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लोकसभा चुनाव में अपनी ताकत दिखाएंगे डेरे, दो मई को शुरू होगा समर्थन पर मंथन

Mon, 29 Apr 2019 05:25 PM IST
ajay kumar अखिल तलवार, अमर उजाला, चंडीगढ़
अखिल तलवार, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: ajay kumar Updated Mon, 29 Apr 2019 05:25 PM IST
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Lok Sabha election 2019, Dera will show strength in Lok Sabha elections
सांकेतिक तस्वीर

लोकसभा चुनाव से पहले एक बार फिर धार्मिक डेरों की अहमियत बढ़ गई है। डेरों के समर्थकों की बढ़ती हुई संख्या एक बड़े वोट बैंक में बदल चुकी है। इसलिए सभी सियासी दलों के लिए ये महत्वपूर्ण हो गए हैं। इस चुनाव में डेरे अपनी ताकत दिखाएंगे।

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पंजाब के सबसे प्रमुख डेरे सच्चा सौदा के लिए यह चुनाव बेहद अहम बन गया है। डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को जेल के बाद हिंसा और डेरे पर पुलिस कार्रवाई के बाद से यह बैकफुट पर है। सियासतदानों ने भी मुश्किल घड़ी में डेरे की कोई मदद नहीं की, कोई भी खुल कर साथ नहीं आया। लेकिन सभी दलों के नेता खुल कर डेरे के खिलाफ बोलने से भी बचे।
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डेरा प्रमुख को जेल के बाद डेरे के समर्थक घटे हैं, लेकिन अभी भी पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में डेरे का अच्छा खासा प्रभाव है। डेरे ने अपनी ताकत दिखाने की पूरी तैयारी कर ली है। 
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डेरे को फिर से खड़ा करने के लिए यही समय है। डेरा प्रमुख जेल में हैं, लेकिन डेरे की पॉलिटिकल विंग एक्टिव है। विंग ने तीनों राज्यों का दौरा पूरा कर लिया है। सभी जगह डेरा प्रेमियों से फीडबैक लिया गया है। दो मई को उम्मीदवारों की स्थिति स्पष्ट होने के बाद डेरा समर्थन को लेकर मंथन करेगा। इसमें देखा जाएगा कि किस राज्य में किस पार्टी को समर्थन देना है या उम्मीदवारों के हिसाब से समर्थन दिया जाए। 

तीसरा विकल्प यह है कि किसी को भी खुलकर समर्थन न दिया जाए। हालांकि इसकी उम्मीद बहुत कम है। 2017 के विधानसभा चुनाव में डेरे ने शिरोमणि अकाली दल को खुलकर समर्थन दिया था। जिसके चलते मालवा बेल्ट में आखिरी समय में आप के वोट शिअद को शिफ्ट हो गए और कांग्रेस की सरकार बन गई।

हालांकि इस समर्थन से शिअद की काफी फजीहत हुई, परंपरागत पंथक वोट बैंक दूर हो गया। 2014 के लोकसभा चुनाव में डेरे ने सभी राज्यों में भाजपा को समर्थन दिया था। 2009 में डेरे के समर्थन की बदौलत ही हरसिमरत कौर बादल बठिंडा का लोकसभा चुनाव जीत सकी थीं।

डेरा ब्यास
अमृतसर में ब्यास स्थित डेरा राधास्वामी का प्रभाव पंजाब ही नहीं, अन्य राज्यों से लेकर विदेश तक है। बाबा जरनैल सिंह ने इसकी स्थापना की थी। सभी जिलों में डेरे के सत्संग घर हैं। यह डेरा हमेशा सियासत से दूर रहा है। इसने कभी भी किसी खास पार्टी या उम्मीदवार का समर्थन करने को नहीं कहा। हालांकि सभी बड़े सियासतदान यहां आते रहे हैं। जिनमें कांग्रेस और भाजपा के शीर्ष नेता शामिल हैं। इस चुनावी मौसम में सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह यहां आ चुके हैं।

डेरा सचखंड
जालंधर के पास बल्लां स्थित डेरा सचखंड रविदास बिरदारी का सबसे महत्वपूर्ण स्थान है। बिरादरी के सभी फैसले यहीं से होते हैं। डेरे ने वाराणसी में गुरु रविदास जी के जन्मस्थान पर धार्मिक स्थल का निर्माण कराया है। हर साल रविदास जयंती में बड़ी तादात में श्रद्धालुओं को वाराणसी ले जाया जाता है।

जहां भी रविदास बिरदारी के लोग ज्यादा हैं, वहां डेरे का प्रभाव भी है। यहां से हमेशा से ही रविदास बिरादरी के उम्मीदवारों का समर्थन किया जाता रहा है। 2017 के चुनाव में अरविंद केजरीवाल भी यहां आए थे।

दिव्य ज्योति जागृति संस्थान
जालंधर के पास नूरमहल स्थित दिव्य ज्योति जागृति संस्थान का प्रभाव कई राज्यों में है। इसके प्रमुख आशुतोष महाराज गहन समाधि में हैं। भाजपा के नेता यहां नियमित आते रहे हैं, जिनमें विजय सांपला और कमल शर्मा प्रमुख हैं। डेरा समाजसेवा के कार्यों में शामिल है, जेलों में प्रोजेक्ट चलाए जा रहे हैं। यह डेरा हमेशा कट्टरपंथियों के निशाने पर रहा है।

लगातार बढ़ता गया डेरों का प्रभाव
समाजशास्त्रियों के मुताबिक पंजाब में आर्थिक व सामाजिक भेदभाव के चलते ही डेरे फले-फूले। समाज में सम्मानजनक स्थान न मिलने से अनुसूचित जाति, पिछड़े और गरीब वर्गों के लोग डेरों से जुड़ते गए। पंजाब में छोटे-बड़े, सिख और गैर सिख नौ हजार डेरे हैं। इनमें करीब तीन सौ प्रमुख डेरे हैं, जिनका प्रभाव पंजाब ही नहीं, आस-पास के इलाकों में भी है। 

डेरों ने अपने समर्थकों को सुरक्षा की भावना दी। डेरे में आने के बाद उन्हें एहसास होता है कि वे एक समुदाय का हिस्सा हैं। डेरों के समाज भलाई कार्यों से भी इनका प्रभाव बढ़ा। डेरों में शराब व अन्य नशे के खिलाफ फरमान जारी किया जाता है। बड़ी संख्या में लोगों ने नशे छोड़े हैं। हालांकि डेरों का विवादों से भी नाता रहा है।

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