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रामलाल चौधरी और पीड़त पूर्व जिला राजस्व अधिकारी को आमने सामने बिठाकर की पूछताछ
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चंडीगढ़। छह करोड़ की धोखाधड़ी के मामले में रिमांड पर चल रहे फाइनेंसर रामलाल चौधरी और पंचकूला के पूर्व जिला राजस्व अधिकारी पीड़ित नरेश कुमार को पुलिस ने आमने सामने बिठाकर पूछताछ की। पुलिस के अनुसार नरेश कुमार की ओर से लगाए गए आरोप सही निकले हैं। रविवार को फिर से पीड़ित और आरोपी को आमने सामने बिठाकर पूछताछ की जाएगी। एसआईटी संपत्तियों की जांच के लिए आरोपी को लेकर जीरकपुर जाएगी।
पुलिस ने आरोपी रामलाल को वीरवार को चार दिन के रिमांड पर लिया था। उसके बाद से ही चंडीगढ़ पुलिस की एसआईटी आरोपी से लगातार पूछताछ कर रही है। आरोपी के खिलाफ पांच करोड़ और 6 करोड़ रुपये के दोनों मामलों में जांच के लिए एसएसपी कुलदीप चहल ने विशेष एसआईटी का गठन किया था। एसआईटी में डीएसपी के नेतृत्व में जिला अपराध प्रकोष्ठ के प्रभारी निरीक्षक नरेंद्र पटियाल और सेक्टर-34 थाने के प्रभारी निरीक्षक दविंदर सिंह को शामिल किया था। चंडीगढ़ पुलिस ने 11 नवंबर को गुड़गांव के अतुल्य शर्मा की 5 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी की शिकायत पर रामलाल चौधरी को गिरफ्तार किया था।
250 करोड़ के गबन के मामले में नाम निकालने को नरेश से लिए थे रुपये
नरेश कुमार के अनुसार फरवरी 2015 में विजिलेंस हरियाणा को 250 करोड़ रुपये के गबन की शिकायत मिली थी। शिकायत में जिला क्षेत्रीय दफ्तर के सरकारी खाते में गबन की बात कही गई थी। उस समय नरेश इस विभाग में जिला क्षेत्रीय अधिकारी के पद पर तैनात थे। विजिलेंस ने जांच में पाया कि 250 करोड़ रुपये का गबन हुआ है। इसके बाद नरेश कुमार को पूछताछ के लिए बुलाया गया। बाद में विजिलेंस ने नरेश कुमार का नाम भी एफआईआर में दर्ज करने को कहा था। उन्होंने बताया कि उसकी तैनाती हरियाणा में अलग-अलग जगहों पर नायब तहसीलदार, तहसीलदार और जिला राजस्व अधिकारी के तौर पर रही थी। इसी दौरान उसकी मुलाकात रेवाड़ी में वकील सतीश यादव से हुई थी। मामले में फंसने के बाद उसने सतीश से बात की तो उसने कहा कि उसके दोस्त भूप सिंह का चंडीगढ़ में किसी रामलाल चौधरी के साथ लिंक है, जिसके नेताओं और पुलिस अधिकारियों के साथ अच्छे संबंध हैं। वर्ष 2015 मई में नरेश कुमार अपने दोस्त सतीश यादव के साथ पहले भूप सिंह से मिला। उसने रामलाल चौधरी से फोन पर पूरी बात बताई। उसके ठीक 10 दिन बाद उन्हें अपने चंडीगढ़ के सेक्टर- 46ए के मकान नंबर के-403 में बुलाया। रामलाल ने उन्हें कहा कि उसकी संबंधित अधिकारियों से बात हो गई है। इस केस से बाहर निकालने के लिए छह करोड़ रुपये लगेंगे। पीड़ित ने संपत्तियां बेचकर पहली किश्त में तीन करोड़ रुपये दे दिए, बावजूद इसके विजिलेंस ने उसका नाम एफआईआर में दर्ज कर लिया। उसके बाद नरेश कुमार ने केस से नाम हटवाने के लिए तीन करोड़ रुपये फिर ले लिए।
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पुलिस ने आरोपी रामलाल को वीरवार को चार दिन के रिमांड पर लिया था। उसके बाद से ही चंडीगढ़ पुलिस की एसआईटी आरोपी से लगातार पूछताछ कर रही है। आरोपी के खिलाफ पांच करोड़ और 6 करोड़ रुपये के दोनों मामलों में जांच के लिए एसएसपी कुलदीप चहल ने विशेष एसआईटी का गठन किया था। एसआईटी में डीएसपी के नेतृत्व में जिला अपराध प्रकोष्ठ के प्रभारी निरीक्षक नरेंद्र पटियाल और सेक्टर-34 थाने के प्रभारी निरीक्षक दविंदर सिंह को शामिल किया था। चंडीगढ़ पुलिस ने 11 नवंबर को गुड़गांव के अतुल्य शर्मा की 5 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी की शिकायत पर रामलाल चौधरी को गिरफ्तार किया था।
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250 करोड़ के गबन के मामले में नाम निकालने को नरेश से लिए थे रुपये
नरेश कुमार के अनुसार फरवरी 2015 में विजिलेंस हरियाणा को 250 करोड़ रुपये के गबन की शिकायत मिली थी। शिकायत में जिला क्षेत्रीय दफ्तर के सरकारी खाते में गबन की बात कही गई थी। उस समय नरेश इस विभाग में जिला क्षेत्रीय अधिकारी के पद पर तैनात थे। विजिलेंस ने जांच में पाया कि 250 करोड़ रुपये का गबन हुआ है। इसके बाद नरेश कुमार को पूछताछ के लिए बुलाया गया। बाद में विजिलेंस ने नरेश कुमार का नाम भी एफआईआर में दर्ज करने को कहा था। उन्होंने बताया कि उसकी तैनाती हरियाणा में अलग-अलग जगहों पर नायब तहसीलदार, तहसीलदार और जिला राजस्व अधिकारी के तौर पर रही थी। इसी दौरान उसकी मुलाकात रेवाड़ी में वकील सतीश यादव से हुई थी। मामले में फंसने के बाद उसने सतीश से बात की तो उसने कहा कि उसके दोस्त भूप सिंह का चंडीगढ़ में किसी रामलाल चौधरी के साथ लिंक है, जिसके नेताओं और पुलिस अधिकारियों के साथ अच्छे संबंध हैं। वर्ष 2015 मई में नरेश कुमार अपने दोस्त सतीश यादव के साथ पहले भूप सिंह से मिला। उसने रामलाल चौधरी से फोन पर पूरी बात बताई। उसके ठीक 10 दिन बाद उन्हें अपने चंडीगढ़ के सेक्टर- 46ए के मकान नंबर के-403 में बुलाया। रामलाल ने उन्हें कहा कि उसकी संबंधित अधिकारियों से बात हो गई है। इस केस से बाहर निकालने के लिए छह करोड़ रुपये लगेंगे। पीड़ित ने संपत्तियां बेचकर पहली किश्त में तीन करोड़ रुपये दे दिए, बावजूद इसके विजिलेंस ने उसका नाम एफआईआर में दर्ज कर लिया। उसके बाद नरेश कुमार ने केस से नाम हटवाने के लिए तीन करोड़ रुपये फिर ले लिए।
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