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वायुसेना की 69 साल पुरानी घातक स्कवाड्रन 'फाइटिंग 15' के संहार से कांपते हैं दुश्मन, जानिए खासियतें
Wed, 26 Aug 2020 11:02 AM IST
खुशबू गोयल
मोहित धुपड़, चंडीगढ़
मोहित धुपड़, चंडीगढ़
Published by: खुशबू गोयल
Updated Wed, 26 Aug 2020 11:02 AM IST
सार
- फाइटिंग फिफ्टीन के संहार से कांपता है शत्रु, अब उड़ता बरछा है ताकत
- एयरफोर्स ने अपनी 69 साल पुरानी घातक स्क्वाड्रन को वर्षगांठ पर याद किया
- अगस्त 1951 में अंबाला में हुई थी गठित, सिरसा स्टेशन में सुखोई विमानों को संभालती है
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फाइटिंग 15 स्कवाड्रन
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
वेस्टर्न एयर कमांड के तहत फाइटिंग फिफ्टीन के नाम से प्रख्यात एक ऐसी घातक स्क्वाड्रन नंबर 15 हैं। जिसके संहार से दुश्मन देश भी कांपते हैं। सन 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्ध में अपना पराक्रम दिखा चुकी ये स्क्वाड्रन सन 1962 में भारत-चीन युद्ध का भी सक्रिय हिस्सा थी। आज भी ये घातक स्कवाड्रन उतर भारत में न केवल देश की वायु सीमाओं की रक्षक है, बल्कि इसकी मारक क्षमता से दुश्मन भी थर्राता है।
अगस्त 1951 में गठित की गई इस खतरनाक स्क्वाड्रन नंबर 15 को भारतीय वायुसेना ने अब इसकी 69वीं वर्षगांठ पर याद करते हुए इसके पराक्रम का नमन किया है। ये स्क्वाड्रन इंडियन एयरफोर्स के सबसे पुराने और महत्वपूर्ण जहाजों के बेड़ों में से एक है। जो आज भी वजूद में हैं और हमेशा एक खास युद्धक भूमिका के लिए तैयार रहता है।
देश की आजादी के बाद तत्कालीन सुरक्षा चुनौतियों के मद्देनजर अगस्त 1951 में भारतीय वायुसेना ने स्क्वाड्रन लीडर बी. धतिगरा की कमान में अंबाला एयरफोर्स स्टेशन में स्क्वाड्रन नंबर 15 का गठन किया गया था। स्क्वाड्रन का मोटो यानी सिद्धांत तय किया गया ‘निहंतव्य शत्रव’ यानी ‘शत्रु का संहार’। वायुसेना के एक अफसर के अनुसार उस वक्त इस स्क्वाड्रन को ‘ स्पिटफायर एमके-एक्सवी111’ विमान से लैस किया गया। इस विमान को ‘भारत रक्षक’ का नाम दिया गया था।
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अगस्त 1951 में गठित की गई इस खतरनाक स्क्वाड्रन नंबर 15 को भारतीय वायुसेना ने अब इसकी 69वीं वर्षगांठ पर याद करते हुए इसके पराक्रम का नमन किया है। ये स्क्वाड्रन इंडियन एयरफोर्स के सबसे पुराने और महत्वपूर्ण जहाजों के बेड़ों में से एक है। जो आज भी वजूद में हैं और हमेशा एक खास युद्धक भूमिका के लिए तैयार रहता है।
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देश की आजादी के बाद तत्कालीन सुरक्षा चुनौतियों के मद्देनजर अगस्त 1951 में भारतीय वायुसेना ने स्क्वाड्रन लीडर बी. धतिगरा की कमान में अंबाला एयरफोर्स स्टेशन में स्क्वाड्रन नंबर 15 का गठन किया गया था। स्क्वाड्रन का मोटो यानी सिद्धांत तय किया गया ‘निहंतव्य शत्रव’ यानी ‘शत्रु का संहार’। वायुसेना के एक अफसर के अनुसार उस वक्त इस स्क्वाड्रन को ‘ स्पिटफायर एमके-एक्सवी111’ विमान से लैस किया गया। इस विमान को ‘भारत रक्षक’ का नाम दिया गया था।
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सुखोई-30 एमकेआई की जिम्मेदारी संभाल रही स्क्वाड्रन
शुरू में यह स्क्वाड्रन फाइटिंग फिफ्टीन के नाम से मशहूर हुई। पाकिस्तान और चीन के साथ हुए युद्धों में अंबाला एयरफोर्स स्टेशन से ही अपने घातक विमानों के बूते इस स्क्वाड्रन ने अपना दमखम दिखाया था। इस स्क्वाड्रन की ताकत का नतीजा ही था कि सन 1973 में भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति वराहगिरि वेंकटगिरि की ओर से जहाजों के इस बेड़े को ‘क्रेस्ट’ (देश का मुकुट) प्रदान किया गया। स्पिटफायर विमान के बाद इस स्क्वाड्रन को मिग-21 लड़ाकू विमान से लैस किया गया।
मगर अब साहस और वीरता का प्रतीक बन चुकी ये स्क्वाड्रन को वायुसेना के घातक सुखोई-30 एमकेआई की जिम्मेदारी संभाल रही है। सुखाई से लैस इस स्क्वाड्रन का गैरिसन हेडक्वार्टर भी अंबाला एयरफोर्स स्टेशन से बदलकर सिरसा एयरफोर्स स्टेशन कर दिया गया है। आज ये स्क्वाड्रन सिरसा एयरफोर्स स्टेशन से ही उत्तर भारत में सुखोई लड़ाकू विमानों के साथ हमारी वायु सीमाओं की सुरक्षा के लिए तैनात है।
‘क्लोज एंड डीप’ एयर स्ट्राइक है स्क्वाड्रन की ताकत
भारतीय वायुसेना की ये स्क्वाड्रन अब सुखोई से लैस होने के बाद उड़ता बरछा नाम से प्रख्यात है। इन घातक लड़ाकू विमानों की इसी ताकत के चलते इस स्क्वाड्रन को ये नाम दिया गया है। दुश्मन के इलाके में ‘क्लोज एंड डीप’ एयर स्ट्राइक इस स्क्वाड्रन की सबसे बड़ी ताकत है। बालाकोट एयरस्ट्राइक के बाद देश के दुश्मन ये समझ चुके हैं देश की ओर आंख उठाने वालों का क्या हश्र हो सकता है। ऐसे में खासियत और क्षमता के लिए प्रख्यात इस स्क्वाड्रन की भूमिका और जिम्मेदारी उत्तर भारत में काफी बड़ी है।
मगर अब साहस और वीरता का प्रतीक बन चुकी ये स्क्वाड्रन को वायुसेना के घातक सुखोई-30 एमकेआई की जिम्मेदारी संभाल रही है। सुखाई से लैस इस स्क्वाड्रन का गैरिसन हेडक्वार्टर भी अंबाला एयरफोर्स स्टेशन से बदलकर सिरसा एयरफोर्स स्टेशन कर दिया गया है। आज ये स्क्वाड्रन सिरसा एयरफोर्स स्टेशन से ही उत्तर भारत में सुखोई लड़ाकू विमानों के साथ हमारी वायु सीमाओं की सुरक्षा के लिए तैनात है।
‘क्लोज एंड डीप’ एयर स्ट्राइक है स्क्वाड्रन की ताकत
भारतीय वायुसेना की ये स्क्वाड्रन अब सुखोई से लैस होने के बाद उड़ता बरछा नाम से प्रख्यात है। इन घातक लड़ाकू विमानों की इसी ताकत के चलते इस स्क्वाड्रन को ये नाम दिया गया है। दुश्मन के इलाके में ‘क्लोज एंड डीप’ एयर स्ट्राइक इस स्क्वाड्रन की सबसे बड़ी ताकत है। बालाकोट एयरस्ट्राइक के बाद देश के दुश्मन ये समझ चुके हैं देश की ओर आंख उठाने वालों का क्या हश्र हो सकता है। ऐसे में खासियत और क्षमता के लिए प्रख्यात इस स्क्वाड्रन की भूमिका और जिम्मेदारी उत्तर भारत में काफी बड़ी है।