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लोकसभा चुनाव 2019 में हरियाणा में जीत के समीकरण बिगाड़ सकता है आप-जजपा गठबंधन, जानिए कैसे
Sat, 13 Apr 2019 01:21 PM IST
खुशबू गोयल
यशपाल शर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
यशपाल शर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: खुशबू गोयल
Updated Sat, 13 Apr 2019 01:21 PM IST
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दुष्यंत चौटाला
लोकसभा चुनाव 2019 के मद्देनजर हरियाणा में आम आदमी पार्टी और जननायक जनता पार्टी गठबंधन जीत के समीकरण बिगाड़ सकता है। दोनों खुद को तीसरे विकल्प के तौर पर स्थापित करने की तैयारी में हैं। देर से ही सही पर लोकसभा चुनाव में दोनों दलों की एक साथ एंट्री फिलहाल दुरुस्त कही जा सकती है। गठबंधन पर काफी समय तक दोनों दलों के बीच पेच फंसा रहा, लेकिन नामांकन प्रक्रिया शुरू होने से ठीक पहले सीट बंटवारे पर सहमति बनाकर दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल और जजपा नेता दुष्यंत चौटाला ने विरोधियों को बड़ा झटका दे दिया है।
केजरीवाल और दुष्यंत ने जाट और गैर जाट का समीकरण बनाया है। दुष्यंत की ताकत जाट वोट बैंक है और सिख मतदाता भी उनके साथ आ सकते हैं। क्योंकि उन्होंने पार्टी का प्रदेशाध्यक्ष निशान सिंह को बनाया हुआ है। पिछड़ों में भी जजपा का कुछ प्रभाव है। केजरीवाल की ताकत वैश्य, ब्राह्मण, यादव, पंजाबी व शहरी मतदाता हैं। आप के प्रदेशाध्यक्ष नवीन जयहिंद ब्राह्मण हैं, तो उनका भी असर रहेगा। इसलिए आप और जजपा मिलकर हरियाणा में विरोधी दलों के समीकरण गड़बड़ा सकते हैं। भाजपा- कांग्रेस के लिए जहां केजरीवाल-दुष्यंत का गठबंधन किसी चुनौती से कम नहीं है, वहीं इनके लिए जीत भी अब आसान नहीं होगी।
इनेलो को तो अब चुनावी रण में और भी फूंक-फूंक कर कदम रखने होंगे। अगर चूक हुई तो जजपा-आप का मेल इनेलो को बुरी तरह धराशायी कर सकता है। जींद उपचुनाव में जजपा और आप साथ मिलकर ऐसा कर भी चुके हैं। इनेलो का अधिकांश वोट बैंक सिखक गया था। इससे भाजपा को तो फायदा हुआ ही जजपा उम्मीदवार दिग्विजय चौटाला भी अच्छे मतों के साथ दूसरे स्थान पर रहे थे। इसलिए लोकसभा चुनाव में भी इनेलो को अपने वोट बैंक को संभालने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाना होगा।
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केजरीवाल और दुष्यंत ने जाट और गैर जाट का समीकरण बनाया है। दुष्यंत की ताकत जाट वोट बैंक है और सिख मतदाता भी उनके साथ आ सकते हैं। क्योंकि उन्होंने पार्टी का प्रदेशाध्यक्ष निशान सिंह को बनाया हुआ है। पिछड़ों में भी जजपा का कुछ प्रभाव है। केजरीवाल की ताकत वैश्य, ब्राह्मण, यादव, पंजाबी व शहरी मतदाता हैं। आप के प्रदेशाध्यक्ष नवीन जयहिंद ब्राह्मण हैं, तो उनका भी असर रहेगा। इसलिए आप और जजपा मिलकर हरियाणा में विरोधी दलों के समीकरण गड़बड़ा सकते हैं। भाजपा- कांग्रेस के लिए जहां केजरीवाल-दुष्यंत का गठबंधन किसी चुनौती से कम नहीं है, वहीं इनके लिए जीत भी अब आसान नहीं होगी।
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इनेलो को तो अब चुनावी रण में और भी फूंक-फूंक कर कदम रखने होंगे। अगर चूक हुई तो जजपा-आप का मेल इनेलो को बुरी तरह धराशायी कर सकता है। जींद उपचुनाव में जजपा और आप साथ मिलकर ऐसा कर भी चुके हैं। इनेलो का अधिकांश वोट बैंक सिखक गया था। इससे भाजपा को तो फायदा हुआ ही जजपा उम्मीदवार दिग्विजय चौटाला भी अच्छे मतों के साथ दूसरे स्थान पर रहे थे। इसलिए लोकसभा चुनाव में भी इनेलो को अपने वोट बैंक को संभालने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाना होगा।
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जाट आंदोलन के बाद जाट-गैर जाट की राजनीति हावी
जाट आंदोलन के बाद प्रदेश में जाट-गैर जाट की राजनीति हावी हुई है। उसके चलते ही भाजपा ने न केवल पांच नगर निगमों के मेयर चुनाव में बड़ी जीत हासिल की, बल्कि जाटलैंड में गैर जाट मतदाताओं के सहारे कमल खिला दिया। शहरी मतदाता भाजपा की ताकत बने हुए हैं तो कांग्रेस को नुकसान उठाना पड़ रहा है।
चूंकि, जाट आंदोलन के दौरान शहरों में ज्यादा उपद्रव हुआ था। इससे शहरी मतदाता कांग्रेस से नाराज भी हैं। जाट मतदाता कांग्रेस की ताकत माने जाते हैं, फिर भी जीत के लिए पार्टी को अन्य जातियों का भी वोट हासिल करना होगा। जजपा भी जाट मतदाताओं में अपना जनाधार बढ़ा रही है। इनेलो को पार्टी व चौटाला परिवार के दोफाड़ होने से सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। इनेलो तो अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ रहा है।
चूंकि, जाट आंदोलन के दौरान शहरों में ज्यादा उपद्रव हुआ था। इससे शहरी मतदाता कांग्रेस से नाराज भी हैं। जाट मतदाता कांग्रेस की ताकत माने जाते हैं, फिर भी जीत के लिए पार्टी को अन्य जातियों का भी वोट हासिल करना होगा। जजपा भी जाट मतदाताओं में अपना जनाधार बढ़ा रही है। इनेलो को पार्टी व चौटाला परिवार के दोफाड़ होने से सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। इनेलो तो अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ रहा है।
एनसीआर में आप का प्रभाव
एनसीआर में आम आदमी पार्टी का प्रभाव है। चूंकि, दिल्ली में आप की सरकार है और एनसीआर के जिलों में आम आदमी पार्टी की सक्रियता ज्यादा रहती है। ऐसे में इस लोकसभा चुनाव में जजपा और आप गठबंधन चौंकाने वाला प्रदर्शन करने की उम्मीद लगाए हुए है।
इनकी कोशिश बसपा को भी साथ लाने की है, ताकि एससी को भी साथ लाया जा सके। हालांकि, आम आदमी पार्टी ने 2014 में अपने चरम पर होने के दौरान प्रदेश की कुछ लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन मुंह की खानी पड़ी। इस बार आप और जजपा मिलकर क्या करिश्मा दिखाते हैं, ये अभी भविष्य के गर्भ में है।
इनकी कोशिश बसपा को भी साथ लाने की है, ताकि एससी को भी साथ लाया जा सके। हालांकि, आम आदमी पार्टी ने 2014 में अपने चरम पर होने के दौरान प्रदेश की कुछ लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन मुंह की खानी पड़ी। इस बार आप और जजपा मिलकर क्या करिश्मा दिखाते हैं, ये अभी भविष्य के गर्भ में है।