50 साल बाद ढाका ग्लेशियर में फिर तलाशे जाएंगे 96 जवानों के शव, विमान एएन12 हुआ था गायब
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करीब 50 साल बाद सेना ढाका ग्लेशियर में लापता हुए जवानों को एक बार फिर से खोजेगी। 1968 में यहां एयरफोर्स का एएन-12 विमान लापता हो गया था। यह वे जवान थे, जो विमान में सवार थे और विमान के साथ ही अचानक इस ग्लेशियर में गायब हो गए थे। लापता हुए विमान में सवार 101 जवानों में से सिर्फ 5 जवान ही मिले थे। 96 जवान (92 जवान, 4 क्रू मेंबर) आज भी लापता हैं।
परिजनों को आज तक ‘अपनों’ के शव नहीं मिल पाए हैं। अब वेस्टर्न कमांड ने एक बार फिर ग्लेशियर में खोए जवानों और जहाज का मलबा ढूंढने का निर्णय लिया है। इसके लिए एक विशेष टीम बनाई गई है। ट्रिपीक बिग्रेड के डोगरा स्काउट्स के जवानों की ये टीम ढाका ग्लेशियर में बातल रोड हेड (13,400 फीट) से अपना सर्च अभियान 3 अगस्त को शुरू करेगी, जो 18 अगस्त तक जारी रहेगा।
यह सर्च अभियान हवाई दुर्घटना स्थल (17,292 फीट) तक किया जाएगा। डोगरा स्काउट्स की इस टीम को सर्च ऑपरेशन के लिए कारगिल दिवस के अवसर पर रवाना भी कर दिया गया है। टीम इस ग्लेशियर में 80 डिग्री ढाल वाली दुर्गम चोटियों पर जवानों और दुर्घटनाग्रस्त जहाज के मलबे की तलाश करेगी।
खराब मौसम के चलते वापस आ रहा था विमान
1968 में एयरफोर्स के एन-12 (बीएल-534) को टास्क मिला था कि 97 जवानों को लेह में छोड़कर आना है। चंडीगढ़ एयरबेस से इस विमान ने जवानों को लेकर उड़ान भरी। लेकिन लेह में अचानक बादल घिर आए और मौसम बेहद खराब हो गया। पायलट को तुरंत प्रभाव से विमान वापस चंडीगढ़ लाने को कहा गया।
विमान जब लेह से वापस चंडीगढ़ आ रहा था तो अचानक रोहतांग दर्रे के ढाका ग्लेशियर के पास गायब हो गया। उसके बाद कई सर्च ऑपरेशन चलाए गए, लेकिन सिर्फ 5 जवानों के शव ही मिले। बाकी न तो जवान मिले और न ही जहाज का मलबा।
भटककर पाकिस्तान नहीं गया था विमान
सेना ने इन अटकलों को सिरे से खारिज कर दिया है कि जवानों के साथ वापस लौट रहा विमान दुश्मन के इलाके में चला गया है। यह बात जोरों से फैलाई गई थी कि खराब मौसम के चलते एन-12 भटक गया है और पाकिस्तान के प्रतिकूल क्षेत्र में लैंड कर गया था। वहां पाकिस्तान ने सभी जवानों को युद्धबंदी बना लिया था।
लेकिन चंद्रभागा-13 के युवा ट्रेकर्स की टीम को ढाका ग्लेशियर में लापता जवानों और जहाज की खोज करते वक्त एक जवान का पहचान पत्र मिला था और बाद में 5 शव भी मिल गए थे। अब 50 साल बाद फिर से इन जवानों को खोजने के सेना के प्रयासों से परिजनों में उम्मीद जगी है कि शायद उनके ‘अपनों’ का शव मिल जाए और वे उनका अंतिम संस्कार कर सकें।