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दुनिया करेगी बहादुर बेटी नीरजा की शहादत को सलाम
अमित शर्मा/अमर उजाला, मोहाली
Updated Tue, 05 May 2015 01:22 PM IST
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अनजान लोगों के लिए अपनी जान कुर्बान देने वाली चंडीगढ़ की बहादुर बेटी नीरजा भनोट की शहादत को अब पूरी दुनिया सलाम करेगी। इतना ही नहीं युवा पीढ़ी को इससे समाजसेवा की सीख मिलेगी। यह संभव हुआ है मोगा के गांव घलकलां के देशभगत पार्क में शहीद नीरजा भनोट व जहाज पैन एएम का लाइव स्टेच्यू स्थापित होने से।
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इसे बनाने वाले कलाकार मनजीत सिंह गिल का दावा कि पूरी दुनिया में यही एकमात्र नीरजा का लाइव स्टेच्यू है। मनजीत सिंह ने बताया कि उन्होंने नीरजा की शहादत के बारे में काफी सुना था। फिर उन्होंने नीरजा के जीवन संबंधी इंटरनेट और अखबारों से जानकारी इकट्ठी की।
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उन्होंने पाया कि छोटी सी उम्र में नीरजा ने जो कुर्बानी दी थी। शायद ही कोई ऐसा काम कर पाए, लेकिन कहीं भी उसका लाइव स्टेच्यू नहीं है। ऐसे में उनके दिमाग में आया कि ऐसे राज्य की युवा पीढ़ी को सही राह दिखाने के लिए नीरजा भनोट का स्टेच्यू पार्क में स्थापित किया जाए तो यह मील का पत्थर साबित होगा।
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इसके बाद उन्होंने 2013 में नीरजा का लाइव स्टेच्यू बनाने का फैसला लिया। करीब दो साल की कड़ी मेहनत के बाद उन्होंने स्टेच्यू को तैयार कर लिया। स्टेच्यू को देखने से लगता है कि मानो जहाज और नीरजा उनके सामने खड़ी हो।
नीरजा की ड्रेस उन्होंने वही दिखाई है, जोकि पैन एएम की एयरहॉस्टेस की होती थी। इसके अलावा जहाज 16 फुट लंबा बनाया गया है। इतना ही हादसे की सारी कहानी भी पंजाबी में स्टेच्यू के नीचे है।
जानें कौन है नीरजा भनोट
नीरजा भनोट 7 सितंबर 1965 को चंडीगढ़ में पैदा हुई। वह जहाज पैन एएम में एयरहॉस्टेस थी। 5 सितंबर 1986 को जहाज कराची एयरपोर्ट पर था और पायलट का इंतजार हो रहा था। अचानक आतंकवादियों ने उसे हाइजेक कर लिया।
आतंकवादियों ने जहाज में बैठे एक ब्रिटिश नागरिक को दरवाजे पर लाकर पाकिस्तान सरकार पर पायलट भेजने का दबाव बनाया, लेकिन बात सिरे नहीं चढ़ी। नीरजा ने अपनी काबिलियत से ब्रिटिश नागरिक को बचा लिया। इसके बाद जहाज के जेनरेटर का तेल खत्म होने वाला था।
ऐसे में डर था कि आंतकी सबको मार देंगे। इसलिए नीरजा ने होशियारी से जहाज के इमरजेंसी दरवाजे वाले कार्ड सभी को बांट दिए। जैसे ही लाइट गुल हुई। उसने प्लानिंग से जहाज के इमरजेंसी दरवाजे खोल दिए। सारे यात्री जहाज से निकलकर भाग रहे थे। तभी आतंकवादियों ने फायरिंग शुरू कर दी।
इसी बीच पाकिस्तानी कमांडो भी लोगों के बचाव में आ गए। जैसे ही नीरजा जहाज से उतरने वाली थी कि तीन बच्चों की आवाज सुनाई दी। उसने बच्चों को इमरजेंसी रास्ते से निकाला। इसी दौरान आंतकियों ने उसे मार दिया था। इसके बाद भारत सरकार ने नीरजा को मरणोपरांत अशोक चक्र व पाकिस्तान सरकार ने तमगा-ए-इंसानियत प्रदान किया था।