फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Haryana ›   jat reservation case, in punjab and haryana highcourt

जाट आरक्षण मामला: 'बिना आंकड़ों के दिया आरक्षण खारिज किया जाए'

Sat, 08 Oct 2016 01:45 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Sat, 08 Oct 2016 01:45 AM IST
विज्ञापन
jat reservation case, in punjab and haryana highcourt
- फोटो : File Photo
हरियाणा सरकार की ओर से जाटों समेत छह जातियों को विशेष पिछड़ा वर्ग के रूप में नौकरियों और शैक्षिक संस्थानों में दिए गए आरक्षण के खिलाफ पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में दायर याचिका पर शुक्रवार को सुनवाई हुई। 
विज्ञापन


इस दौरान हरियाणा सरकार की ओर से आरक्षण दिए जाने संबंधी कोई आंकड़े कोर्ट में पेश नहीं किए गए, बल्कि सरकार का पक्ष रख रहे सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील जगदीप धनखड़ लगातार यही दलील देते रहे कि संसद और विधानसभा की ओर से बनाए गए कानून को चुनौती नहीं दी सकती। करीब सवा घंटे चली बहस अधूरी रही और जस्टिस एसएस सारों व जस्टिस लीजा गिल की खंडपीठ ने सुनवाई 21 अक्तूबर पर टाल दी।
विज्ञापन


शुक्रवार को याचिका पर सुनवाई शुरू होते ही याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि हरियाणा सरकार के पास जाटों समेत छह जातियों को आरक्षण दिए जाने को लेकर किसी प्रकार के आंकड़े नहीं है और हरियाणा सरकार ने बिना किसी आधार पर यह आरक्षण लागू किया है, इसे खारिज किया जाए। 
विज्ञापन
विज्ञापन

हाईकोर्ट ने पिछली सुनवाई पर पूछा था, किस आधार पर दिया आरक्षण

jat reservation case, in punjab and haryana highcourt
याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट मुकेश वर्मा ने खंडपीठ को क्वांटीफाईएबल (मात्रात्मक) डाटा की विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि किसी व्यक्ति या वर्ग विशेष द्वारा खुद को बैकवर्ड बताते हुए आरक्षण आदि की मांग किए जाने पर राज्य के अन्य बैकवर्ड वर्गों के मुकाबले उनकी सामाजिक व आर्थिक स्थिति, उनकी कुल जनसंख्या के अनुपातिक अंतर का आकलन कर जो डाटा तैयार किया जाता है, वह क्वांटीफाईएबल डाटा है।

याचिकाकर्ता की ओर से यही बात दोहराई गई कि सरकार के पास जाटों को आरक्षण देने संबंधी कोई आंकड़ें नहीं हैं। इस पर जस्टिस एसएस सारों ने कहा कि हम इसे कम्पेरिटिव डाटा के रूप में समझ सकते हैं। इसके साथ ही उन्होंने सरकार के वकील से सवाल किया कि जाटों समेत छह जातियों को किस आधार पर आरक्षण दिया गया और इसके लिए क्या पद्धति अपनाई गई?

जवाब में सरकार के वकील की ओर से इंदिरा साहनी और राम सिंह केस में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का हवाला देते हुए कहा गया कि संसद और विधानसभा द्वारा बनाए गए कानून को चुनौती नहीं दी सकती। उन्होंने याचिकाकर्ता पक्ष की ओर इशारा करते हुए कहा कि यदि किसी को कानून पर आपत्ति है तो वे सरकार के समक्ष शिकायत दाखिल कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि विधानसभा में कानून विचार-विमर्श के बाद पारित हुआ है। इस पर खंडपीठ ने उनका ध्यान याचिकाकर्ता के सवाल पर खींचते हुए पूछा कि क्या बिना किसी एक्सरसाइज के कानून बनाया जा सकता है? इन जातियों की जनसंख्या कितनी है, इनमें पिछड़ापन कैसे है, अन्य पिछड़े वर्गों से इनकी संख्या कितने फीसदी है, आपने यह जानने के लिए कोई तरीका अपनाया ही नहीं? एक नॉन-फंक्शनल कमीशन (केसी गुप्ता आयोग) को ही आधार बना लिया गया? इस पर सरकार के वकील ने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता सरकार द्वारा बनाए गए कानून को असंवैधानिक ठहराने की कोशिश कर रहे हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed