{"_id":"5e97fc418ebc3e768812eb4c","slug":"lockdown-curfew-coronavirus-people-facing-hunger-crisis-in-chandigarh","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"कैसे मिटेगी भूखः कई संस्थाओं ने खड़े किए हाथ...दिहाड़ीदार और गरीबों के सामने खाने का संकट","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
कैसे मिटेगी भूखः कई संस्थाओं ने खड़े किए हाथ...दिहाड़ीदार और गरीबों के सामने खाने का संकट
Thu, 16 Apr 2020 12:07 PM IST
खुशबू गोयल
रिशु राज सिंह, चंडीगढ़
रिशु राज सिंह, चंडीगढ़
Published by: खुशबू गोयल
Updated Thu, 16 Apr 2020 12:07 PM IST
विज्ञापन
खाने की इंतजार में बैठा बच्चा
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
21 दिन के बाद लॉकडाउन के तीन मई तक बढ़ने से अब शहर की कई संस्थाओं ने जरूरतमंदों तक खाना पहुंचाने से हाथ खड़े कर दिए हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में दिहाड़ीदार मजदूर, कालोनी और झुग्गियों में रहने वाले लोगों के बड़ा संकट खड़ा हो सकता है। जरूरतमंद लोगों तक खाना पहुंचाने वाली संस्थाओं की संख्या कम हो रही है। इसका असर भी जमीनी स्तर पर दिखने लगा है।
लोगों का कहना है कि जहां कभी दिन में दो-तीन बार खाने की गाड़ी आती थी, अब वहां एक बार ही गाड़ी आ रही है, वह भी रोजाना नहीं। अब ऐसा समय है जब मजदूरों के पास जो जमा धन था, वह लगभग खत्म हो गया है। ऐसे में अब वह सिर्फ प्रशासन के खाने पर निर्भर हैं। ऐसे में संस्थाएं एक-एक कर हाथ खड़े कर रही हैं तो इन लोगों का पेट कैसे भरेगा, यह बड़ा सवाल है।
संस्थाओं ने लॉकडाउन के दौरान रोजाना हजारों लोगों का पेट भरा। इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि लॉकडाउन के बाद अगर शहर की विभिन्न संस्थाएं सामने नहीं आतीं तो स्थिति को संभाल पाना प्रशासन के लिए काफी मुश्किल था। संस्थाओं, एनजीओ ने साथ दिया लेकिन प्रशासन की तरफ से उन्हें पूरा सहयोग नहीं मिला।
विज्ञापन
अमर उजाला ने कई संस्थाओं के पदाधिकारियों से बातचीत की। ज्यादातर का कहना था कि प्रशासन के प्रबंध में कई तरह की खामी रही है। उन्होंने स्वेच्छा से 21 दिनों तक खाना खिलाया लेकिन अब मुश्किल हो गया है।
विज्ञापन
लोगों का कहना है कि जहां कभी दिन में दो-तीन बार खाने की गाड़ी आती थी, अब वहां एक बार ही गाड़ी आ रही है, वह भी रोजाना नहीं। अब ऐसा समय है जब मजदूरों के पास जो जमा धन था, वह लगभग खत्म हो गया है। ऐसे में अब वह सिर्फ प्रशासन के खाने पर निर्भर हैं। ऐसे में संस्थाएं एक-एक कर हाथ खड़े कर रही हैं तो इन लोगों का पेट कैसे भरेगा, यह बड़ा सवाल है।
विज्ञापन
संस्थाओं ने लॉकडाउन के दौरान रोजाना हजारों लोगों का पेट भरा। इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि लॉकडाउन के बाद अगर शहर की विभिन्न संस्थाएं सामने नहीं आतीं तो स्थिति को संभाल पाना प्रशासन के लिए काफी मुश्किल था। संस्थाओं, एनजीओ ने साथ दिया लेकिन प्रशासन की तरफ से उन्हें पूरा सहयोग नहीं मिला।
विज्ञापन
अमर उजाला ने कई संस्थाओं के पदाधिकारियों से बातचीत की। ज्यादातर का कहना था कि प्रशासन के प्रबंध में कई तरह की खामी रही है। उन्होंने स्वेच्छा से 21 दिनों तक खाना खिलाया लेकिन अब मुश्किल हो गया है।
संस्थाएं बोलीं, प्रशासन का नहीं मिला सहयोग
श्री चैतन्य गौड़ीय मठ के प्रवक्ता जय प्रकाश गुप्ता ने बताया कि उनकी संस्था 10 हजार लोगों का रोजाना खाना खिलाती थी, इसमें पैक खाना और खुला खाना दोनों शामिल था। प्रशासन ने पहले राशन देने की बात कही थी लेकिन आजतक कुछ नहीं दिया। ईंधन तक नहीं दिया। हमारी कमेटी ने फैसला किया था कि 14 अप्रैल तक खाना मुहैया कराना था, जो हमने किया। अब मंगलवार से खाना देना बंद कर दिया है।
उधर, जय गुरु देव संस्था के चेयरमैन हरिशंकर मिश्रा ने बताया कि उम्मीद के अनुसार प्रशासन का सहयोग नहीं मिला। 14 अप्रैल कर खाना खिलाने की तैयारी की थी, आगे क्या करना है, इस पर संस्था के सदस्यों से बातचीत कर रहे हैं। इनके अलावा नेशनल करप्शन कंट्रोल एंड ह्यूमन वेलफेयर ऑर्गेनाइजेशन के स्टेट प्रेसिडेंट मनीश दुबे ने बताया कि उनकी संस्था रोजाना 1500 लोगों के लिए खाना तैयार करती थी लेकिन मंगलवार से बंद कर दिया है। सदस्यों से बातचीत कर रहे हैं कि आगे क्या किया जाए।
पहले कहा था कि अनाज देंगे, फिर मुकर गए
प्रशासन की तरफ से 19 मार्च को पीसीएस तेजदीप सैनी और कुछ संस्थाओं की बैठक हुई है। बैठक में अधिकारियों की तरफ से कहा गया था कि प्रशासन उन्हें राशन मुहैया कराएगा और संस्थाओं को खाना तैयार करना होगा। साथ ही संस्थाओं से पूछा गया कि वह एक दिन में कितने लोगों का खाना तैयार कर सकते हैं।
अगले दिन फूड इंस्पेक्टरों ने कुछ संस्थाओं से कितने राशन की जरूरत होगी, इसकी जानकारी भी मांग ली लेकिन फिर अचानक सभी को मना कर दिया गया और कहा गया कि उन्हें राशन नहीं मिलेगा अगर वह मदद करना चाहें तो कर सकते हैं। दरअसल, शहर की कई संस्थाएं प्रशासन को मुफ्त में पका हुआ खाना देने के लिए तैयार थीं, जिसकी वजह से अधिकारियों का मन बदल गया।
उधर, जय गुरु देव संस्था के चेयरमैन हरिशंकर मिश्रा ने बताया कि उम्मीद के अनुसार प्रशासन का सहयोग नहीं मिला। 14 अप्रैल कर खाना खिलाने की तैयारी की थी, आगे क्या करना है, इस पर संस्था के सदस्यों से बातचीत कर रहे हैं। इनके अलावा नेशनल करप्शन कंट्रोल एंड ह्यूमन वेलफेयर ऑर्गेनाइजेशन के स्टेट प्रेसिडेंट मनीश दुबे ने बताया कि उनकी संस्था रोजाना 1500 लोगों के लिए खाना तैयार करती थी लेकिन मंगलवार से बंद कर दिया है। सदस्यों से बातचीत कर रहे हैं कि आगे क्या किया जाए।
पहले कहा था कि अनाज देंगे, फिर मुकर गए
प्रशासन की तरफ से 19 मार्च को पीसीएस तेजदीप सैनी और कुछ संस्थाओं की बैठक हुई है। बैठक में अधिकारियों की तरफ से कहा गया था कि प्रशासन उन्हें राशन मुहैया कराएगा और संस्थाओं को खाना तैयार करना होगा। साथ ही संस्थाओं से पूछा गया कि वह एक दिन में कितने लोगों का खाना तैयार कर सकते हैं।
अगले दिन फूड इंस्पेक्टरों ने कुछ संस्थाओं से कितने राशन की जरूरत होगी, इसकी जानकारी भी मांग ली लेकिन फिर अचानक सभी को मना कर दिया गया और कहा गया कि उन्हें राशन नहीं मिलेगा अगर वह मदद करना चाहें तो कर सकते हैं। दरअसल, शहर की कई संस्थाएं प्रशासन को मुफ्त में पका हुआ खाना देने के लिए तैयार थीं, जिसकी वजह से अधिकारियों का मन बदल गया।
सहयोग नहीं मिलने से टूटा मनोबल
शहर की सभी संस्थाओं ने अपने दम पर पूरे शहर को खाना खिलाया लेकिन प्रशासन के कुप्रबंध की वजह से संस्थाओं को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा। रामदरबार स्थित प्राचीन शिव मंदिर प्रबंधक कमेटी के जनरल सेक्रेटरी भूपिंदर वर्मा ने बताया कि उनकी संस्था रोजाना 300 से ज्यादा लोगों के लिए खाना तैयार करती है। अभी भी रोटी बैंक की मदद से यह कार्य चल रहा है।
प्रशासन की गाड़ी शाम 5 बजे तक आ जानी थी, लेकिन एक दिन रात 8 बजे तक नहीं आई। कॉल करने पर कहा गया कि गाड़ी नहीं आएगी। कई जगह दो संस्थाओं की गाड़ी पहुंच जाती है तो कहीं खाना पहुंचता ही नहीं। रोजाना हजारों पैकेट भोजन तैयार कर रहे एनसीसीएचडब्ल्यूओ के स्टेट प्रेसिडेंट मनीष दुबे ने बताया कि कई बार खाना पहुंचाने जाते हैं तो पुलिस खाना अपने पास रख लेती है और कहा जाता है कि हम बांट देंगे। इस तरह की विभिन्न घटनाओं से संस्थाओं मनोबल गिर रहा है।
संस्थाओं से बात चल रही है: अधिकारी
नाम न छापने की शर्त पर प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि कई संस्थाएं मंगलवार से खाना नहीं दे पा रही हैं, उनसे बातचीत की जा रही है। प्रशासन ने उनसे फिर से भोजन देने के लिए आग्रह किया है। हालांकि गुरुद्वारा कमेटियां व अन्य संस्थाएं अभी सहयोग कर रही हैं, इसलिए संकट जैसी कोई स्थिति नहीं है।
प्रशासन की गाड़ी शाम 5 बजे तक आ जानी थी, लेकिन एक दिन रात 8 बजे तक नहीं आई। कॉल करने पर कहा गया कि गाड़ी नहीं आएगी। कई जगह दो संस्थाओं की गाड़ी पहुंच जाती है तो कहीं खाना पहुंचता ही नहीं। रोजाना हजारों पैकेट भोजन तैयार कर रहे एनसीसीएचडब्ल्यूओ के स्टेट प्रेसिडेंट मनीष दुबे ने बताया कि कई बार खाना पहुंचाने जाते हैं तो पुलिस खाना अपने पास रख लेती है और कहा जाता है कि हम बांट देंगे। इस तरह की विभिन्न घटनाओं से संस्थाओं मनोबल गिर रहा है।
संस्थाओं से बात चल रही है: अधिकारी
नाम न छापने की शर्त पर प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि कई संस्थाएं मंगलवार से खाना नहीं दे पा रही हैं, उनसे बातचीत की जा रही है। प्रशासन ने उनसे फिर से भोजन देने के लिए आग्रह किया है। हालांकि गुरुद्वारा कमेटियां व अन्य संस्थाएं अभी सहयोग कर रही हैं, इसलिए संकट जैसी कोई स्थिति नहीं है।
रोजाना नहीं आती गाड़ी
मैं पिछले 25 सालों से सेक्टर-9 मार्केट में ही रहता हूं और सोता हूं। लॉकडाउन के कुछ दिनों के बाद कई गाड़ियां खाना देने आती थीं लेकिन धीरे-धीरे उनकी संख्या कम हो गई है। अब तो दिन में एक गाड़ी खाना लेकर आती है, वह भी रोजाना नहीं। हम खुद ही खाना बना रहे हैं।
- मोहम्मद अब्बास, दिहाड़ीदार
पैसे खत्म हो गए और समस्या शुरू
पिछले करीब एक महीने से बैठे हुए हैं। न घर जा पा रहे हैं न ही काम कर पा रहे हैं। जो पैसे थे, उनसे राशन खरीद कर खाना बनाया लेकिन अब पैसे खत्म हो गए हैं। खाना बांटने वाले शुरू में तो काफी लोग आए थे लेकिन अब काफी कम हो गए हैं। काफी समस्या हो रही है। कोई साथ नहीं दे रहा है।
- मोहम्मद जाकिर, दिहाड़ीदार
गांव से मंगवा रहे पैसे
हम यहां सालों से रह रहे हैं। ऑटो और रिक्शा चलाते थे। काम बंद है तो सभी बेरोजगार हैं। प्रशासन की तरफ से दिए जाने वाले खाना का सहारा था लेकिन गाड़ी कभी आती है, कभी नहीं आती है। ऐसे में काफी समस्या हो गई है। गांव से भी पैसे मंगवाने पड़ रहे हैं।
- मिनाज, दिहाड़ीदार
- मोहम्मद अब्बास, दिहाड़ीदार
पैसे खत्म हो गए और समस्या शुरू
पिछले करीब एक महीने से बैठे हुए हैं। न घर जा पा रहे हैं न ही काम कर पा रहे हैं। जो पैसे थे, उनसे राशन खरीद कर खाना बनाया लेकिन अब पैसे खत्म हो गए हैं। खाना बांटने वाले शुरू में तो काफी लोग आए थे लेकिन अब काफी कम हो गए हैं। काफी समस्या हो रही है। कोई साथ नहीं दे रहा है।
- मोहम्मद जाकिर, दिहाड़ीदार
गांव से मंगवा रहे पैसे
हम यहां सालों से रह रहे हैं। ऑटो और रिक्शा चलाते थे। काम बंद है तो सभी बेरोजगार हैं। प्रशासन की तरफ से दिए जाने वाले खाना का सहारा था लेकिन गाड़ी कभी आती है, कभी नहीं आती है। ऐसे में काफी समस्या हो गई है। गांव से भी पैसे मंगवाने पड़ रहे हैं।
- मिनाज, दिहाड़ीदार