम भर रही हैं। उन्हें मोदी फैक्टर का भी लाभ मिलता नजर आ रहा है। जजपा ने यहां से निर्मल सिंह को उतारा है। कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष अशोक तंवर इस बार भी यहां तगड़े सियासी भंवर में फंसे हुए हैं तो रोड़ी की राह भी आसान नहीं दिख रही। भाजपा यहां पहली बार कमल खिलाने के लिए जीजान से जुटी है।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दुग्गल की चुनावी नैया पार लगाने के लिए 8 मई फतेहाबाद में चुनावी रैली करने आ रहे हैं, जिससे हवा का रुख बदल सकता है। उधर, कांग्रेस प्रत्याशी अशोक तंवर ने भाजपा की रणनीति को मात देने के लिए सिरसा डेरे के फेरे लगाने भी शुरू कर दिए हैं। वह प्रवचन के दौरान भी डेरे में हाजिरी लगा चुके हैं। तंवर समर्थक व डीएनटी प्रकोष्ठ के चेयरमैन भीम सिंह महेशवाल तो कांग्रेस को डेरे का समर्थन मिलने का दावा भी करते हैं। उधर, इनेलो भी डेरे का समर्थन चुनावों में मिलने की आस लगाए बैठा है।
अभय चौटाला को गृह क्षेत्र में दिखानी होगी ताकत
इनेलो के वरिष्ठ नेता अभय चौटाला भी सिरसा के ही ऐलनाबाद से विधायक हैं। सिरसा चौटाला परिवार का गृह क्षेत्र है। इसे इनेलो का गढ़ भी माना जाता है, इसलिए यहां अभय को अपनी साख बरकरार रखने के लिए पूरा दम चुनाव में दिखाना होगा। भाजपा प्रदेशाध्यक्ष बराला के लिए भी सिरसा में जीत नाक का सवाल बनी हुई है।
सिरसा डेरे ने साध रखी चुप्पी
नेता समर्थन पाने के लिए बेशक सिरसा डेरे के चक्कर काट रहे हों, लेकिन डेरे के राजनीतिक विंग ने पूरी तरह से चुप्पी साधी हुई है। डेरे की ओर से किसी का भी समर्थन या विरोध करने का कोई संदेश अभी तक जारी नहीं हुआ है।
गोपाल कांडा भी नहीं खोल रहे अपने पत्ते
भूपेंद्र सिंह हुड्डा सरकार में गृह राज्य मंत्री रह चुके हिलोपा प्रमुख गोपाल कांडा सियासत के मझे हुए खिलाड़ी हैं। सिरसा लोकसभा में उनका समर्थन किसे रहेगा, इसके लिए वह अपने पत्ते नहीं खोल रहे। तंवर ने कांडा को साधने की कोशिश की है, मगर कांडा ने अपने समर्थकों को कोई स्पष्ट निर्देश जारी नहीं किए हैं।
सिरसा डेरे ने साध रखी चुप्पी
नेता समर्थन पाने के लिए बेशक सिरसा डेरे के चक्कर काट रहे हों, लेकिन डेरे के राजनीतिक विंग ने पूरी तरह से चुप्पी साधी हुई है। डेरे की ओर से किसी का भी समर्थन या विरोध करने का कोई संदेश अभी तक जारी नहीं हुआ है।
गोपाल कांडा भी नहीं खोल रहे अपने पत्ते
भूपेंद्र सिंह हुड्डा सरकार में गृह राज्य मंत्री रह चुके हिलोपा प्रमुख गोपाल कांडा सियासत के मझे हुए खिलाड़ी हैं। सिरसा लोकसभा में उनका समर्थन किसे रहेगा, इसके लिए वह अपने पत्ते नहीं खोल रहे। तंवर ने कांडा को साधने की कोशिश की है, मगर कांडा ने अपने समर्थकों को कोई स्पष्ट निर्देश जारी नहीं किए हैं।
आठ बार कांग्रेस ने जीती सिरसा सीट
1967 व 1971 में यह सीट कांग्रेस के दलबीर सिंह ने जीती। 1977 में आपातकाल की आंधी के बाद भारतीय लोकदल के चंद्रराम ने, 1980 व 1984 में कांग्रेस के दलबीर सिंह सिंह फिर यहां से जीते। 1988 के चुनाव में लोकदल के हेत राम को जीत हासिल हुई। 1989 में जनता दल के हेत राम व 1991 व 1996 में कांग्रेस की कुमारी सैलजा ने इस सीहट पर कब्जा जमाया। 1998 में हरियाणा लोकदल राष्ट्रीय के सुशील कुमार, 1999 में इनेलो से फिर सुशील कुमार जीते। 2004 में कांग्रेस के आत्म सिंह गिल और 2009 में कांग्रेस के अशोक तंवर ने यहां जीत दर्ज की। 2014 में चरणजीत सिंह रोड़ी जीतने में सफल हुए।
रोड़ी ने तंवर को बड़े अंतर से हराया
पिछले लोकसभा चुनाव में इंडियन नेशनल लोकदल के चरणजीत सिंह रोड़ी ने 1,15,736 वोट से जीत हासिल की थी। चरणजीत सिंह को 39.59 फीसदी वोट के साथ 5,06,370 में मत मिले थे, जबकि कांग्रेस के अशोक तंवर को 30.54 फीसद वोट के साथ कुल 3,90,370 वोट पड़े थे। भाजपा व हजकां उम्मीदवार व पूर्व सांसद डॉ. सुशील कुमार इंदौरा 2,41,067 वोट ही ले पाए थे।
इनेलो को बचानी होगी सीट
सिरसा संसदीय क्षेत्र में इनेलो के सामने सबसे बड़ी चुनौती सीट बचाने की है। नौ विधानसभा सीटों में से सात पर जीते इनेलो विधायकों में से डबवाली की विधायक नैना चौटाला और नरवाना के विधायक पिरथी सिंह नंबरदार इनेलो छोड़कर जजपा के साथ जा चुके हैं। रतिया में इनेलो से प्रो. रविंद्र बलियाला, कालांवाली में शिअद के बलकौर सिंह, रानियां में इनेलो के रामचंद्र कंबोज, ऐलनाबाद से अभय सिंह चौटाला, टोहाना से सुभाष बराला, फतेहाबाद से इनेलो के बलवान सिंह दौलतपुरिया व सिरसा से इनेलो के माखन लाल सिंगला विधायक हैं। अब भी संसदीय क्षेत्र में इनेलो के विधायक ज्यादा हैं, ऐसे में उन पर अपनी पार्टी के सांसद को दोबारा जिताने का दबाव है। इस बार लोकसभा चुनाव में शिअद का समझौता भाजपा से हो चुका है। जिससे भी इनेलो को पार पाना होगा।
रोड़ी ने तंवर को बड़े अंतर से हराया
पिछले लोकसभा चुनाव में इंडियन नेशनल लोकदल के चरणजीत सिंह रोड़ी ने 1,15,736 वोट से जीत हासिल की थी। चरणजीत सिंह को 39.59 फीसदी वोट के साथ 5,06,370 में मत मिले थे, जबकि कांग्रेस के अशोक तंवर को 30.54 फीसद वोट के साथ कुल 3,90,370 वोट पड़े थे। भाजपा व हजकां उम्मीदवार व पूर्व सांसद डॉ. सुशील कुमार इंदौरा 2,41,067 वोट ही ले पाए थे।
इनेलो को बचानी होगी सीट
सिरसा संसदीय क्षेत्र में इनेलो के सामने सबसे बड़ी चुनौती सीट बचाने की है। नौ विधानसभा सीटों में से सात पर जीते इनेलो विधायकों में से डबवाली की विधायक नैना चौटाला और नरवाना के विधायक पिरथी सिंह नंबरदार इनेलो छोड़कर जजपा के साथ जा चुके हैं। रतिया में इनेलो से प्रो. रविंद्र बलियाला, कालांवाली में शिअद के बलकौर सिंह, रानियां में इनेलो के रामचंद्र कंबोज, ऐलनाबाद से अभय सिंह चौटाला, टोहाना से सुभाष बराला, फतेहाबाद से इनेलो के बलवान सिंह दौलतपुरिया व सिरसा से इनेलो के माखन लाल सिंगला विधायक हैं। अब भी संसदीय क्षेत्र में इनेलो के विधायक ज्यादा हैं, ऐसे में उन पर अपनी पार्टी के सांसद को दोबारा जिताने का दबाव है। इस बार लोकसभा चुनाव में शिअद का समझौता भाजपा से हो चुका है। जिससे भी इनेलो को पार पाना होगा।