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21 साल लड़े...पर जीत न सके, बिग्रेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी की वो हसरत, जो रह गई अधूरी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Tue, 27 Nov 2018 10:23 AM IST
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कुलदीप सिंह चांदपुरी
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अपने 120 सैनिकों के साथ पाकिस्तान के 3000 सैनिकों और टैंक ब्रिगेड को मात देने वाले महावीर चक्र विजेता इंसाफ की 21 साल की लड़ाई लड़कर भी जीते जी इंसाफ नहीं पा सके। सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी की हाईकोर्ट में इंसाफ के लिए दाखिल याचिका अभी तक विचाराधीन है।
पंजाब सरकार ने 1976 में नीति बनाई थी, जिसमें घोषणा की गई थी कि जिन्हें 1971 की भारत-पाक जंग के दौरान महावीर चक्र प्राप्त हुआ है उन्हें पंजाब सरकार 10 एकड़ भूमि देगी। ब्रिगेडियर चांदपुरी को पंजाब सरकार ने यह भूमि न देकर 7 अक्टूबर 1977 को 30 हजार की इनामी राशि दे दी थी।
बाद में सामने आया कि पंजाब सरकार ने दो महावीर चक्र विजेताओं को 10 एकड़ भूमि दी है। इनमें ब्रिगेडियर संत सिंह को 1978 में और ब्रिगेडियर एनएस संधु को वर्ष 1979 में भूमि जारी की गई। इस जानकारी के बाद ब्रिगेडियर चांदपुरी ने भी सरकार को रिप्रेजेंटेशन देते हुए भूमि की मांग की और कहा कि वे अपनी इनामी राशि ब्याज के साथ वापस करने को तैयार हैं बदले में उन्हें 10 एकड़ जमीन दी जाए।
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पंजाब सरकार ने 1976 में नीति बनाई थी, जिसमें घोषणा की गई थी कि जिन्हें 1971 की भारत-पाक जंग के दौरान महावीर चक्र प्राप्त हुआ है उन्हें पंजाब सरकार 10 एकड़ भूमि देगी। ब्रिगेडियर चांदपुरी को पंजाब सरकार ने यह भूमि न देकर 7 अक्टूबर 1977 को 30 हजार की इनामी राशि दे दी थी।
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बाद में सामने आया कि पंजाब सरकार ने दो महावीर चक्र विजेताओं को 10 एकड़ भूमि दी है। इनमें ब्रिगेडियर संत सिंह को 1978 में और ब्रिगेडियर एनएस संधु को वर्ष 1979 में भूमि जारी की गई। इस जानकारी के बाद ब्रिगेडियर चांदपुरी ने भी सरकार को रिप्रेजेंटेशन देते हुए भूमि की मांग की और कहा कि वे अपनी इनामी राशि ब्याज के साथ वापस करने को तैयार हैं बदले में उन्हें 10 एकड़ जमीन दी जाए।
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1997 में हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी
कई बार सरकार से इस बारे में मांग करने के बाद भी जब सरकार ने उन्हें कोई जवाब नहीं दिया तो उन्होंने वर्ष 1997 में हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी। हाईकोर्ट के नोटिस के जवाब में पंजाब सरकार ने कहा था की सरकार ब्रिगेडियर चांदपुरी को इनामी राशि जारी कर चुकी है, लिहाजा अब उन्हें जमीन नहीं दी जा सकती है। याचिका पर कोई भी निर्णय न निकलने के कारण हाईकोर्ट ने याचिका लोक अदालत को सुनवाई के लिए भेज दी थी।
लोक अदालत में भी पंजाब सरकार अपने पक्ष पर कायम रहा। लिहाजा लोक अदालत में मामले में कोई सहमति नहीं बन पाने के कारण लोक अदालत ने 21 अगस्त 2015 को याचिका दोबारा हाईकोर्ट में ही सुनवाई के लिए भेजने के निर्देश दे दिए थे। इसके बाद ब्रिगेडियर चांदपुरी ने अपनी इस याचिका पर शीघ्र सुनवाई किए जाने की मांग को लेकर हाईकोर्ट में अर्जी दायर की थी।
लोक अदालत में भी पंजाब सरकार अपने पक्ष पर कायम रहा। लिहाजा लोक अदालत में मामले में कोई सहमति नहीं बन पाने के कारण लोक अदालत ने 21 अगस्त 2015 को याचिका दोबारा हाईकोर्ट में ही सुनवाई के लिए भेजने के निर्देश दे दिए थे। इसके बाद ब्रिगेडियर चांदपुरी ने अपनी इस याचिका पर शीघ्र सुनवाई किए जाने की मांग को लेकर हाईकोर्ट में अर्जी दायर की थी।
शीघ्र सुनवाई के आदेश फिर भी लंबा इंतजार
हाईकोर्ट ने ब्रिगेडियर चांदपुरी की याचिका पर 17 फरवरी 2016 को सुनवाई करते हुए उनकी याचिका पर जुलाई माह में सुनवाई किए जाने के आदेश दिए थे। लेकिन तब से लेकर अब तक उनकी याचिका सुनवाई के लिए आई ही नहीं थी। लगभग ढाई वर्षों के बाद पिछले महीने 30 अक्तूबर को जब याचिका सुनवाई के लिए आई तो उस पर सुनवाई नहीं हो सकी। इसके बाद 17 नवंबर को ब्रिगेडियर चांदपुरी की मृत्यु हो गई थी।
सरकार और न्यायपालिका पर खड़े हुए सवाल
इस पूरे मामले ने पूरी व्यवस्था पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। कैसे एक महावीर चक्त्रस् विजेता की याचिका पर 21 वर्षों के एक लंबे अंतराल के बाद भी कोई फैसला नहीं आया है। पिछले ढाई वर्षों से तो उनकी याचिका पर एक भी सुनवाई नहीं हो पाई थी। मामले में उनके एडवोकेट अनुपम गुप्ता ने कहा कि एक तो सरकार की इस विषय पर नीति बदल चुकी है और दूसरा वह याचिका पर सुनवाई में देरी पर किसी को दोष नहीं देते क्योंकि हाईकोर्ट में पहले ही जजों के पास काम बहुत ज्यादा है।
सरकार और न्यायपालिका पर खड़े हुए सवाल
इस पूरे मामले ने पूरी व्यवस्था पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। कैसे एक महावीर चक्त्रस् विजेता की याचिका पर 21 वर्षों के एक लंबे अंतराल के बाद भी कोई फैसला नहीं आया है। पिछले ढाई वर्षों से तो उनकी याचिका पर एक भी सुनवाई नहीं हो पाई थी। मामले में उनके एडवोकेट अनुपम गुप्ता ने कहा कि एक तो सरकार की इस विषय पर नीति बदल चुकी है और दूसरा वह याचिका पर सुनवाई में देरी पर किसी को दोष नहीं देते क्योंकि हाईकोर्ट में पहले ही जजों के पास काम बहुत ज्यादा है।