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अमर उजाला विशेष: अब लीक नहीं होंगी भारतीय सेना की सूचनाएं
मोहित धुपड़/अमर उजाला, अंबाला कैंटोनमेंट।
Updated Tue, 31 May 2016 10:00 AM IST
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भारतीय सेना में वैकेंसी
- फोटो : DEMO Pics
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सेना की सूचनाएं अब न तो ‘हवा’ में लीक होगी और न ही कोई दुश्मन गोपनीय सूचनाओं को जल्द इंटरसेप्ट कर सकेगा। सेना ने अब अपने संचार सिस्टम को अभेद्य बनाने की तैयारी शुरू कर दी है। इस काम में दूरसंचार विभाग सेना की मदद तो करेगा, लेकिन नेटवर्किंग सिस्टम और स्पैक्ट्रम पर कंट्रोल पूरी तरह सेना का रहेगा।
दरअसल, अभी तक सेना की अधिकतर संचार व्यवस्था वॉयरलेस टेक्नोलॉजी पर आधारित है। हालांकि सेना के पास अपना बेहद एक्सक्लूसिव स्पैक्ट्रम मौजूद हैं। लेकिन विभिन्न परिस्थितियों में सेना का अधिकतर काम वायरलेस टेक्नोलॉजी पर ही चलता है। इसके चलते सेना की अहम व गोपनीय जानकारी के लीक होने का खतरा ज्यादा बना रहता है। दुश्मन देश अपनी टेक्नोलॉजी के जरिये भारतीय सेना के वॉयरलेस नेटवर्क को इंटरसेप्ट करके गोपनीय सूचनाओं को जानने की फिराक में जुटे रहते हैं।
अब न होगी रेडिएशन, न होगी इंफोरमेशन लीक
सेना अब अपनी गोपनीय इंफोरमेशन को संरक्षित बनाने के लिए ऑप्टिकल फाइबर टेक्नोलॉजी से जुड़ेगी। ये ऐसी तकनीक होगी जिससे सेना की संचार व्यवस्था को खासी मजबूती मिलेगी। इसके तहत ऑप्टिकल फाइबर केबल का अंडरग्राउंड नेटवर्क बिछाया जाएगा। इसमें सबसे खास बात यह रहेगी कि जमीन के नीचे बिछने वाले अंडरग्राउंड नेटवर्क में कोई रेडिएशन नहीं होगा। इससे न तो हवा में तरंगें उठेंगी और न ही इनके जरिये सेना की गोपनीय इंफोरमेशन लीक होगी।
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दूसरा, इस सिस्टम से आर्मी के संचार व्यवस्था की क्षमता विभिन्न तरीकों से बहुत ज्यादा बढ़ जाएगी। एक सिरे से दूसरे सिरे तक बिना रोकटोक जितना चाहो, उतना कम्युनिकेशन हो सकेगा। खासतौर पर युद्ध के समय फौज की एक्टिविटी ज्यादा बढ़ने पर इस ये नेटवर्क बहुत ही कारगर और संरक्षित साबित होगा।
इस पूरे प्रोजेक्ट में दूरसंचार विभाग सैन्य अथॉरिटी का पूरा सहयोग करेगा। दूर संचार विभाग हरियाणा परिमंडल के चीफ जनरल मैनेजर रमेश चंद्र आर्य बताते हैं कि दूर संचार विभाग सेना को सिर्फ ऑटिप्कल फाइबर नेटवर्क का झाल बिछाकर देगा। केबल लेइंग से लेकर, ज्वाइंट करने व इस टेक्निक को उपयोगी अवस्था में लाने तक का काम दूर संचार विभाग करेगा। उसके बाद इस तकनीक का सारा कंट्रोल सेना को सुपुर्द कर दिया जाएगा। उनके अनुसार इस पर काम शुरू कर दिया गया है।
उल्लेखनीय है कि उत्तर भारत में सबसे बड़ा आर्मी का बेस कैंप भी अंबाला में हैं। यहां भी आर्मी की संचार व्यवस्था को नियंत्रण करने के लिए अपनी अलग यूनिट है। अब यहां भी इस नई तकनीक से संचार व्यवस्था खासी संरक्षित हो जाएगी।
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दरअसल, अभी तक सेना की अधिकतर संचार व्यवस्था वॉयरलेस टेक्नोलॉजी पर आधारित है। हालांकि सेना के पास अपना बेहद एक्सक्लूसिव स्पैक्ट्रम मौजूद हैं। लेकिन विभिन्न परिस्थितियों में सेना का अधिकतर काम वायरलेस टेक्नोलॉजी पर ही चलता है। इसके चलते सेना की अहम व गोपनीय जानकारी के लीक होने का खतरा ज्यादा बना रहता है। दुश्मन देश अपनी टेक्नोलॉजी के जरिये भारतीय सेना के वॉयरलेस नेटवर्क को इंटरसेप्ट करके गोपनीय सूचनाओं को जानने की फिराक में जुटे रहते हैं।
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अब न होगी रेडिएशन, न होगी इंफोरमेशन लीक
सेना अब अपनी गोपनीय इंफोरमेशन को संरक्षित बनाने के लिए ऑप्टिकल फाइबर टेक्नोलॉजी से जुड़ेगी। ये ऐसी तकनीक होगी जिससे सेना की संचार व्यवस्था को खासी मजबूती मिलेगी। इसके तहत ऑप्टिकल फाइबर केबल का अंडरग्राउंड नेटवर्क बिछाया जाएगा। इसमें सबसे खास बात यह रहेगी कि जमीन के नीचे बिछने वाले अंडरग्राउंड नेटवर्क में कोई रेडिएशन नहीं होगा। इससे न तो हवा में तरंगें उठेंगी और न ही इनके जरिये सेना की गोपनीय इंफोरमेशन लीक होगी।
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दूसरा, इस सिस्टम से आर्मी के संचार व्यवस्था की क्षमता विभिन्न तरीकों से बहुत ज्यादा बढ़ जाएगी। एक सिरे से दूसरे सिरे तक बिना रोकटोक जितना चाहो, उतना कम्युनिकेशन हो सकेगा। खासतौर पर युद्ध के समय फौज की एक्टिविटी ज्यादा बढ़ने पर इस ये नेटवर्क बहुत ही कारगर और संरक्षित साबित होगा।
इस पूरे प्रोजेक्ट में दूरसंचार विभाग सैन्य अथॉरिटी का पूरा सहयोग करेगा। दूर संचार विभाग हरियाणा परिमंडल के चीफ जनरल मैनेजर रमेश चंद्र आर्य बताते हैं कि दूर संचार विभाग सेना को सिर्फ ऑटिप्कल फाइबर नेटवर्क का झाल बिछाकर देगा। केबल लेइंग से लेकर, ज्वाइंट करने व इस टेक्निक को उपयोगी अवस्था में लाने तक का काम दूर संचार विभाग करेगा। उसके बाद इस तकनीक का सारा कंट्रोल सेना को सुपुर्द कर दिया जाएगा। उनके अनुसार इस पर काम शुरू कर दिया गया है।
उल्लेखनीय है कि उत्तर भारत में सबसे बड़ा आर्मी का बेस कैंप भी अंबाला में हैं। यहां भी आर्मी की संचार व्यवस्था को नियंत्रण करने के लिए अपनी अलग यूनिट है। अब यहां भी इस नई तकनीक से संचार व्यवस्था खासी संरक्षित हो जाएगी।