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जाट आरक्षण आंदोलन : आग बुझाने के जिम्मेदार अफसरों की बेरुखी ने भी दिया दर्द
ब्यूरो/अमर उजाला/चंडीगढ़
Updated Sat, 14 May 2016 09:42 PM IST
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जाट हिंसा पर प्रकाश सिंह ने सीएम को रिपोर्ट सौंपते।
- फोटो : amar ujala
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जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान हरियाणा के कई जिलों में जब आगजनी की घटनाएं हो रही थीं, उस वक्त फायर कर्मियों की बेफिक्री ने उपद्रव के शिकार लोगों का दर्द और बढ़ाने का काम किया।
मकानों, दुकानों और फैक्ट्रियों में लगी आग बुझाने में फायर अफसरों ने न केवल कोताही बरती, बल्कि उनके बर्ताव से भी पीड़ित बेहद आहत हुए। इसका खुलासा प्रकाश सिंह कमेटी की रिपोर्ट में हुआ है।
पीड़ितों को इस बात की खलिस है कि आफत के वक्त अग्निशमन अफसरों ने उनकी कोई मदद नहीं की। न ही पीड़ितों के साथ उनका रवैया उचित रहा। फायर कर्मियों और अफसरों की इस बेरुखी को कमेटी ने भी गंभीरता से लिया है।
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कमेटी ने अपनी रिपोर्ट के जरिये दो फायर अफसरों पर तल्ख टिप्पणी करते हुए उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की सिफारिश की है।
जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान रोहतक, झज्जर, सोनीपत सहित कई जिलों में आगजनी की तमाम घटनाएं हुईं। उस दौरान कई जगहों पर तो फायर कर्मियों ने यह कहकर खुद की जिम्मेदारियों से बचने की केाशिश की कि घटनास्थल तक पहुंचना संभव नहीं था।
आगजनी की सबसे ज्यादा घटनाएं झज्जर और रोहतक में हुईं। लेकिन यहां आग से बचाव के लिए की गई फोन कॉलें अनसुनी कर दी गईं। पुलिस हालात नियंत्रित करती, इससे पहले आग को काबू करने के लिए जिम्मेदार फायर अफसरों ने इसे बुझाने की बजाय दूर रहना ही मुनासिब समझा।
नतीजतन संपत्तियों को हुए नुकसान के मद में सरकार को करोड़ों का मुआवजा देना पड़ा। बीमा कंपनियों पर भी इसका असर पड़ा। जाहिर है यदि आगजनी की 50 फीसदी घटनाओं पर समय रहते काबू पा लिया जाता तो शायद नुकसान का आंकड़ा इतना न होता।
रकाश सिंह कमेटी के अध्यक्ष एवं पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह ने कहा कि रिपोर्ट में दो जगहों पर फायर अफसरों की भूमिका बेहद खराब रही है। पीड़ितों से हुई बातचीत में यह बात सामने आई है कि उन्होंने रोहतक सहित एक अन्य जिले में आग बुझाने में कोताही की। मामले में सबसे खराब पहलु यह है कि फायर कर्मियों का उस वक्त लोगों के साथ बर्ताव भी काफी निराश करने वाला ही रहा। दो अफसरों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की गई है।
मकानों, दुकानों और फैक्ट्रियों में लगी आग बुझाने में फायर अफसरों ने न केवल कोताही बरती, बल्कि उनके बर्ताव से भी पीड़ित बेहद आहत हुए। इसका खुलासा प्रकाश सिंह कमेटी की रिपोर्ट में हुआ है।
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पीड़ितों को इस बात की खलिस है कि आफत के वक्त अग्निशमन अफसरों ने उनकी कोई मदद नहीं की। न ही पीड़ितों के साथ उनका रवैया उचित रहा। फायर कर्मियों और अफसरों की इस बेरुखी को कमेटी ने भी गंभीरता से लिया है।
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कमेटी ने अपनी रिपोर्ट के जरिये दो फायर अफसरों पर तल्ख टिप्पणी करते हुए उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की सिफारिश की है।
जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान रोहतक, झज्जर, सोनीपत सहित कई जिलों में आगजनी की तमाम घटनाएं हुईं। उस दौरान कई जगहों पर तो फायर कर्मियों ने यह कहकर खुद की जिम्मेदारियों से बचने की केाशिश की कि घटनास्थल तक पहुंचना संभव नहीं था।
आगजनी की सबसे ज्यादा घटनाएं झज्जर और रोहतक में हुईं। लेकिन यहां आग से बचाव के लिए की गई फोन कॉलें अनसुनी कर दी गईं। पुलिस हालात नियंत्रित करती, इससे पहले आग को काबू करने के लिए जिम्मेदार फायर अफसरों ने इसे बुझाने की बजाय दूर रहना ही मुनासिब समझा।
नतीजतन संपत्तियों को हुए नुकसान के मद में सरकार को करोड़ों का मुआवजा देना पड़ा। बीमा कंपनियों पर भी इसका असर पड़ा। जाहिर है यदि आगजनी की 50 फीसदी घटनाओं पर समय रहते काबू पा लिया जाता तो शायद नुकसान का आंकड़ा इतना न होता।
रकाश सिंह कमेटी के अध्यक्ष एवं पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह ने कहा कि रिपोर्ट में दो जगहों पर फायर अफसरों की भूमिका बेहद खराब रही है। पीड़ितों से हुई बातचीत में यह बात सामने आई है कि उन्होंने रोहतक सहित एक अन्य जिले में आग बुझाने में कोताही की। मामले में सबसे खराब पहलु यह है कि फायर कर्मियों का उस वक्त लोगों के साथ बर्ताव भी काफी निराश करने वाला ही रहा। दो अफसरों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की गई है।