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Highcourt: पति को अपनी सकल आय से स्वैच्छिक कटौती करने की अनुमति नहीं, HC ने बढ़ाई गुजारा भत्ता राशि
Sat, 28 Sep 2024 01:44 PM IST
निवेदिता वर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Sat, 28 Sep 2024 01:44 PM IST
सार
जस्टिस सुमित गोयल ने कहा कि प्रतिवादी पति को स्वैच्छिक कटौती या व्यय का सहारा लेकर अपने जीवनसाथी या बच्चों के भरण-पोषण के प्रति अपने वित्तीय दायित्व को कम करने की अनुमति नहीं दी जा सकती, जिसके लिए कानूनी बाध्यता नहीं है। आश्रितों का भरण-पोषण करने का प्राथमिक दायित्व आय में कृत्रिम कमी करके कम नहीं किया जा सकता।
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पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने पत्नी को दिए जाने वाले गुजारा भत्ता की राशि तय करते हुए कहा कि पति को अपनी सकल आय से स्वैच्छिक कटौती करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
हाईकोर्ट ने पारिवारिक न्यायालय के उस निर्णय को संशोधित करते हुए गुजारा भत्ता राशि बढ़ा दी, जिसमें उसने पति को 10,000 रुपये की राशि काटने की अनुमति दी थी, जिसका भुगतान वह कथित रूप से ईएमआई के लिए कर रहा था।
जस्टिस सुमित गोयल ने कहा कि प्रतिवादी पति को स्वैच्छिक कटौती या व्यय का सहारा लेकर अपने जीवनसाथी या बच्चों के भरण-पोषण के प्रति अपने वित्तीय दायित्व को कम करने की अनुमति नहीं दी जा सकती, जिसके लिए कानूनी बाध्यता नहीं है। आश्रितों का भरण-पोषण करने का प्राथमिक दायित्व आय में कृत्रिम कमी करके कम नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट पारिवारिक न्यायालय द्वारा पारित आदेश के विरुद्ध अंबाला निवासी एक पत्नी द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें उक्त आदेश में संशोधन करने और उक्त आदेश द्वारा दिए गए अंतरिम भरण-पोषण की राशि को बढ़ाने की प्रार्थना की गई थी। पत्नी को 8,000 रुपये प्रति माह (पत्नी को 3,000 रुपये प्रति माह और दो नाबालिग बेटियों को 2500-2500रुपये प्रति माह) की दर से अंतरिम भरण-पोषण देने का आदेश दिया गया।
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पत्नी के वकील ने तर्क दिया कि पारिवारिक न्यायालय को प्रतिवादी पति की वास्तविक आय और दी गई मामूली राशि के बीच के अंतर पर विचार करना चाहिए था। याचिका का विरोध करते हुए पति ने तर्क दिया कि उसे अपनी बीमार मां की देखभाल करनी है और अन्य दायित्व भी हैं। पत्नी ने इतिहास में स्नातकोत्तर किया है और वह 20,000 रुपये प्रति माह कमा रही है। तथ्यों की जांच करने के बाद, हाई कोर्ट ने कहा कि पारिवारिक न्यायालय ने पति की सकल मासिक आय 39,051 रुपये और उसकी शुद्ध आय 34,976 रुपये प्रति माह पाई है। हालांकि, पारिवारिक न्यायालय ने पति द्वारा भुगतान की जा रही ईएमआई के लिए 10,872 रुपये की कटौती की अनुमति दी और तदनुसार हाथ में प्राप्त शुद्ध आय 24,104 रुपये प्रति माह आंकी है।
हाईकोर्ट ने कहा कि यह निर्विवाद है कि पति की सकल आय से की गई कटौती, जो पति की अपनी इच्छा के कारण है, की अनुमति नहीं दी जा सकती है। परिणामस्वरूप, हाई कोर्ट ने पत्नी की याचिका को स्वीकार कर लिया और पारिवारिक न्यायालय के आदेश को इस सीमा तक संशोधित कर दिया कि पति पत्नी को 4000 रुपये प्रति माह और नाबालिग बेटी को 3500 रुपये प्रति माह का भुगतान करेगा। परिणामस्वरूप न्यायालय ने याचिका को स्वीकार कर लिया और पारिवारिक न्यायालय के आदेश को इस सीमा तक संशोधित कर दिया कि पति पत्नी को 4000 रुपये प्रति माह और प्रत्येक नाबालिग बेटी को 3500 रुपये प्रति माह का भुगतान करेगा।
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हाईकोर्ट ने पारिवारिक न्यायालय के उस निर्णय को संशोधित करते हुए गुजारा भत्ता राशि बढ़ा दी, जिसमें उसने पति को 10,000 रुपये की राशि काटने की अनुमति दी थी, जिसका भुगतान वह कथित रूप से ईएमआई के लिए कर रहा था।
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जस्टिस सुमित गोयल ने कहा कि प्रतिवादी पति को स्वैच्छिक कटौती या व्यय का सहारा लेकर अपने जीवनसाथी या बच्चों के भरण-पोषण के प्रति अपने वित्तीय दायित्व को कम करने की अनुमति नहीं दी जा सकती, जिसके लिए कानूनी बाध्यता नहीं है। आश्रितों का भरण-पोषण करने का प्राथमिक दायित्व आय में कृत्रिम कमी करके कम नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट पारिवारिक न्यायालय द्वारा पारित आदेश के विरुद्ध अंबाला निवासी एक पत्नी द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें उक्त आदेश में संशोधन करने और उक्त आदेश द्वारा दिए गए अंतरिम भरण-पोषण की राशि को बढ़ाने की प्रार्थना की गई थी। पत्नी को 8,000 रुपये प्रति माह (पत्नी को 3,000 रुपये प्रति माह और दो नाबालिग बेटियों को 2500-2500रुपये प्रति माह) की दर से अंतरिम भरण-पोषण देने का आदेश दिया गया।
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पत्नी के वकील ने तर्क दिया कि पारिवारिक न्यायालय को प्रतिवादी पति की वास्तविक आय और दी गई मामूली राशि के बीच के अंतर पर विचार करना चाहिए था। याचिका का विरोध करते हुए पति ने तर्क दिया कि उसे अपनी बीमार मां की देखभाल करनी है और अन्य दायित्व भी हैं। पत्नी ने इतिहास में स्नातकोत्तर किया है और वह 20,000 रुपये प्रति माह कमा रही है। तथ्यों की जांच करने के बाद, हाई कोर्ट ने कहा कि पारिवारिक न्यायालय ने पति की सकल मासिक आय 39,051 रुपये और उसकी शुद्ध आय 34,976 रुपये प्रति माह पाई है। हालांकि, पारिवारिक न्यायालय ने पति द्वारा भुगतान की जा रही ईएमआई के लिए 10,872 रुपये की कटौती की अनुमति दी और तदनुसार हाथ में प्राप्त शुद्ध आय 24,104 रुपये प्रति माह आंकी है।
हाईकोर्ट ने कहा कि यह निर्विवाद है कि पति की सकल आय से की गई कटौती, जो पति की अपनी इच्छा के कारण है, की अनुमति नहीं दी जा सकती है। परिणामस्वरूप, हाई कोर्ट ने पत्नी की याचिका को स्वीकार कर लिया और पारिवारिक न्यायालय के आदेश को इस सीमा तक संशोधित कर दिया कि पति पत्नी को 4000 रुपये प्रति माह और नाबालिग बेटी को 3500 रुपये प्रति माह का भुगतान करेगा। परिणामस्वरूप न्यायालय ने याचिका को स्वीकार कर लिया और पारिवारिक न्यायालय के आदेश को इस सीमा तक संशोधित कर दिया कि पति पत्नी को 4000 रुपये प्रति माह और प्रत्येक नाबालिग बेटी को 3500 रुपये प्रति माह का भुगतान करेगा।