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सर्जिकल स्ट्राइकः देश के लिए मर मिटने को तैयार हैं, पर सीमा नहीं छोड़ेंगे
अनिल कुमार/अमर उजाला, फिरोजपुर(पंजाब)
Updated Sun, 02 Oct 2016 09:03 AM IST
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बॉर्डर से सटे गांवों के लोग नहीं छोड़ना चाहते गांव
- फोटो : अमर उजाला
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सर्जिकल स्ट्राइक बाद जहां भारत पाक सीमा पर तनाव का माहौल है, वहीं देश के लोग मर मिटने को तैयार हैं और राहत कैंपों में नहीं जाना चाहते।
अंतरराष्ट्रीय सीमा के साथ बसे गांव के लोग दोनों देशों के बीच हुए दो युद्ध व कारगिल जंग के वक्त सरहद पर पैदा हुए तनाव के दौरान घर से बेघर हो चुके हैं। इस बार सीमांत गांव के अधिकांश लोग अपना घर और धान की फसल छोड़कर राहत कैंपों में जाने को तैयार नहीं हैं।
जिन किसानों की फेंसिंग पार खेतों में धान की फसल लगी है उन्हें डर है कि कहीं पाकिस्तान की तरफ से नील गाय या फिर जंगली सूअर उसे नष्ट न कर दें, क्योंकि किसानों को फेंसिंग पार जाने पर पाबंदी है।
गांव जलोके निवासी बानो बाई, सुरेंद्र सिंह, लछमन सिंह व नंदो बाई का कहना है कि चाहे जंग लग जाए वो अपना गांव छोड़कर किसी राहत कैंप में नहीं जाएंगे। मौत तो कहीं भी आ सकती है। कारगिल के समय सरहद पर तनाव था तब भी उनके गांव के अधिकांश लोग यहीं पर थे और फौज की मदद कर रहे थे।
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अंतरराष्ट्रीय सीमा के साथ बसे गांव के लोग दोनों देशों के बीच हुए दो युद्ध व कारगिल जंग के वक्त सरहद पर पैदा हुए तनाव के दौरान घर से बेघर हो चुके हैं। इस बार सीमांत गांव के अधिकांश लोग अपना घर और धान की फसल छोड़कर राहत कैंपों में जाने को तैयार नहीं हैं।
जिन किसानों की फेंसिंग पार खेतों में धान की फसल लगी है उन्हें डर है कि कहीं पाकिस्तान की तरफ से नील गाय या फिर जंगली सूअर उसे नष्ट न कर दें, क्योंकि किसानों को फेंसिंग पार जाने पर पाबंदी है।
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गांव जलोके निवासी बानो बाई, सुरेंद्र सिंह, लछमन सिंह व नंदो बाई का कहना है कि चाहे जंग लग जाए वो अपना गांव छोड़कर किसी राहत कैंप में नहीं जाएंगे। मौत तो कहीं भी आ सकती है। कारगिल के समय सरहद पर तनाव था तब भी उनके गांव के अधिकांश लोग यहीं पर थे और फौज की मदद कर रहे थे।
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धान की फसल पककर तैयार है, नहीं जाएंगे छोड़कर
सर्जिकल स्ट्राइक के चलते हाईअलर्ट के बाद सुरक्षित ठिकानों की ओर जाते लोग
सीमांत गांव कंधू किलचा उताड़ निवासी सोहन सिंह का कहना है कि उनकी धान की फसल फेंसिंग पार खेतों में लगी है। जब से दोनों देशों के बीच तनाव पैदा हुआ है तब से फेंसिंग पार खेतों में जाने पर पाबंदी लगा दी है।
उनके गांव के अधिकांश लोग गांव में ही ठहरे हैं। राहत कैंपों में जाने को तैयार नहीं है। 1965, 1971, कारगिल जंग व सांसद पर हुए हमले के बाद सरहद पर तनाव होने के कारण वो घर से बेघर हुए हैं, लेकिन अब वो घर छोड़ कर कहीं नहीं जाएंगे।
गांव भाने वाला निवासी तरसेम सिंह, बोहड़ सिंह, निशान सिंह, छिंदो बाई का कहना है कि खेतों में धान की फसल पकने को तैयार है, वो गांव छोड़कर जाना नहीं चाहते हैं। यहां से कई लोग पलायन कर चुके हैं। राहत कैंपों में भी कोई खास सुविधा नहीं मिलती है। पशुओं को हरा चारा नहीं मिलता है।
गांव खुंदर गट्टी व कमाले वाला निवासी सोनू, रेशम सिंह और तरलोचन सिंह का कहना है कि शहर से कई नेता व समाजसेवी संस्थाएं उन्हें खानपान का सामान मुहैया करवा रही हैं।
बहुत से लोग सरहद से सटे गांव से पलायन कर सतलुज दरिया पार कर गांव बारेके में जाकर गुरुद्वारे, स्कूल व सड़कों के किनारे ठहरे हुए हैं। उन लोगों को शहरी लोग लंगर वितरित कर रहे हैं।
उनके गांव के अधिकांश लोग गांव में ही ठहरे हैं। राहत कैंपों में जाने को तैयार नहीं है। 1965, 1971, कारगिल जंग व सांसद पर हुए हमले के बाद सरहद पर तनाव होने के कारण वो घर से बेघर हुए हैं, लेकिन अब वो घर छोड़ कर कहीं नहीं जाएंगे।
गांव भाने वाला निवासी तरसेम सिंह, बोहड़ सिंह, निशान सिंह, छिंदो बाई का कहना है कि खेतों में धान की फसल पकने को तैयार है, वो गांव छोड़कर जाना नहीं चाहते हैं। यहां से कई लोग पलायन कर चुके हैं। राहत कैंपों में भी कोई खास सुविधा नहीं मिलती है। पशुओं को हरा चारा नहीं मिलता है।
गांव खुंदर गट्टी व कमाले वाला निवासी सोनू, रेशम सिंह और तरलोचन सिंह का कहना है कि शहर से कई नेता व समाजसेवी संस्थाएं उन्हें खानपान का सामान मुहैया करवा रही हैं।
बहुत से लोग सरहद से सटे गांव से पलायन कर सतलुज दरिया पार कर गांव बारेके में जाकर गुरुद्वारे, स्कूल व सड़कों के किनारे ठहरे हुए हैं। उन लोगों को शहरी लोग लंगर वितरित कर रहे हैं।