चुनाव नतीजों से पहले ही कांग्रेस में खलबली, टिकट वितरण पर उठने लगे सवाल
हरियाणा में लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद कांग्रेस में घमासान मचना तो तय है, परिणाम आने से ठीक पहले पार्टी के भीतर खलबली का माहौल है। कई सीटों पर संभावित हार को देखते हुए तंवर खेमे ने टिकट वितरण पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। पंजाबी और वैश्य समुदाय की टिकट वितरण में अनदेखी को मुद्दा बनाने की कवायद शुरू हो गई है।
तंवर खेमे से जुड़े नेता सोनीपत सीट पर भूपेंद्र सिंह हुड्डा को चुनाव मैदान में उतारने से भी अधिक खुश नहीं हैं, बिना नाम लिए बड़े नेता को चुनावी रण में उतारकर जातीय समीकरण बिगाड़ने की भी बात वे कह रहे हैं। यही नहीं प्रदेश में धरातल पर कमजोर कांग्रेस संगठन का बचाव भी शुरू कर दिया गया है। तंवर खेमा बीते पांच साल के कांग्रेस संगठन की तुलना हुड्डा सरकार के समय के दस साल के पार्टी संगठन से कर रहा है।
पार्टी के प्रदेश कोषाध्यक्ष तरुण भंडारी तो साफ कहते हैं कि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस जातीय समीकरण बनाने से चूकी है। यही कारण है कि भाजपा के मुकाबले कांग्रेस को शहरों में पंजाबी व वैश्य बिरादरी का बहुत कम वोट मिल रहा है। कांग्रेस लोकसभा चुनाव में और अधिक सीटें जीत सकती थी। लेकिन जातीय समीकरण न बिठाकर भाजपा से दुखी वर्ग को कांग्रेस साथ नहीं ला पाई।
शहरों में पंजाबी व वैश्य बहुतायत में हैं, उन्होंने अपनी बिरादरी के उम्मीदवार कांग्रेस से न होने पर भाजपा के साथ जाना ही उचित समझा। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अशोक तंवर पंजाबी व वैश्य को टिकट देने की पैरवी करते रहे लेकिन उनकी एक न सुनी गई। प्रदेश में कांग्रेस संगठन पांच साल में 2004 व 2009 की तुलना काफी सक्रिय रहा है।
विधानसभा चुनाव में न दोहराएं लोस चुनाव की गलती
पार्टी हाईकमान को विधानसभा चुनाव के टिकट वितरण में लोकसभा चुनाव की गलती नहीं दोहरानी चाहिए। विधानसभा चुनाव में पार्टी पंजाबी, वैश्य, राजपूत, ओबीसी, ब्राह्मण, रोड़ व वाल्मीकि समुदाय को मद्देनजर रखते हुए जातीय संतुलन बैठाए।
कांग्रेस को सत्ता वापसी से कोई नहीं रोक पाएगा। भंडारी का कहना है कि कांग्रेस को शहरों में लोकसभा चुनाव के दौरान जितने वोट मिलने चाहिए थे, उतने नहीं मिले। एक बड़े नेता को एडजस्ट करने के लिए जातीय समीकरण बिगाड़े गए।
गुरुवार के बाद तेज होगा आरोप-प्रत्यारोप का दौर
गुरुवार को लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद कांग्रेस में सिर फुटौव्वल की स्थिति हो सकती है। चूंकि, हुड्डा व तंवर खेमा उम्मीद मुताबिक जीत न मिलने पर हार को लेकर एक-दूसरे पर ठीकरा फोड़ेगा।
अधिक सीटें न आने की स्थिति में हुड्डा खेमे की ओर से एक बार फिर प्रदेशाध्यक्ष को बदलने की मुहिम जोर पकड़ सकती है। हुड्डा पिता-पुत्र अगर दोनों जीत दर्ज करते हैं तो हाईकमान को उनकी राय मानना जरूरी हो जाएगा।